“102 नॉट-आउट ” यानी एक ‘ सन्नाटेदार थप्पड़’

सौम्य जोशी, और फिर उमेश शुक्ला को माफ़ी मांगनी चाहिए – उन अनगिनत ‘नालायक’ संतानों से ! भला गाल पर इस क़दर ‘सन्नाटेदार’ ( बेआवाज़ , झन्नाटेदार से एक सूत अतिरिक्त असरदार ) थप्पड़ भी कोई जड़ता है कि उथल-पुथल मच जाए असंख्य छातियों के भीतर!

शुक्ला जी को बॉक्स ऑफिस की शाबाशियों के अलावा बड़े-बूढ़ों का आशीर्वाद भी मिलने की पूरी संभावना है ! हॉल के अंधियारे में बहुत से डेन्चर्स खिलखिलाते पाए गए!
अहा ! इससे खूबसूरत और क्या हो सकता है कि अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर अपने शबाब पर, एक साथ, आपको मिल जाएं , वहां , जहां उमेश शुक्ला जैसे निष्णात निर्देशक सौम्य जोशी के ब्रिलियंट विचार को अमली जामा पहना रहे हों!

एक फिल्म जब हर लिहाज़ से परिपूर्ण हो तो फिर उसे देखने से बढ़कर कोई दूसरा आनंद नहीं ! यहाँ आपको अपनी ग्रंथियाँ केलिब्रेट कर के रखनी चाहिएं, इस तरह , कि कमियां गिनने और निगेटिविटी ढूंढने की स्वाभाविक इंसानी वृत्तियों पर कम-से-कम अढ़ाई घंटे लगाम कस कर, आनंद के प्रवाह को पिया जाय !
यह फिल्म विशुद्ध आनंद है!

अमिताभ बच्चन का चमत्कार शहद-सा गाढ़ा है, निर्देशकीय कौशल की छुअन का कभी मोहताज़ नहीं रहा है ! मगर, अगर धुरंधर निर्देशक का साथ हो तो दर्शक का चरम सुख तय बात है !
102 बरस के बूढ़े की अभिव्यक्तियाँ ऐसी हो सकती हैं यह भरोसा दिलाने का प्रारंभिक काम करने के बाद उन्होंने अपने किरदार को ऐसा जिया है कि आप मर मिटें !

यह फिल्म गुजरती नाटक पर आधारित है , जैसी कि उमेश शुक्ला की पिछली फिल्म ‘ओ माय गॉड’ थी। उनकी क़ुव्वत ही है कि फिल्म माध्यम में थिएटर का तत्व उन्होंने उभारा है !
महज तीन किरदार ( तीसरे जिमित त्रिवेदी हैं , गुजरात के जाने-माने चेहरे ) , एक अदद घर का सेट-अप और ज़रा सी मुंबई की सैर !
कोई नत्थूखैरा होता तो लुटिया डुबो देता, मगर मेधा ही सब कुछ तय करती है ! ‘कुडोज़’ – उमेश भाई !
नाटे ऋषि कपूर ‘क़द्दावर’ शब्द को नयी परिभाषा देने वाले अभिनेता हैं ! अमिताभ बच्चन नॉक आउट देने वाले फाइटर हैं तो ऋषि साहब धरती पकड़ पहलवान !
अमिताभ जब खिलंदड़ किरदार में हों तो खा जाते हैं सहअभिनेता को, मगर ऋषि उनके जबड़े की पहुँच से किंचित बड़े हैं!
अपने किरदार को इतना नाप-तोल कर जीने के लिए समझ और अभिव्यक्ति का दुर्लभ संगम चाहिए होता है ! सीधी बात की जाये तो इस इंडस्ट्री का बाज़ार एक असंदिग्ध पैरामीटर है !
अमिताभ और ऋषि अब भी ‘चल मेरे भाई’ हैं ! जिमित त्रिवेदी इत्यादि का जिक्र इतना , कि भाई सारू हैं ! कोई स्त्री किरदार फोटो तक में नहीं है इस फिल्म में ! कोई फेसबुक वीरांगना इसे मुद्दा न बनाये तो यह भी एक क़िस्म का रिलीफ है !
फिल्म हिट है क्यों कि यह माँ को भी अच्छी लगी ! अमिताभ बच्चन का बेटा ऋषि कपूर-सी शक्ल का हो , और ऋषि कपूर का बेटा फिर किसी तीसरी ही शक्ल का हो – फिल्म की एकमात्र कमी को डिठौन समझ लिया है हमने !

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