जर्दे वाली आँख (भाग-III)

जर्दे वाली आँख (भाग-I)

जर्दे वाली आँख (भाग-II)

से आगे…

मोहतरमा बंद आँखों से निकल भोर में जाग के जो रियाज़ करने जा रही हो तो दरवाज़ा अच्छे से चिपका के जाओ। अदभूत हो तुम सुनूं रात को त्रिभंग और भोर में बैरागी। सो जा तब्बू बड़-बड़ मत कर। भोर की भर्राई आवाज़ में भी तेरे तल्लफ़ुज़ क्या कमाल हैं तब्बू। दुआ कर कोई ऐसा मिले जिसमें सुनने की क़शिश हो। जा सुनूं जाने किस मुहूर्त में मैं और तुम रूममेट बने थे। इत्ती सुबह हमारे कमरे से ही आवाज़ बाहर जाती है। इसको ब्रम्ह मुहूर्त बोलते हैं प्यारी सखी। और सुनने दो सन सत्तावन के ग़दर की पैदाइश हैं हम दोस्त। ऐसा कर सो ले और अगर नींद नहीं आ रही तो चल नीचे । गंध बिखेरते माधवी के फूल अपने पूरे शबाब पर हैं। भर लेते हैं सांसों में।

चल सुनूं। दोपहर में सो लेंगे।

क्यूँ आज व्रत नहीं करेगी महाशिवरात्रि का? कर ले तब्बू कर ले अगर मलंग साथी की तलाश है तो। मुझसे उपवास नहीं होता, ये भोलेनाथ को पता है। पर इंतज़ार तो मैं भी करूंगी ऐसी ही बारात का….

“तन छार व्याल कपाल भूषण नगन जटिल भयंकरा।

संग भूत प्रेत पिसाच जोगिनी विकट मुख रजनीचरा।।

जो जिअत रहिहिं बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।

देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात लरिकन्ह अस कही।।”

(श्रीरामचरितमानस)

पता है तब्बू पापा जब भी ये सुनाते मैं उस दिन तय करती मेरी बारात ऐसी ही हो। अर्थ कुछ ऐसे बताते पापा,

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दूल्हा भगवान शिव के शरीर पर भस्म लगा है, सांप और कपाल के गहने हैं,वह नंगे जटाधारी और भयंकर हैं। उनके बाराती भूत, प्रेत, पिसाच, जोगिनी और राक्षस हैं। जो बारात को देखकर जिन्दा बचेगा, वो जरूर पुण्य किया होगा। पार्वती का विवाह भी वही देखेगा। लड़कों ने घर-घर जाकर ये बात कह डाली।

अरे यार सुनूं ये कौन सी बात हुई सब मर ही जाये तो निक़ाह का क्या ख़ाक होगा। तब्बू पूरी बात सुन ले सखी मैं मलंग हूँ पर इतनी संजीदगी भी है हममे कि, हर लड़की की बारात जब आये तो बिना किसी मिलावट के दूल्हे और बारातियों का चरित्र समझ में आ जाये। ये बात जीवनसाथी वाली, लड़कों पर भी उतनी ही लागू होती है।

प्रियतमा अगर विद्योत्तमा हो तो कालीदास गढ़ देगी अन्यथा बिन ब्याहे ही भले।

सुनैना प्यारी बाहर आ जा डोली से ८ बजने वाले हैं जरा स्नान ध्यान कर मेस जा । तुम से भूखे नहीं रहा जाता मुझे पता है। पर सुनूं आज का व्रत मैं जरूर करूंगी इसलिए कि शख़्स वही मिले जो दिखे। आ गले लग जा तब्बू इस बात पर।

हॉस्टल लाइब्रेरी में मिलते हैं। तू इतिहास की इमारतों पर उकेरी हुई आयतें पढ़ना और मैं जरा ”मेघदूतम

मैम को मेघदूतम इस बात पर इशू करने के लिए राज़ी किया है, मैडम आप बिंदास लक्मे वाले कॉम्पैक्ट के छोटे दर्पण में अपनी छवि निहारों और फूल से नाज़ुक होठों को शाम तक ५० ग्राम का भारी बना लो लिप ग्लॉस लगा के। ऐसा तूने उसको बोला। नहीं तब्बू मैंने कहा सीढ़ियों पर चढ़ के किताबें मैं शेल्फ कर दूँगी जारी कर दो प्रेम पत्र वाला ग्रन्थ मेघदूतम। गोया उन्नीस बीस साल में प्रेम की पराकाष्ठा न पढ़े तो क्या पढ़े। क्यूँ तब्बू ?

जाने जीवन की कौन सी साँझ में पाती लिखने की दरकार आ पड़े।

Painting Raja Ravi Verma

सुनूं, तुम्हारा पोस्टर आज का सबको अच्छा लगा। पागल तो हो तुम, मुझे यक़ीन है कि, हाथ में मेघदूतम, अंतर में शिव और कान में रॉकी। आयतें पढूं या गैलरी में लगा तेरा पोस्टर इस बार तब्बू जरा धीमे से कह गयी.

”भोर में हे बैरागी,तुम्हारी बातों का सिंदूरी रंग कब मन पर अनामिका में लग कुंकुम बन गया पता ही न चला। तनिक बूँदें छलकी और लाल रंग विदेह हो सुर्ख हुआ और कामना रत भी तुम संग फिर फिर कई कई सूरज जी जाने को ‘

स्वर: विनय गुल महबूबानी

जारी…