परिवार का साथ और खुद पर विश्वास ने दिलाई सफलता

कहते हैं सपना अगर जागती आंखों से देखा जाए तो जरूर सच होता है। मगर उन सपनो को पूरा करने में कई रुकावटें भी आती हैं।

पर जब इरादा पक्का हो और परिवार साथ खड़ा हो तो सफलता जरूर हाथ लगती है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया बिहार शरीफ के ऋषभ कुमार ने, ऋषभ बिहार शरीफ के नालंदा के रहने वाले हैं। बताते हैं कि परिवार में हर किसी ने मेरे सपने पर और मुझपर भरोसा किया। ये सब उनके विश्वास का ही नतीजा है जिससें मैं अपना सपना साकार कर सका। आज ऋषभ आईआईटी दिल्ली में हैं और इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग कर रहे हैं। ऋषभ आगे बताते हैं कि जब उन्होंने करियर यानि भविष्य के लिए योजना बनानी शुरू की तो सबसे पहले डिफेंस का ख्याल आया। मगर डर भी लगा कि अगर ये नही कर पाया तो क्या होगा? वहीं से सुपर 30 के बारे में सुना और दसवीं के बाद ही अभयानंद सुपर 30 के लिए फाॅर्म डाल दिया। दो दिन के बाद पता चला कि उनका सेलेक्शन हो गया। फिर क्या था उनके सपने की पहली सीढी उनको मिल चुकी थी। बस आगे लगन और हौसले उसे आईआईटी जेई की उंचाई पार करना बाकी था। स्कूल में एमबीए के लिए प्रेशर, परिवार की सलाह डिफेंस के लिए मगर ऋषभ आईआईटी की धुन में थे।

कैसे इन सब सलाह मशविरा के बीच ऋषभ ने अपना रास्ता बनाया और अभयानंद सुपर 30 ने उनकी कैसे मदद की आइए जानते हैं।

इस मुकाम पर पहुँचने से पहले कई तरह की आर्थिक तंगी भी परिवार ने झेली है। पिता की छोटी सी साइकिल रिपयेर यानी पंचर बनाने की दुकान है। जहाँ वो एक हेल्पर के साथ काम करते हैं। उन्होंने बताया पहले की पढ़ाई तो परिवार की मदद से हो गई मगर अब बैंक से लोन लेना पड़ा। ताकि ऋषभ अपना सपना पूरा कर सके।

परिवार के बारें में

Abhayanand Super30ऋषभ बताते हैं कि परिवार में दादा-दादी, मम्मी पापा और दो बहने हैं। बचपन में दादा जीे से बहुत सारी प्रेरणा दायक कहानियां सुनने को मिली। जो हमेशा मुझे हिम्मत देने का काम करती थी। मम्मी पापा और बहनों का भी बहुत योगदान रहा क्योंकि इन सबका विश्वास मुझपर था कि जो मैं कह रहा हूं वो पूरा करके दिखाउंगा। इसी विश्वास से मुझे और आत्मबल मिला। कठिनाई को हथियार बनाकर आगे बढता गया। पापा की साइकिल की दुकान है और मम्मी गृहिणी। परिवार की ही देन है कि बचपन से ही मैं बाहर था। पहले सैनिक स्कूल में पढता था फिर दसवीं पास करके अभयानंद सुपर 30(उर्मिला सिंह प्रताप धारी सिन्हा फाउंडेशन के द्वारा चलाया जाता है) चला गया। अभी मेरी सफलता के बाद छोटी बहन भी वहीं से आईआईटी की तैयारी कर रही है।

कैसे रहा सफर

सच कहूं तो जब दसवी में था तो सीबीएसई बोर्ड में अंक अच्छे नही आए। वहां पर लगा डिफेंस की तैयार में शायद मैं असफल हो सकता हूं। फिर सोचा डिफेंस के लिए बाद में भी कोशिश की जा सकती है। मगर अभी मुझे अपना शतप्रतिशत आईआईटी जेई को देना चाहिए। और मैं तैयारी में जुट गया। अभयानंद सुपर 30 में सेलेक्शन हुआ तो लगा सब बहुत आसान होगा। मगर जैसे-जैसे दिन बीते डर भी लगा। “दरअसल मैं अभयानंद सुपर 30 के पहले बैच का हिस्सा था। जहां करीब 30 बच्चे तैयारी के लिए आए और कुछ लोग थोड़े दिन में हिम्मत हार कर वापस चले गये। हर किसी का कहना यही था कि पास होना बहुत मुश्किल है। ऐसे में थोड़ा डर लगता था। मगर अभयानंद सुपर 30 मैथ टीचर पंकज सर और अभयानंद सर के हौसले से सब कुछ आसान हो गया।”

पढाई के लिए समय

कोई निर्धारित समय नही था। अभयानंद सुपर 30 में कोई क्लास का नियम नही है। खुद से तैयारी करनी होती है। हां, किसी भी वक्त क्लास लग भी सकती है मगर अधिकतर फोकस सेल्फ स्टडी पर ही रहता है। फिर से करीब 10 से 12 घंटे की पढाई करता था। कई कई दिन तक रूम से बाहर नही निकलता था। क्योंकि वक्त ही नही था कि बाहर जाकर कुछ किया जाए। एक ही बिल्डिंग में रहना था मोबाइल रखने की इजाजत नही थी। ऐसे में सारा समय सिर्फ पढाई पर ही ध्यान देना था। अभयानंद सर को इस सफलता के लिए धन्यवाद देता हूं उनकी ही मेहनत है कि पहले ही प्रयास में जेईई मेन्स में 404 रैंक और एडवांस में 1385 रैंक हासिल की।

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क्या कहते हैं मम्मी पापा

ऋषभ की मां मृदुला कुमारी और पिता संजय कुमार से जब बात हुई तो वो एकदम गदगद नजर आए। हो भी क्यों न परिवार में पहला बच्चा इस मुकाम पर पहुंचा है जो वाकई गर्व की बात है। संजय कुमार जी कहते हैं कि स्कूल से उसे एमबीए के लिए प्रेशर था और परिवार की सलाह थी डिफेंस की, मगर ऋषभ का मन आईआईटी करने का था। जब ये बात उसने हमें बतायी तो हमने उसे सफल होने का आर्शीवाद दिया। क्योंकि बचपन से ही ऋषभ होनहार था। इसलिए पूरा भरोसा था कि उसे सफल ही होना है। पूरा परिवार उसे सपने के साथ था। वहीं उनकी माता जी का कहना है कि बेटा दूर था तो तकलीफ होती थी। मगर हमेशा ये कहकर खुद को तसल्ली करती थी कि आखिर भविष्य भी तो बनाना है। ऐसे में कभी मातृत्व को उसके भविष्य के बीच नही आने दिया। हर त्यौहार और खास मौके पर उसका न होना अखरता था मगर एक आस ये थी की एक दिन से सब पीछे छूट जाएगा क्योंकि बेटा कुछ बड़ा करने वाला है। वाकई में ऐसा ही हुआ। मृदुला जी आगे कहती हैं कि तैयारी के दौरान रिशव से बात करने का मन करता था, मिलने और देखने का मन करता था। मगर खुद को संभालना पड़ा ताकि वो आगे निकल सके।

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ऋषभ के सपनो को साकार करने में अभयानंद सुपर 30 का अहम योगदान रहा। अभयानंद सुपर 30 उर्मिला सिंह प्रताप धारी सिन्हा फाउंडेशन के द्वारा चलाया जाता है। बच्चों के रहने, खाने और पढ़ने का समस्त खर्च उर्मिला सिंह प्रताप धारी सिन्हा फाउंडेशन के द्वारा ही निस्वार्थ रूप से वहन किया जाता है। इस ट्रस्ट के संस्थापक श्री ए डी सिंह एक व्यवसायी है जिनका व्यवसाय देश विदेश तक फैला है।