मिट्टी से सोना बनाने वाली बंदना बनी नारी सशक्तिकरण की मिशाल

नारी सशक्तिकरण

सफलता के क्या मायने है? हर व्यक्ति विशेष के परिप्रेक्ष्य में इसका उत्तर भिन्न होगा। किसी के लिए पद, किसी के लिए प्रतिष्ठा तो किसी के लिए दोनों ही सफलता है, जबकि महिलाओं के संदर्भ में, समाज के नजरिये से उनका खुद को साबित करना ही सफलता है। आज भी इस पुरुष प्रभुत्व समाज में महिलाओं की स्थिति हासिये पर है, किन्तु हम भूल जाते है कि महिलाओं का जननी रूप, पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ रूप में है। उनका वजूद इस सांसारिक चक्र के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि मनुष्य के लिए सांस लेना।

8 मार्च, ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’, महिलाओं को समर्पित दिवस, इस दिन महिलाओं को सम्मान देने, उनकी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों व योगदान की सराहना एवं जश्न मनाने और लैंगिक समानता पर बल देने के लिए मनाया जाता है।

नारी शक्ति है, नारी जननी है, ‘जीवन-मरण’ के इस सांसारिक चक्र में जो न सिर्फ‘ जीवन(जन्म)’ का महत्वपूर्ण बल्कि अत्यंत जोखिम भूमिका निभाती है।

आज ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर एक महिला के जीवन के विभिन्न रंगों से ओत-प्रोत एक साहसिक, संघर्ष एवं सफलता की कहानी आपसे साझा करते है। एक ऐसी कहानी जिसमे अपने अस्तित्व की तलाश, आत्मनिर्भर बनने की छटपटाहट, खुद जैसी महिलाओं के लिए कुछ करने की दृढ़ता, अपनी जननी के खोने का दुःख तो एक अच्छे इंसान को जीवनसाथी के रूप में पाने की दास्तान है। कहानी प्रतिभाओं के राज्य ‘बिहार’ के किशनगंज जिले के छोटे से गांव ठाकुरगंज से स्वप्न नगरी ‘मुम्बई’ की, एक आम महिला से स्वावलंबी व सफल उधमी बनने की है और उनका नाम है ‘बंदना जैन’

बिहार का एक जिला ‘किशनगंज’, राजधानी पटना से 425 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित, बंगाल, बांग्लादेश और नेपाल की सीमा से सटा है। इसी जिले का एक गांव ‘ठाकुरगंज’ जहाँ बंदना का जन्म हुआ। शुरुआती शिक्षा गांव के सरकारी माध्यमिक विद्यालय से हुई। अनुदार समाज होने के कारण आंठवी कक्षा के बाद विद्यालय सिर्फ परीक्षा में शामिल होने के लिए जाना होता था। रूढ़िवादिता का यह आलम की लड़कियों को शिक्षा से ज्यादा घरेलू कामों में ध्याद देने की नसीहत दी जाती थी और 16 वर्ष की उम्र तक शादी कर दी जाती थी। जब परिवार में उसकी की शादी की बात होने लगी तो अंतर्मुखी बंदना ने अपने माता-पिता से शादी को टालने का आग्रह किया और आगे पढ़ाई करने की बात की। बंदना के इस आग्रह में उनकी माताजी का समर्थन मिला किन्तु सब कुछ इतनी आसानी से कैसे हो सकता था, ईश्वर भी कभी-कभी परीक्षा लेता है और यही वो बंदना के साथ भी कर रहा था। फाइन आर्ट्स में उच्च शिक्षा हेतु दिल्ली जाने के तय कार्यक्रम से मात्र दो दिन पूर्व ही उनकी माताजी का ब्रेन हेमरेज हुआ और एक महीने गहन चिकित्सा के उपरांत उनका देहांत हो गया। इस घटना से बंदना की जीवन ही बदल गई, अब उन्हें अपनी माँ की भूमिका निभाते हुए अपने 2 छोटे भाई-बहनों व घर-परिवार की देख-भाल करनी पड़ रही थी। बंदना ने हमारे प्रतिनिधि को बताया

“बदली परिस्थियों ने मुझे गृहणी बना दिया था। मुझे अपनी स्वर्गीय माँ की भूमिका निभानी पड़ रही थी। अपने छोटे भाई-बहनों की देख-भाल एवं खाना बनाना, घर संभालना सभी कुछ करना पड़ रहा था।”

दिल्ली में बसी दो बड़ी बहनों ने इस मुश्किल परिस्थितियों में बंदना को न सिर्फ भावनात्मक समर्थन किया बल्कि मानसिक सबलता भी दी।

बंदना ने भी इसे नियति मान लिया था। दिल्ली स्थित अपनी बड़ी बहन के यहाँ उनकी मुलाकात अपने होने वाले जीवनसाथी से हुई, फिर 2009 में शादी हुई और बंदना मुम्बई आ गयी। बंदना ने कहा “महिलाओं के जीवन में शादी खुशियां लेकर आती है किंतु मेरे लिए खुशियों के साथ-साथ, अधूरे सपने को पूरा करने का मौका लेकर आई थी। शादी से मैं अपने सपनों के काफी करीब आ गयी, ‘जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स’ में प्रवेश पाने के की इच्छा पुनः जागृत हो गयी। मेरे पति ने मेरे हर फैसले में मेरा समर्थन किया व हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया।”

लेकिन इस प्रसिद्ध स्कूल में प्रवेश पाना आसान नहीं था। कुछ कोचिंग क्लासेज वालो से संपर्क करने पर उन्होंने भी असमर्थता प्रकट की और साथ ही नकारात्मक टिप्पणियां भी दी। संबंधियों ने सलाह दिया कि कला से कलाकार का पेट तो भर सकता है किंतु परिवार नहीं चलता और ऐसा भी कलाकार क्या बनना की आजीवन परिवार पर ही निर्भर रहना पड़े। इस क्षेत्र की चुनौतियां, सीमित संभावनाओं, नकारात्मक सलाहों से वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी।

शादी के बाद बंदना को इंतज़ार था सिर्फ मुम्बई पहुंचने का, इस कश्मकश में तीन दिन भी पहाड़ जैसे गुजरे, जैसे ही वो मुम्बई पहुंची लगा मन की मुराद पूरी हो गयी। अंततः शादी के तीन दिनों के पश्चात ही वो प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी लेने जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स पहुंच गई। बात-चीत के क्रम में कॉलेज के कुछ छात्रों ने एक पूर्ववर्ती छात्र ‘जावेद’ से संपर्क करने की सलाह दी। काम मुश्किल था, लेकिन चाह थी, डेढ़ महीने तक जावेद के मार्गदर्शन में 12-14 घण्टे तक ड्राइंग का अभ्यास किया। मेहनत रंग लाई और बंदना का दाखिला भी हो गया। प्रतिभा को मंच मिला, हुनर कुशलता की ओर अग्रसर हुई और कल्पना आकार लेकर साकार होती प्रतीत होने लगी।

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वर्ष 2012 बंदना के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था, इस साल वो कॉलेज से पास भी हुई और पति ने एक घर भी खरीदा। घर की सजावट को लेकर वो उत्साहित थी और बंदना के अंतर्मन का कलाकार सजावट में विभिन्न चीज़ों का प्रयोग करने को उत्सुक भी था। यही वो समय था जब बंदना ने अपने अंदर के कलाकार को स्वच्छंदता दी और परिणाम अभूतपूर्व रहा जिसे पति मनीष जैन ने काफी सराहा भी। इस से आत्मविश्वास बढ़ा और कुछ अलग करने की प्रेरणा भी मिली।

बंदना द्वारा बनाये गत्तों का सोफा और लैंप न काफी खूबसूरत थे बल्कि टिकाऊ भी थे। फिर इन्ही उत्पादों के साथ उन्होंने अपनी पहली प्रदर्शनी अपने घर पर ही किया जिसमें उन्होंने संबंधियों, दोस्तो, पड़ोस व आस-पास के लोगों के अलावे कला क्षेत्र से जुड़े लोगों को आमंत्रित किया। प्रदर्शनी में शामिल सभी लोगों ने उनके उत्पादों को न सिर्फ सराहा बल्कि इसे पेशेवर ढंग से करने की सलाह भी दी। इस से उत्साहित होकर बंदना ने ‘Sylvn Studio’ की नींव डाली।

बंदना बताती है

“गत्तों को कभी भी पारंपरिक रूप से फर्नीचर के लिए उपयोग नहीं किया जाता है, इस धारणा को बदलना एवं उत्पाद टिकाऊ हो इन बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ा।”

आज Sylvn Studio पूरा भारत ही नही बल्कि विश्व में अपने उत्पादों की डिलीवरी करती है। गतों से बने उत्पादों की विभिन्न रेंज 2000 से 20000 तक है एवं bespoke उत्पाद 35,000 से 8 लाख रुपये तक उपलब्ध है। उत्पाद न सिर्फ फैंसी और खूबसूरत है बल्कि टिकाऊ होने के साथ-साथ रख-रखाव मुक्त भी होते है। आंतरिक सज्ज-सज्जा के लिए इनकी उत्पादों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी है।

कैसा लगता है आज जब आप पीछे मुड़कर देखती है? तो बंदना जी जवाब में कहती है

“कार्डबोर्ड के साथ काम करते हुए छः साल हो गए है, फर्नीचर एवं सज्जा के लिए गैरपरंपरागत पदार्थ होने के बाबजूद सभी ने इस सराहा, अब तो इसकी स्वीकार्यता बढ़ गयी है। मेरे लिए सबसे बड़ी सफलता यह है कि मैंने इस व्यवसाय को एक नई ऊंचाई दी है एवं आज जब यह एक स्थायी व्यवसाय मॉडल बन गया है तो मुझे संतुष्टि मिलती है। प्रारंभिक सफलताओं व सराहनाओं ने ही मुझे हौसला एवं विश्वास दिया था कि अब मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

बढ़ती ख्याति और इको-फ्रेंडली उत्पादों के कारण बंदना को कुछ कॉरपोरेट्स के लिए भी काम किया है जिनमे रेमंड, द बॉम्बे स्टोर, मैक्डोनाल्ड्स एवं 1 Above के साथ-साथ काफी संख्या में बड़े रेस्तरॉ भी है।

आज बंदना के बनाए लैम्प्स न सिर्फ घरों, कॉरपोरेट्स व रेस्तरां को रोशन कर रहे है बल्कि बहुत सी महिलाओं को रोजगार प्रदान कर उनके परिवारों का जीवन भी रोशन कर रही है। यह एक उदाहरण है कि एक अबला सफल उधम से कितनी ही अबलाओं की सहायता करते हुए सबला बना सकती है। बंदना जैन उदाहरण है कि प्रतिभाएं छोटे कस्बों एवं गांव में भी पाई जाती है, जरूरत है उन्हें पहचानने एवं निखारने की और जब भी किसी प्रतिभा को प्रोत्साहित किया जाता है तो कुछ विशिष्ट या रचनात्मकता देखने को मिलता है।

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‘आज का रिपोर्टर’ बंदना जैन के जज्बे को सलाम करता है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी और आशा का दामन नहीं छोड़ा। ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर उनके द्वारा अन्य महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने वाले कदम की भी सराहना करते है।

‘आज का रिपोर्टर’ अपने सभी पाठकों को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ की शुभकामनाएं देता है व समाज निर्माण में महिलाओं के अद्भुत व निरंतर सहयोग की सराहना करता है। महिलाओं को सिर्फ ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के दिन ही नहीं बल्कि प्रत्येक दिन सम्मान मिलना चाहिए, क्योकि इस संसार का आधार ही उनसे है, बिना उनके मानवजाति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न है। पृथ्वी पर नारी के हर रूप, स्वरूप को नमन करते  हुए हम व हमारी पूरी टीम अपनी कृतज्ञता प्रकट करती है।

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