लैंगिक विकृतियाँ : केवल विकृतियाँ या सामाजिक अभिशाप

बलात्कार और यौन-उत्पीड़न

प्रदुम्न आज हमारे बीच नहीं रहा।अभी  गम के आंसू सूखे भी नही थे कि टैगोर पब्लिक स्कूल में महज 5 साल की बच्ची के साथ चपरासी ने जो किया उसने राजधानी दिल्ली के लोगो को फिर से दहशत में डाल दिया। किंतु क्या इस प्रकार की घटनाएं नयी हो रही हैं? हम रोजाना ही इस प्रकार की कितनी घटनाये समाचार पत्रों और टेलीविज़न पे पढ़ते/देखते है। अगर आकड़ों को देखा जाय तो केवल 2015 में हमारे देश में 34,651 बलात्कार, 8,000 चाइल्ड अब्यूज की घटनाएं दर्ज किये गए (THE INDIAN EXPRESS , 30 Aug 2016) एवं  एक सर्वे के मुताबिक 10 में 7 महिलाएं सेक्सुअल हरासमेंट की शिकार होती हैं। ये आंकड़े वो है जिसमे पीड़ित हिम्मत जुटाकर, सामाजिक लोक-लाज से परे अपने लिए खड़े होते है, इसके उलटकितनी घटनाये सामाजिक प्रतिष्ठा के खातिर दबा दी जाती है। इस प्रकार की घटनाओं में हमारा 1 मिनट का मौन रखना, कैंडल मार्च करना, सोशल मीडिया पे शेयर/कमेंट और  लोगों को टैग कर के विरोध जताना , ये कहना कि अभियुक्तो को जला दो , काट दो , फाँसी दे दो , सरकार कोई सख्त कानून क्यूँ नहीं बनाती आदि  इन मुद्दों पर बहस करना क्या ये भी आज आम नही हैं? और अगर ये चीजे इतनी ही कारगर थी तो शायद निर्भया के बाद कोई और निर्भया नहीं मरती क्यूँकि उस समय सारा देश कैंडल लेकर सड़क पे था, पूरे देश ने एक होकर विरोध प्रदर्शन किया था।

हर किसी ने बचपन से पढ़ा और सुना होगा कि ‘प्रिवेंशन इज बेटर देन क्योर’,  तो फिर हम क्यूँ नहीं रोकते इस प्रकार की घटनाओं को होने से?

आखिर ये लोग हैं कौन? कहाँ से आये हैं? क्या ये किसी दुसरे ग्रह से आये हैं ?

क्या आपको नहीं लगता ये हम और आप मे से ही है, हमारे समाज के ही लोग है, हम में से ही कोई एक?

क्या एक इन्सान ऐसी सोच के साथ जन्म लेता है?

आखिर वो कौन से कारण हैं जो ऐसी विकृतियों को जन्म देते है और उनकी मानसिकता को ही को विकृत कर देते हैं?

आज हम में से किसी को अगर पेट दर्द हो तो एक मिनट में 2-3 दवाओं के नाम एक सामान्य इन्सान भी बता देगा जो अनपढ़ है और आपको हर रोड पर एक डॉक्टर की क्लिनिक भी मिल जाएगी, लेकिन क्या रोग बस शारीरिक होते हैं? आज शारीरिक रोग से भी जानलेवा है मानसिक रोग और बड़े अफ़सोस कि बात है कि आज के शिक्षीत व आधुनिक लोगों को भी मानसिक रोग के नाम पे बस ‘डिप्रेशन’ और ‘स्किजोफ्रेनिया’ के अलावा शायद ही कुछ पता हो। लेकिन बहुत सारे ऐसे मानसिक रोग है जो हमारे समाज और सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक हैं औऱ हमारे समाज को खोखला कर रहे है और उनमे से एक है  ‘सेक्सुअल डिसऑर्डर’। इसका एक प्रमुख प्रकार है सेक्सुअल डेविएसन जिसे सामूहिक रूप से ‘पाराफिलिया’ कहते हैं।

पाराफिलिया के रोगी हमारे आसपास होते है लेकिन हम पहचान नहीं पाते, अगरह शुरुआत में ही रोगी की पहचान कर उसका इलाज करवाया जय तो रोगी शीघ्र ही सामान्य हो जाता है, इसके उलट अगर विकृति वक़्त बीतने के साथ ज्यादा गहरी पैठ बनाती जाती है और इलाज में भी वक़्त लगता है। जानकारी हो तो रोगी को उनके लक्षणों से पहचाना जा सकता है, तो आइये जानते हैं कि इसके अन्दर कौन – कौन से सेक्सुअल डेविएसन आते हैं। DSM-5 (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Health ) जो की एक नवीनतम अमेरिकन पद्धति है में पाराफिलिया के अंतर्गत 8 डेविएसन को रखा गया है:-

बाल लैंगिकता (Pedophilia):-  यह नाम शायद आपने कंगना रनौत के दीवा सॉंग में सुना होगा लेकिन क्या आपको पता है कि इस डिसऑर्डर से पीड़ित इंसान का यौन वस्तु और कुछ नहीं  बल्कि बच्चे होते हैं। उन्हें बच्चों के साथ लैंगिक क्रिया करके लैंगिक सुख मिलता है और इसका परिणाम हमारे समाज में चाइल्ड अब्यूज के रूप में देखने को मिलता है और जिसकी बलि शायद प्रदुम्न और उस जैसे मासूम चढ़ जाते हैं।

फ्रोटीयुरिज्म (Frotteurism):- यह एक ऐसी मानसिक विकृति है जिसमें व्यक्ति अपने विपरीत लिंग के इंसान के शरीर को छूने या उसमें रगड़ करने से लैंगिक सुख मिलता है।

परपीड़न (sadism) एवं आत्मपीड़न (masochism):-  परपीड़न का रोगी दुसरो को खासकर अपने विपरीत लिंग के इंसान के साथ क्रूरता (जैसे – पीटना , दांत काटना , सिगरेट से जलाना , सुई चुभोना आदि ) के साथ व्यव्हार करके लैंगिक सुख कि प्राप्ति करता है, वही दूसरी ओर आत्मपीड़न में रोगी खुद को कष्ट पहुँचाने से लैंगिक सुख कि अनुभूति होती है।

अंग प्रदर्शन (Exhibitionism):-  इसका रोगी अपने गुप्तांगो को दूसरों को खासकर अपने विपरीत लिंग के इंसान को गलत तरीके से दिखाकर या क्रिया (किसी लड़के का किसी लड़की को देखकर मैस्त्रुबेट करना) करके लैंगिक सुख पाता है।

नग्नदर्शन रति (VOYERISM):-  इससे पीड़ित रोगी को किसी दूसरे व्यक्ति को सेक्स करते हुए देखने में या अपने विपरीत लिंग के इंसान को कपडे बदलते हुए देखने में लैंगिक सुख की  अनुभूति होती है।

व्स्तुकामुकता(Fetishism):-  इस रोग का व्यक्ति किसी भी वस्तु जो उसके लैंगिक सुख का श्रोत हो , को छूकर लैंगिक तुष्टि करता है। ऐसे वस्तुओ में प्रायः व्यक्ति अपने विपरीत लिंग के इंसान के चीजों (जैसे :- उसके कपड़े , पेन , जूते , बाल , नाख़ून आदि) को रखता है।

भिन्न लिंग वस्त्रधारण(Transvestism):- इसमें रोगी को अपने विपरीत लिंग के व्यक्ति के कपड़े पहनकर लैंगिक उत्तेजन कि अनुभूति करते (जैसे :- एक लड़के का किसी लड़की के अंडरवियर को पहनना) है।

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ये कुछ ऐसी मानसिक विकृतियाँ है जो न केवल उस रोगी एवं उसके परिवार के लिए बल्कि हमारे समाज के लिए घातक हैं क्यूँकि इसका परिणाम कभी – कभी बहुत भयानक एवं शर्मनाक होता है जिसे आप क्राइम पैट्रोल या सावधान इंडिया जैसे प्रोग्राम के एपिसोड्स में देख सकते हैं। वर्तमान में महिलाएं औऱ बच्चो के साथ यौन-उत्पीडन नही हो रहे, अपितु जानवर भी सुरक्षित नहीं है क्यूँकि ‘पशुलैंगिकता (Zoophilia)’ जैसे मानसिक विकार में व्यक्ति जानवर के साथ भी सेक्स करता है। बलात्कार की घटनाए बढ़ती विकृत मानसिकता का ही परिणाम है।

  1. मैं इस लेख के माध्यम से लोगों को बस ये कहना चाहती हूँ कि इन मानसिक विकारों को जाने ताकि आप खुद, अपने परिवार, समाज को  इन खतरनाक बिमारियों से बचा सकें। इन्टरनेट की सहायता से इन विकारों के बारे में जानकारी लें ताकि ऐसे विकारों से पीड़ित व्यक्तिओं को साइकैट्रिस्ट,  साइकोलोजिस्ट , काउंसलर आदि के पास ले जाकर उनका इलाज करा सकें। उन्हें आपकी मदद की जरुरत है क्यूँकि एक मानसिक रोगी कई सारे लोगों को मानसिक रूप से विकृत करने की क्षमता रखता है जिसके घेरे में केवल उसके अपने ही नहीं बल्कि मैं या आप कोई भी हो सकता है। किसी व्यक्ति में इस प्रकार की विकृतिया या उनके शुरुआती लक्षण दिखने पर सामान्यतः सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण घरवाले इस प्रकार की बातो को दबा देते है, इस कारण विकृतिया काफी एडवांस्ड स्टेज में पहुच जाता है और फिर रोगी द्वारा इस प्रकार की अनैतिक घटनाये को अंजाम दिया जता है। विकृत व्यक्ति एवं उनके परिजनों को हतोत्साहित न कर के, उपुयक्त चिकित्सा के लिए उनको उत्साहित करना एवं सामाजिक रूप से सौहार्दपूर्ण माहौल बनाये रखना, आदि से ही इस प्रकार  की विकृतियो को समाप्त किया जा सकता है। हमारे समाज मे मनोचिकिसको ओर मनोवैज्ञानिको से संपर्क करना ‘मानसिक अपंगता” के संदर्भ में ही बेहतर माना जाता है। सरकार को भी इस प्रकार की विकृतियों के इलाज के लिए जनता का उत्साहवर्धन करना चाहिए।
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