हिंसक बनते बच्चे-जिम्मेदार कौन??

पहले गुरुग्राम के रेयान स्कूल की घटना और अब तीन चार दिन पहले हुई लखनऊ के स्कूल की घटना ,हमारे लिए सोचने का विषय है कि आखिर हमारे बच्चे इतने हिंसक क्यों होते जा रहे है,क्यों वे इतने तनाव में है? और इतने छोटे हो कर भी कैसे इतनी बड़ी और खतरनाक प्लानिंग कर लेते है, इतने ज्यादा गुस्सैल इतने आक्रामक। पेरेंट्स और स्कूल दोनो ही बच्चे के अच्छे भविष्य के लिए काम करते है लेकिन इन्ही सब सिलेबस, नियम कायदे चाहे वो स्कूल के हो या घर के, स्कूलों से मिलने वाला होमवर्क, असाइनमेंट , हमेशा अव्वल रहने का दवाब हमारे बच्चों को परेशान करता है।

हम अपने बच्चों से चाहते है कि वो हर काम मे आगे रहे, वो हर चीज जानता हो इसलिए उसको पहली ही क्लास से हर चीज पढ़ानी शुरू कर देते हैं कम्प्यूटर, हिस्ट्री ,जेयोग्राफी, जी के ,फ्रेंच ,संस्कृत और भी बहुत कुछ। ऐसा सोच कर चलते है कि जो कुछ है वो सब सिखवा दे उसको,कहीं कुछ रह न जाये,कहीं हमारा बच्चा किसी से पीछे न रह जाये किसी बच्चे से । पेरेंट्स और स्कूल दोनों ही क्लास फर्स्ट से बच्चे को ऐसा बनाने के दवाव में रहते है जैसे अभी ही इसका आई ए एस का एग्जाम होना है। जिसका नतीजा ये होता है कि बच्चा इतने तनाव में आ जाता है ये सब चीज़े करते करते कि या तो वो खुद को ही नुकसान पहुचा लेता है या फिर अपना गुस्सा किसी दूसरे पर निकालता है। और ये हिंसात्मक रवैया अपनाता है।

“बच्चों के हिंसात्मक होने के कई सारे कारण है जिसमे से सबसे ज्यादा उनके पेरेंट्स का खुद का अपना व्यवहार है, जो वे अपने बच्चों के साथ करते हैं या फिर उन बच्चो के सामने किसी और के लिए करते हैं”

उदाहरण के लिए अगर बच्चा ये देखता है कि उसके पेरेंट्स हिंसक हो के अपना काम करवा लेते हैं तो उस बच्चे को ये एक तरीका मिल जाएगा अपना काम पूरा करवाने का। जैसा कि होता भी है घर मे खुद बच्चों के साथ, कि शोर नही पसंद पापा को , तो पीट दिया शोर करते बच्चे को और बच्चा डर से हो गया शान्त। बड़े उसको खुद ही सिखा देते है कि आराम से कही बात से ज्यादा जल्दी हिंसक हो के अपनी बात करवा ली जाती है।

दूसरा मुख्य कारण है बच्चों के ऐसे व्यवहार का ,पेरेंट्स का हद से ज्यादा बिजी होना। वो अपने बच्चो को टाइम ही नही दे पाते। उनके खुद के ही इतने काम होते हैं कि वो खुद ही चाहते है को उनका बच्चा फ़ोन, लैपटॉप या टी वी में बिजी रहे। जिसमे वो बच्चा क्या देखता है क्या नही ,उनको पता ही नही होता है। ना ही तो पेरेंट्स इसको जानने की जहमत उठाते हैं कि उनका बच्चा क्या देख रहा है और न ही उनको इस बात से फर्क पड़ता है अगर बच्चा ऐसी मार पीट वाली चीजें पसंद करता है। कितने पैरेंट्स पूछते है अपने बच्चों से उनके फ़ेवरेट टी वी कैरेक्टर के बारे में! बच्चे अपने हिसाब से टी वी पर वही सब सीरियल देखते हैं और फिर उन सब से सीख कर अपनी रियल लाइफ में ये सब अपराध कर बैठते हैं। आजकल तो छोटे छोटे बच्चो को इस बात की नॉलेज है कि कैसे अटैक करना है कि जान चली जाए किसी की।

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बच्चे हिंसक होते हैं दोनो ही तरह से, या तो तैश में आ कर कि अचानक से उनको गुस्सा आया और नुकसान पहुचा दिया किसी को। या फिर पूरी प्लानिंग के साथ , जैसे ये लखनऊ के कांड जिसमे बच्ची घर से चाकू लायी बाकायदा,फिर मर्डर की कोशिश। और इस तरह से बच्चो का हिंसक होना और भी ज्यादा चिंता का विषय है और साथ ही साथ बड़ो की लापरवाही की निशानी भी। हमे अपने बच्चो पर ध्यान देना चाहिए, उनकी गतिविधियों को यूँही नज़रंदाज़ नही करना चाहिए। उनके व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए और अगर लगता है कि बच्चे को कोई दिक्कत है तो पूछे उससे। उसकी बातों को गंभीरता से ले। बच्चो को सिखाये अपनी परेशानी को पेरेंट्स या टीचर्स से शेयर करना। क्योंकि बच्चे जब अपनी परेशानी बता ही नही पाएंगे तो फिर वो अपनी समझ से उल्टे सीधे हल ही निकलेंगे। साथ ही साथ अपने बच्चों को सामाजिक भी बनाये ,उनको सिर्फ पढ़ा लिखा कर इमोशनली चैलेंज्ड लोगों की भीड़ ना बढ़ाये।बच्चों को प्यार से समस्या का समाधान करना सिखाये ऐसे मार पीट करके या मार के नही। कुछ पैरेंट्स की अपनी गलत पेरेंटिंग उन के खुद के बच्चों का तो भविष्य बर्बाद करती ही है साथ ही दूसरे मासूम बच्चों के लिए भी बेवजह खतरा बनती है। इसलिए यूँ ही लापरवाही से काम नही कीजिये, बच्चे बहुत बड़ी जिम्मेदारी है स्कूल और घर दोनो के लिए। इसलिए अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से पूरा करिये अच्छे अविभावक बनकर और अच्छे शिक्षक बनकर। क्योंकि ये ही बच्चे आगे चलकर हमारे समाज का निर्माण करेंगे।

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