पूर्व डीजीपी अभयानंद ने गया के नक्सली क्षेत्र में जलाई शिक्षा की मशाल

डीजीपी अभयानंद

सपने देखने का हक हर किसी को है, सपने इंसान को जीवंत बनाये रखती है। सोनी रश्मि का भी एक सपना था कि वो भी पढ़-लिख कर इंजीनियर बने, किन्तु बीहड़ो में प्रायः ऐसे सपनों के पर कुतर दिए जाते हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लड़कियों की उच्च शिक्षा की बजाय कम उम्र में शादी कर दी जाती है। शादी या शिक्षा, परिवार इस कश्मकश से जूझ ही रहा था की नक्सलियो ने गया जिले के बरवाडीह गांव में स्थित उसके पैतृक घर को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया। एक वो दिन और एक आज का दिन, सोनी सिक्किम NIIT की छात्रा है

गया-औरंगाबाद सीमा पर हुए मुठभेड़ में छह सीआरपीएफ जवानों की हत्या का आरोपी कुख्यात संदीप यादव का भतीजा अश्विनी कुमार गुंजन आज जमशेदपुर NIIT का छात्र है

सिर्फ ‘सोनी’ और ‘गुंजन’ ही नहीं बल्कि ऐसे तीन दर्जन से अधिक छात्र जो नक्सल प्रभावित क्षेत्र से है और देश के विभिन्न तकनीकी अभियंत्रण संस्थान यथा IIT और NIIT में पढ़ाई कर रहे है। 

गया के नक्सली क्षेत्रो में शिक्षा का यह बीज कैसे अंकुरित हुआ? कौन है, इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र के बच्चों की सफलता के पीछे? आइए जानते है, उस अथक सार्थक प्रयास को। जिससे यह सफलता मिली, जो कि राज्य सरकार तमाम आधारभूत संरचनाओ और करोड़ो रूपये खर्च करके भी न कर पायी।

बचपन से सुनते आया हूँ कि ‘नफरत को प्रेम से ही खत्म किया जा सकता हैं।’ इस बात को कभी किताबों से इतर देखने का मौका नही मिला, किन्तु अब जब एक सत्य घटना के गवाह बनने का मौका मिला तो बरबस ही किताबो और उनकी आदर्शवादी बातों की यादे ताजी हो गयी और महसूस किया कि इस वक्तव्य में थोड़ी सुधार की गुंजाइश है,

जब ‘नफरत’ की जगह ‘विरोध और विद्रोह’, ‘प्रतिशोध और प्रतिरोध’ को समाप्त करना हो तो सिर्फ ‘प्रेम’ ही काफी नही है।

नक्सलियों या माओवादियों को मुख्यधारा से जोड़ने और इनके प्रभावित क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार, जो लंबे समय से राज्य सरकार के लिए एक चुनौती रही है। इस चुनौती से आजीवन रूबरू होने वाले रिटायर्ड डीजीपी एवं प्रमुख शिक्षाविद श्री अभयानंद जी ने अंततः इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। उन्होंने अपने कार्यकाल में भी इस अभिशाप से जूझे और सेवानिवृत होने के बाद भी वो इस सामाजिक अभिशाप से यह जंग लड़ रहे है। आज बीहड़ में ‘गोली-बदुको’ को छोड़ ‘कॉपी-किताबों’ की बात हो रही है। ‘खून-खराबे’ से ज्यादा ‘पढ़ाई-लिखाई’ की बात कर रहे है और इस बदली फ़िज़ा का सारा श्रेय इस दूरदर्शी और कर्मठ इंसान को जाता है। 

इस देश मे लोग सेवानिवृत्ति का मतलब काम से आराम ही समझते है, किन्तु अभयानंद जी ने ऐसा नही किया। बल्कि अपनी अधूरी महत्वकांक्षा को पूरा करने में लग गए। उनके जीवन का सिर्फ दो ही सार है – P- Police और P- Physics । अपने कार्यकाल से ही वो वक़्त का समायोजन कर बच्चों को पढ़ाते आये हैं। उनका यह मानना है कि उचित माहौल एवं रोजगार के अभाव में लोग नक्सल बनने की राह पकड़ते है। अगर उन्हें भी यह बुनियादी सुविधाएं मिले, तो वह भी आम इंसानों की तरह ज़िंदगी गुजर-बसर करेंगे। बस इसी सकारात्मक सोच के साथ उन्होंने ‘मगध-30’ में सुविधाओं से वंचित,आर्थिक रूप से कमजोर एवं सुदूर ग्रामीण बच्चों को अपने मार्गदर्शन मे पढ़ाना शुरू किया और इसका फल यह है कि आज नक्सली क्षेत्र के तीन दर्जन से अधिक बच्चे देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानो IIT और NIIT सहित कई अन्य अभियंत्रण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे है। यह संस्थान जुगाड़ से उपलब्ध सुविधाओ के सहारे शुरू जरूर हुआ था, लेकिन इस आगे लेकर जाने की भूख और दृष्टि विद्यमान थी। उसी जज्बे और मेहनत का नतीजा है कि विपरीत परिस्थितियों से होकर यह संस्थान आज यहां पहुँचा है। समाज के लोगो को इसकी सफलता दिख सकती है किंतु इसके पीछे की जिद, मेहनत, जज्बा छिपी रह जाती है।

आज यह अभयानंद जी के मार्गदर्शन में चल रही मगध 30 की ही देन है कि बीहड़ो में भी शिक्षा की लौ जगमगा उठी है, सपने संजोए जाने लगे है। अब वहाँ नयी पीढ़ी के बच्चों के आदर्श माओवादी नही, सोनी रश्मि और अश्विनी कुमार गुंजन है। जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाबजूद अपना मुकाम बनाया। यह कामयाबी मात्र उनकी नहीं बल्कि पूरे समाज की कामयाबी है, क्योंकि उनकी इस सफलता से नक्सली भी मुख्य धारा में लौट रहे है और नक्सलियों को यह लगने लगा है कि समाज मे कोई है जो उनके बच्चों की किस्मत सवांरने में उनके साथ खड़ा है।

इसी संस्थान की छात्रा सोनी रश्मि, जिसका बचपन नक्सली आतंक के इर्द-गिर्द गुजरा, आज सिक्किम NIT में ‘इलेक्ट्रानिक्स एंड कम्युनिकेशन’ की द्वितीय वर्ष की छात्रा है। एक वो वक़्त था जब 2009 में सोनी के पैतृक घर को नक्सलियों ने बारूदी सुरंग से उड़ा दिया था और एक वक्त आज है जब सोनी अपनी ज़िंदगी संवार रही है। उसके जीवन के इन दो महत्वपूर्ण चरणों के मध्य अभयानंद के मार्गदर्शन में चल रही ‘मगध 30’ है।

इस संस्थान का छात्र अश्विनी कुमार गुंजन है जो कुख्यात माओवादी संदीप यादव का भतीजा है। इनकी कहानी रोम-रोम सिहरा देती है। गया जिले के बाँकेबाज़ार पुलिस थाना अंतर्गत लटुआ गांव के मूल निवासी अश्विनी कुमार गुंजन और उनके पिता बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने अपने आम से कुलनाम ‘यादव’ को हटा दिया ताकि लोग उन्हें कुख्यात माओवादी संदीप यादव से जोड़ न सके जो कि 2016 में गया-औरंगाबाद सीमा पर हुए मुठभेड़ जिसमे छह सीआरपीएफ जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया था, का एक आरोपी है। प्रारंभिक शिक्षा के बाद गुंजन सुपर 30 में शामिल हो गया और अभी जमशेदपुर NIIT का छात्र है।

अभयानंद जी ने बताया कि यह संस्था समाज के लिए, समाज के द्वारा सोच पर चलाई जा रही है। यहां बच्चों को भोजन, आवास और बेहतरीन संकाय उपलब्ध करवाया जाता है, साथ ही पढ़ाई के अनुकूल माहौल दिया जाता है जो कि सबसे महत्वपूर्ण है।

गया शहर के दुर्ग बाड़ी स्थित ‘मगध 30’ के पंकज जी ने की पूर्व डीजीपी अभयानंद जिनकी छवि एक कड़क पुलिस अधिकारी की रही है, लेकिन बतौर एक मेंटर के माध्यम से नक्सली क्षेत्र के बच्चों को नक्सल धारा से समाज के मुख्य धारा में वापस लाने में काफी हद तक कामयाब रहे है। 2008 से अबतक के नौ साल के सफर में ‘मगध 30’ अति नक्सल प्रभावित इलाकों के तीन दर्जन से अधिक छात्रों को आईआईटी/एनआईटी सहित कई अन्य तकनीकी अभियन्त्रण संस्थानों में प्रवेश परीक्षा में सफलता प्राप्त कराने का सूत्रधार बना।

हम तो यही चाहेंगे कि उनकी यह कामयाबी सिर्फ एक जिले तक सीमित न हो बल्कि उनका यह अभियान पूरे राज्य में चले और ज्यादा से ज्यादा प्रतिभावान बच्चे इस से लाभांवित हो।

‘मगध 30’ के पूर्वतर छात्र जो विभिन्न कंपनियों में कार्यरत है की सूची के लिए नीचे की लिंक पर क्लिक करे:-‘मगध 30’ के पूर्वतर छात्र जो विभिन्न कंपनियों में कार्यरत है

Connect with Us! अपनी राय कमेंट्स में दें. ताजा ख़बरों के लिए हमें फॉलो करें. अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई, तो इसे लाइक और शेयर करना न भूलें. Subscribe our Youtube Channel: AajKaReporter Follow us on: Facebook, Twitter, Instagram