शिक्षक और शिक्षा या फिर शिक्षक और पैसा

आज हमारे यहाँ शिक्षक हैं, अध्यापक हैं, वे छात्रों को निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा भी देते हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जीवन निर्माण का व्यावहारिक शिक्षण वे आज नहीं दे पाते। केवल कुछ ज्ञान दे देने, एक निश्चित समय तक कक्षा में उपस्थित रहकर कुछ पढ़ा देने के बाद, शिक्षक का कार्य समाप्त हो जाता हैं। आज का शिक्षक सिर्फ पाठ दे सकता है। इसी लिए आज का छात्र मनुष्य नहीं बन पाता। आज शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई है। इसका कारण आज की सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियां भी हैं, लेकिन जो शिक्षक हैं, अध्यापक हैं, वे व्यक्तिगत तौर पर इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। शिक्षक का कर्तव्य है, कि अपने बच्चों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक ही सीमित न रखे। पुस्तकीय ज्ञान तो मात्र परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन होता है, लेकिन विभिन्न चीजों से जोड़कर उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करे। उन्हें अच्छा नागरिक बनाकर, उन्हें हर उस बात, घटना, विचार, भावना को समझाएं जिससे उन्हें समाज से जुड़ने और समझने में मदद मिले, लेकिन आज बड़े दुर्भाग्य से कहना पड़ता है, कि विद्या एक व्यापर का बड़ा केन्द्र बन चुकी है। विद्यालय एक व्यापार केन्द्र की इमारत की तरह हो गई है और अध्यापक, शिक्षक एक व्यापारी के समान बनते जा रहे हैं।

आज एक बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाने के लिए माँ-बाप को कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है और अगर विद्यालय बहुत लोकप्रिय हो तब तो माँ-बाप को विद्यालय के चक्कर काटने पड़ जाते हैं। आज बच्चे विद्यालय में पढ़ते हैं, किन्तु उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती, क्यों? क्योंकि वहां के शिक्षक- शिक्षिकाएं उन्हें ट्यूशन की शिक्षा देते हैं। अर्थात विद्यालय में फीस जमा करो फिर ट्यूशन की फीस अदा करो। आज इसी ट्यूशन ने अधिकांश शिक्षको-शिक्षिकाओं को व्यापरी बना कर रख दिया है। आज शिक्षक स्कूल या कॉलेज में किसी विषय की पूर्ण जानकारी विद्यार्थियों को न देकर कहता है, कि आप ट्यूशन आ जाना वहीं पर सब परेशानी का हल कर देंगे। आज के समय में शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण हो गया है।

शिक्षा के इस बदलते अर्थ ने समाज की मानसिकता को बदल दिया है। यही कारण है, कि आज समाज में लोग केवल शिक्षित होना चाहते हैं, सुशिक्षित नहीं बनना चाहते। वे चाहते हैं कि ज्ञान का सीधा संबंध उनके अर्थोपार्जन से ही है। जिस ज्ञान से अधिक से अधिक धन और उच्च पद को ग्रहण किया जाए वही शिक्षा उचित है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज अभिभावकों की सोच अपने बच्चों के प्रति अधिक संवेदनशील बनती चली जा रही है। वे स्वयं बच्चों को सुख-सुविधाओं से भरकर कर्तव्य विमूढ़ बनाते जा रहे हैं। इससे बच्चों में समाज में संघर्ष करने की भावना खत्म होती जा रही है। वे कठिनाइयों का सामना करना नहीं चाहते। हरदम अभिभावक उनकी सहायता, मदद के लिए तैयार रहते हैं, उन्हें स्वयं कुछ नहीं करने देना चाहते।

‎शिक्षा में इतनी विषमता पहले कभी नहीं थी। कुछ स्कूल बहुत महंगे और हैसियत के प्रतीक हैं। दूसरी ओर, अधिकतर स्कूल ऐसे हैं, जहां न पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं हैं, न विद्यार्थियों के अनुपात में शिक्षक। व्यावसायिक पाठ्यक्रम वाले कॉलेजों में दाखिला पाने की मारामारी मची रहती है, क्योंकि इन पाठ्क्रमों से अच्छे कैरियर का रास्ता खुलता है। लेकिन इन कॉलेजों में प्रवेश पाना पैसे की ताकत पर निर्भर करता है। वहां की पढ़ाई खरीदी जाती है। वर्तमान में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच का फर्क साफ-साफ नजर आता हैं। अक्सर सुनने में आता है, कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों को निजी स्कूलों में पढ़ने वाले खुद के बच्चों को पढ़ाने में परेशानी होती है। इसके मुख्यतौर पर दो कारण हैं। पहला यह कि निजी स्कूल की किताबों के स्तर काफी ऊंचा है। दूसरा कारण है कि अध्यापकों के कौशल विकास में पर्याप्त सुधार की जरूरत है। सरकारी स्कूलों के अधिकतर शिक्षक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में न पढ़ाकर प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, क्योंकि इन्हे खुद सरकारी स्कूलों की पढ़ाई पर विश्वास नहीं है। पढ़ाने के मामले में ये स्वयं कर्तव्यनिष्ठ नहीं है, इसीलिए इन्हे अच्छी तरह से मालूम है,कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कैसी होती है? गली गली में निजी स्कूलों का खुलना, उनमे दाखिले के लिए आम जनता की भागदौड़ और उनका बड़ी सफलता से चलना इस बात का सूचक है कि सरकारी स्कूलों की हालत भवन से लेकर पढ़ाई तक हर मामले में कितनी जर्जर हो चुकी है।

अध्यापक और विद्यार्थी के बीच जो स्नेह भाव, आत्मीयता, सौहार्द, समीपता की आवश्यकता है, वह आज नहीं है और यही कारण है, कि आज के विद्यार्थी में व्यावहारिक जीवन का शिक्षण, चरित्र, ज्ञान, उत्कृष्ट व्यक्तित्व का अभाव रहता है और  ये शिक्षक और शिक्षा के ऐसे रूप से ही हैं।

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