‘ऑक्टोबर’ हिंदी फ़िल्म

आज मुझे शिद्दत से एहसास हो रहा है कि

मेरी संवेदनाएँ सूख रही हैं इन दिनों।

हरसिंगार के फूल की ख़ुशबू मुझ तक पहुँच नहीं रही। किसे दोष दूँ !

एक महीन धागे से बनी बुनी कविता को कहानी के भेष में पेश किया है शूजित ने। वरुण धवन अंडरप्ले कर रहे हैं और संभल कर ही कर रहे हैं मगर पकड़े जा रहे हैं। बनीता संधु को कोमा में रहना था, बेहतरीन रहीं हैं वे। शूजित सरकार जैसे निष्णात निर्देशकों के अपने मिज़ाज होते हैं। सम्भव है कि मेकिंग के दरम्यान ही उन्हें ख़ुश्बू आ जाती हो कि उनके हाथ की फ़िल्म का बॉक्स ऑफ़िस परिणाम शुभ नहीं भी हो सकता है। मगर, क्रिएटिव ऊर्गजम तो स्खलन के बाद ही थमता है न। शूजित के, या उन जैसे और भी कुछ जुनूनी फ़िल्मकारों के अवचेतन में बसे दर्शक भारत वर्ष में अल्प हैं। यह ऐसे निर्देशकों का हौसला ही है कि तब भी वे अपने बीज में पानी-खाद- धूप – सब निष्ठा से देते हैं। सिनेमा का विकास इन ही लोगों के हाथ है। दर्शक का विकास भी। फ़िल्म को समझदार दर्शक मिलने के बड़े मायने हैं। october में सवातीन दर्शकों का पाया जाना देश में समझ वाले नागरिकों की कमी का सीधा प्रमाण है। अगर गोलमाल-3 तीन सौ करोड़ का व्यवसाय करती है तो देश को उसी क्षण अपनी शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की क़वायद आरम्भ कर देनी चाहिए।

जब हरसिंगार के फूल का पौधा नायिका की मृत्यु के बाद नायक को सौंपा जाता है तब साँस ठहरती है और आँखें इर्द-गिर्द की कुर्सियों में तलाशती हैं अपनी ही तरह की भीगी-सी आँखों को। उफ़्फ़ ! कोई नहीं है।

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