एक दिग्गज फ़िल्मी अभिनेता की हक़ीक़त आप जानना चाहेंगे न।

एक मेगाबजट हिंदी फ़िल्म में dialogue लेखन के दौरान इन महाशय के साथ महीनों बिताए !

वे 46 साल से फिल्मों में हैं ! हिंदी फिल्मों में ! मूल रूप से ज़िंदादिल और बेहद भले हैं मगर दुर्दांत चरित्र निर्वहन में निष्णात हैं !

भावाभिव्यक्ति आला दर्ज़े की है और संवाद अदायगी फ़ाड़ू ! आवाज़ मिसाल ! अपनी ‘प्रजाति’ की अवहेलना को धता बताने वाले अकेले ही हैं जो इंडस्ट्री के कंगूरों में बैठे बिरलों के संग बिराजे हैं !

मगर – मैंने लिखा ‘धराधीश्वरी’ और वे इसे बोल नहीं पा रहे हैं ! तड़प रहे हैं ! लग गए हैं उच्चारित करने में ! और आख़िरकार लॉन्ग-वाइड शॉट पर समझौता हो गया है – डबिंग के समय संभाल लेने के वायदे के साथ!

हिंदी राष्ट्र भाषा है ! महानुभाव ने इसे चबा-चबा कर महल खड़े कर लिए हैं ! यह हिंदी की विडंबना नहीं है – महानुभाव सरीखों की दुर्भाग्यपूर्ण वृत्ति है – कि बाक़ी सबकुछ – हेल्थ ; प्रॉपर्टी ; पी आर ; इमेज ; डिमांड ; वगैरह – वगैरह सदा दुरुस्त रहें मगर की-फैक्टर, माँ भाषा के लिए ‘सुशील गोस्वामी कहाँ गया’ का डायलॉग – सेट पर आते ही बोला जाय !

इन्होंने हिंदी फ़िल्मों में एक बड़ा योगदान दिया है। मैं इनका बेहद लिहाज़ करता हूँ।इसलिए इनका नाम ज़ाहिर करते हुए ठीक नहीं लग रहा, तब भी, यह क्षोभ से लबरेज़ लेख इसलिए कि ये जनाब और इन जैसे अधिकांश उस भाषा को यूँ ही लेते हैं जिसने इन्हें सबकुछ दिया !

यक़ीन है कि आप क़यास लगा ही लेंगे !

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