“प्रसून जोशी मतलब एक देदीप्यमान सितारा !”

” तुम फ़क़त दाग़ गिनाओ चाँद के / हम तुम्हें तनख़्वाह देंगे ” .. मेरा यह ताज़ा शेर उन अनेक चीते-से चपल प्रतिभाशाली पोस्टकार-पत्रकार सूरमाओं के लिए, जो नेहरू जी के बाद भारत देश को हासिल सबसे असरदार प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की घोरनिंदा कर अपनी क़लम को धार दिए जा रहे हैं.

पिछले दिनों लन्दन की धरती से मोदी ने ‘भारत की बात’ की थी ! बात को सुगम-सिलसिलेवार बनाने के वास्ते एडगुरु, कवि-गीतकार और सेंसर बोर्ड मुखिया प्रसून जोशी ने सूत्रधार की भूमिका निभायी थी ! अब, क्यों कि ये पोस्टकार-पत्रकार ‘इस सदी की विभूति मोदी’ को पानी पी-पी कर बिलानागा कोसते हैं , एडवरटाइजिंग विज़ार्ड और प्रचंड कवि-नगमानिगार प्रसून जोशी इनकी कलम की कै से कैसे अछूते रह जाते ?

आप प्रसून जोशी को कितना जानते हैं ?

आप जानते हैं कि प्रसून पद्मश्री हैं , आप जानते हैं कि वे बहुराष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसी Mccann के ‘बहुराष्ट्रीय’ मुखिया हैं , आप जानते हैं कि वे प्रसिद्ध गीतकार हैं – उन्होंने ‘मौला-मौला’ और ‘ क्या मैं इतना बुरा हूँ माँ’ सरीखे कालजयी गीत दिए हैं.

पर अब आप ज़रा प्रसून को समग्र और महीन रूप से जान लें !

‘मस्ती की पाठशाला’ जैसे नूतन फ़्रेज़ में से आप ‘पाठशाला’ को पृथक कर लीजिये ! पाठशाला याने स्कूल। यह शब्द कई दूसरे शब्दों की तरह दम तोड़ रहा था ! ‘स्कूल’ इस शब्द को निगल चुका था ! ‘पाठशाला’ रसातल में पड़ा आखिरी सांसें गिन रहा था कि प्रसून ने अपनी कल्पना की उड़ान का रुख रसातल की तरफ़ किया। नयी सोच आकाशोन्मुखी हो, सब अपेक्षा रखते हैं ! पाताल की पड़ताल करना भी नई सोच का एक आयाम हो सकता है – प्रसून ने बतलाया !

विज्ञापन जगत ज़हीन लोगों द्वारा संचालित होता है, मगर बहुत ही आम-सी, नितांत ग्राह्य अभिव्यक्ति से फलता-फूलता है ! एडवरटाइजिंग आज दुनिया की धुरी बन चुकी है ! विज्ञापन न मिले तो अखबार मालिकों को एक अख़बार, कागद-सियाही की क़ीमत के साथ बीस रूपये में पड़ेगा ! नफ़े के लिए शायद वह उसे बाईस रुपये में बेचने की सोचे, मगर शायद ही कोई ख़रीदार मिलेगा उसे ! यह मोटा उदाहरण है ! विज्ञापन आप को टीवी पर मनोरंजन, समाचार, सूचनाएं मुहैया करता है ! फ्री कमर्शियल टाइम में विज्ञापन न चलें तो टीवी आपकी दुनिया से विदा ले लेगा !

विज्ञापन फ़िल्मी सितारों की हैसियत तय करता है ! विज्ञापन समय का आईना है ! लाइफस्टाइल की नित्य नयी सूचना का हरकारा भी विज्ञापन ही है ! ऐसे विज्ञापन जगत के विश्व-मंच पर एक भारतीय अपनी माटी की ख़ुश्बू को अक्षुण्ण रक्खे हुए मातृभाषा का तिलक सजाए अंगद का पाँव बन कर खड़ा है – वह प्रसून जोशी ही है ! इस फ्रेटर्निटी में उनकी उपस्थिति ‘न भूतो, न भविष्यति’ है ! एक समय था जब फ़्रांस के विश्वप्रसिद्ध कान्स एडवरटाइजिंग फेस्टिवल में भारतीय सहमे-ठिठके-से जाते थे और बमुश्क़िल ही उन्हें कोई तरजीह – तवज्जो मिलती थी।  जिन इक्का-दुक्का भारतीय क्रिएटिव ने तस्वीर का रुख बदल डाला उनमें प्रमुख हैं  – प्रसून जोशी ! गोरी चमड़ी और नितांत काली त्वचा की रचनात्मक सत्ता के बीचोंबीच ‘ठसक’ के साथ भूरा रंग न सिर्फ उभरा, बल्कि आकर्षण का केन्द्र भी बना, तो वह प्रसून जोशी की बदौलत ही ! न सिर्फ भारत, बल्कि समूचे एशिया में प्रसून पहले व्यक्ति बने जो कान्स में होने वाले विज्ञापन के महाकुम्भ की ‘टाइटेनियम व इंटीग्रेटेड लायंस जूरी’ के अध्यक्ष बने !

पद्मश्री प्रसून आज भारतीय सेंसर बोर्ड के मुखिया हैं, सफल गीतकार हैं , Mccann वर्ल्ड ग्रुप एशिया पेसिफिक के चेयरमैन हैं और न जाने क्या-क्या हैं , मगर उन्हें क़रीब से देखिये !

आपको आश्चर्य होगा कि यह शख़्स और कुछ नहीं, बस एक हरी, स्निग्ध कोंपल ही है , जो परबत-सी ज़िम्मेदारियों से कभी दब नहीं सकती !

लब्बोलुआब यह , कि जो कल्पनातीत उपलब्धियां हासिल करे – उसकी स्तुति करने के लिए आप बाध्य नहीं हैं ! मगर लज्जास्पद तरीके से उसकी निंदा के विडिओ आप ज़ारी करें, सामाजिक मीडिया की दीवारें आप दिन-रात काली करें, अपनी ऊर्जा का अधिकाँश भाग आप महज इसलिए

सिर्फ काले धुँए में तब्दील करते फिरें कि चंद सिक्के चाँदी के माहाना आपकी जेब में रखे जाते हैं – नितांत अन्यायपूर्ण है !

कलम के सिपाही अगर आप बने हैं , तो अपनी दृष्टि को साफ़-शफ़्फ़ाफ़ रखने के वास्ते उसमें नीर-क्षीर विवेक की दो बूँदें डालनी ही होंगी , कि नजरिया दुरुस्त रहे !

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