Super30 के आनंद कुमार कि एक आंख खोलने वाली, अभी तक अनकही-अनसुनी, एकदम भिन्न कहानी हमारी जुबानी

फिल्मे सिर्फ मनोरंजन का साधन ही नहीं होती बल्कि समाज का दर्पण, आवज़ और सोच होती है। कभी किसी ऐतिहासिक घटना की परतें खोलती तो कभी आवाज़ बनकर किसी ज्वलंत मुद्दे को सामने लाती तो कभी किसी व्यक्ति विशेष के जीवन पर आधारित हो सकती है। भिन्नता इतनी कि किवदंतियों से लेकर कल्पनाशीलता तक, किसी सचरित्र समाजसेवी से लेकर वांछित अपराधी /गैंगस्टर तक, धार्मिक मान्यताओं/घटनाओं/चरित्रों से लेकर विज्ञान/भविष्य के किरदारों तक पर, किन्तु ऐसी किसी भी फ़िल्म के लिए पटकथा तैयार करते वक़्त शोध की जाती है।

यदि फ़िल्म किसी वास्तविक चरित्र का जीवनी हो तो वैसी फिल्मो की आत्मा/आधार ही जमीनी शोध होता है, किन्तु एक बहुचर्चित निर्माणाधीन बायोपिक के संदर्भ में शोध में पुनः चूक की गई है या हो गया है। जी हाँ हम बात कर रहे है बिहारी गणितज्ञ आनंद कुमार जीवनी व हृतिक रोशन अभिनीत ‘सुपर 30’ की, इस फ़िल्म की एक तस्वीर इंटरनेट पर सनसनी बनी थी जिसमे इस ‘ग्रीक गॉड’ को एक आम इंसान के रूप में साईकल पर पापड़ बेचते दिखाया गया था। इस तस्वीर को बहुत से लोगों ने पसंद-नापसंद, शेयर और कमेंट किया लेकिन क्या यह विश्व प्रसिद्व गणितज्ञ ने वास्तव में इस प्रकार पापड़ बेचा था? क्या आनंद की जीविकोपार्जन का जरिया पापड़ बेचना ही था?

बिहार व बिहारियों के लिए आनंद परिचय के मोहताज नहीं है, वर्तमान समय में लोग आनंद, सुपर 30, रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स सभी को ही जानते है। यह बायोपिक एक जीवित व्यक्ति की जीवनी है ना कि पद्मावत की तरह बीते हुए इतिहास की, इसके मुख्य पात्र जीवित ही है व घटनाओं को ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ है, इसलिए हमने खुद इसकी जमीनी तहकीकात करने की सोची। हमने जानकारी जुटानी शुरू की तो सबसे पहले यह पता चला कि यह बायोपिक आनंद कुमार की बायोग्राफी पर आधारित है। इस इंटरनेट युग मे जानकारी के लिए जैसा सभी करते है वैसा हमने भी किया और ‘गूगल बाबा’ के साथ इंटरनेट को टटोला। हमें उनके बारे में इतनी भिन्न-भिन्न सूचनाये मिली कि दिग्भ्रमित होने लगे, तो खुद ही जमीनी स्तर पहल करने की सोची जो कि अभी तक किसी ने नहीं किया था। हमे अलजजीरा व डिस्कवरी चैनल द्वारा लंबे अंतराल पर की गई फॉलो-अप स्टोरीज मिली, जिसमे यह दिखाया गया है कि ‘सुपर 30’ वर्तमान समय में बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक व शिक्षाविद अभयानंद के निर्देशन में चल रही है। संशित मन से हमने और गहराई में जाने की सोची, थोड़ा और हाथ-पैर चलाया तो उनके पैतृक गांव के बारे में पता चला।

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तो निर्णय हुआ कि अगर शुरुआत करनी हो तो ‘देवदाहा’ से बेहतर क्या होगा। वहाँ से हमे जो जानकारी मिली वो कहीं नहीं थी, ना ही उनकी पुस्तक जीवनी में, ना ही इंटरनेट पर और ना ही मीडिया में। आइए आपको भी ले चलते है उनके पैतृक गांव ‘देवदधा’, धनरुआ थाना अंतर्गत पटना जिले का एक गांव, हमने जायजा लिया वहाँ की वर्तमान स्थिति का, वहाँ के लोगों का, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था का, हमें प्रतिक्रिया के रूप में यह मिला कि गांववालें विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ ‘आनंद कुमार’ से ज्यादा वहाँ की ‘खोवे की लाई’ को पसंद करते है। सामान्यतः पूरा गांव ऐसे किसी विश्व प्रसिद्ध व्यक्ति पर गर्व करता है किंतु यहाँ स्थिति नितांत भिन्न था।आइए जानते है एक आंख खोलने वाली, अभी तक अनकही-अनसुनी, इंटरनेट से एकदम भिन्न कहानी हमारी जुबानी-था, न उनकी जीवनी पुस्तक में, न इंटरनेट पर, न किसी मीडिया के जुबान पर।

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