स्कूल प्रशासन और अभिभावक दोनों की समान जिम्मेवारी है, छात्र।

स्कूल प्रशासन

स्कूल बनाम घटनास्थल

अनजान चीजों के लिए डर आम बात है। हम अपने बच्चों को जब भी कही बाहर अनजान जगह पर भेजते है तो डरते हैं। अकेले या किसी और के साथ, हम उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित हो जाते हैं। हम उनको इसलिए अपने या किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ रखते हैं। लेकिन वो हर जगह तो हमारे साथ नही रह सकते और अगर उनको हर जगह हम अपने साथ रखे भी तो कम से कम स्कूल तो एक ऐसी जगह होती है जहां हम नही होते उनके साथ। स्कूल के कुछ घंटे वो हमारे बिना ही बिताते हैं। तो ये स्कूल की जिम्मेदारी है कि वो वहां सुरक्षित रहे।
हम उन्हें स्कूल के गेट तक छोड़ते हैं और उनके अंदर जाते ही निश्चिन्त हो जाते हैं कि अब हमारा बच्चा हमारे बिना भी सुरक्षित है। स्कूल हमारे बच्चे के लिए अनजान जगह नही , वहाँ वह हर रोज़ आता है और अपना अच्छा खासा समय वहाँ गुजारता है। स्कूल हर बच्चे के लिए उतनी ही जानी पहचानी जगह होती है जितना कि उसका घर। वहाँ उसको अपने टीचर्स मिलते हैं जो उतने टाइम के लिए उसके अभिभावक की तरह ही होते है,उसके लिए उतने ही जिम्मेदार जितने उसके पेरेंट्स।
वैसे तो सारे स्कूल में इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता है कि बच्चों को ऐसी कोई भी दिक्कत न हो,वो वहाँ एकदम सेफ हों । पर फिर भी आये दिन इतनी घटनाएं हो जाती हैं बच्चों के साथ।कभी उनके किसी टीचर या स्कूल के अन्य स्टाफ के द्वारा या कभी उनके बस के ड्राइवर या कंडक्टर के द्वारा।
बच्चा स्कूल में अपने बेहतर भविष्य के लिए आता है ना कि अपना भविष्य और जिंदगी दोनो खत्म करने के लिए । तो ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे एक ऐसा माहौल दे जहाँ वो पूरी तरह सुरक्षित हो। ये स्कूल की भी जिम्मेदारी है और बच्चों के पेरेंट्स की भी।
स्कूल मैनेजमेंट को चाहिए कि वो इस बात के लिए पूरी तरह सचेत रहें कि बच्चा स्कूल में ज़रा भी असुरक्षित ना हो, किसी भी प्रकार से । इसके लिए अपने स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगवाए, क्लासरूम, कॉरिडोर, स्टाफरूम, ऑफिस हर जगह। स्कूल में कुछ टीचर्स की ड्यूटी होनी चाहिए इसी काम के लिए सिर्फ,जो बच्चों की पढ़ाई के अलावा और चीजों पर भी ध्यान दे। वॉशरूम के अलावा कहीं भी लॉक करने की सुविधा ही ना हो। स्कूल मैनेजमेंट को चाहिए कि वो अपने स्टाफ का वेरिफिकेशन करवाये और साथ ही साथ हर किसी के लिए आई डी कार्ड जरूरी हो , बिना आई डी कार्ड कोई स्कूल के अंदर जा ही सके। और सबसे बडी बात कोई भी छोटी सी ही गलती क्यों ना हो , छिपाए नहीं, गलती करने वाले को सज़ा दिलवाए। ज्यादातर स्कूलों में तो अगर कुछ ऐसी घटना होती है तो बजाय उस टीचर या दूसरा कोई जो भी आरोपी होता है , उसको सज़ा दिलाये उसको हटा दिया जाता है बस। स्कूल का नाम ना खराब हो इस डर से उस मामले को ही दबा देते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
स्कूल मैनेजमेंट के साथ साथ पेरेंट्स के तौर पर ये हमारी भी जिम्मेदारी है हम बिल्कुल सतर्क रहें अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए। पेरेंट्स को चाहिए कि वो स्कूल से जुड़े , स्कूल में क्या होता है इसको जाने । हर पेरेंट्स मीटिंग्स में जाये, उनके टीचर्स से मिले। अपने बच्चे के लिए सिर्फ पैसा कमाने में ही ना बिजी रहे, उसके स्कूल जा कर देखें कि क्या क्या इंतजाम है आपके बच्चे की सुरक्षा के लिए और अगर आपको कोई कमी लगती है तो उनको बताये ।
बच्चे के बस ड्राइवर , कंडक्टर के बारे में खुद भी पता करें। वो किस रुट से आपके बच्चे को लाता ले-जाता है ये पता होना चाहिए। सबसे जरूरी बात अपने बच्चे को सिखाएं की क्या अच्छा है क्या बुरा। बच्चे के साथ मित्रवत रहे जिससे वो अपनी हर बात आपसे शेयर करे और अगर उसके या किसी और के साथ कुछ भी अलग होता है तो वो आपको तुरंत बताये, बिना हिचके।

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ये जो स्कूलों में आये दिन घटनाये होती है उनके लिएजिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ स्कूलों की लापरवाही है और कुछ भी नहीं। उनकी लापरवाही का ही नतीजा होता है जो किसी बच्चे के साथ कुछ भी गलत होता है, क्योंकि अपराध करने वाले कि आपराधिक प्रवृत्ति भी तभी प्रबल होती है जब आपका रवैया ढीला होता है। जब उसको मौका मिलता है तभी वो अपराध करता है।
बच्चे बहुत बड़ी जिम्मेदारी होते है, ये स्कूल मैनजमेंट को समझना चाहिए। पेरेंट्स 5-6 घंटे के लिए बच्चे को आपको सौंपते है जिससे कि उनके बच्चे का अच्छा भविष्य बने ना कि इसलिए कि उनके बच्चे के साथ कुछ ग़लत हो। इसलिए स्कूल चलाये तो जिम्मेंदारी के साथ वरना कुछ काम करे, यूँ लापरवाही से बच्चो के भविष्य और उनकी जान से खिलवाड़ ना करें।

लेखक : इन्दु चौहान

ये उनके निजी विचार हैं। लेखिका शिक्षिका है और तनावमुक्त वातावरण में बच्चों के सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिकता के विकास के साथ ही शैक्षणिक विकास की पक्षधर है।

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