जानिए भारतीय संविधान के विवादास्पद नियम और कानून के बारे में पूरी जानकारी

भारतीय संविधान के कुछ ऐसे अनुच्छेदों का जिक्र देखने को मिलता है, जिनके बारे में अक्सर ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं कि एेसे अनुच्छेद विवादास्पद हैं।तो चलिए आज जानते हैं भारतीय संविधान के ऐसे अनुच्छेदों के बारे में।

1. ’35 A’ क्या है ?

इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए तत्कालीन सरकार ने धारा 370 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल किया था।इतिहास की माने तो इसे राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई 1954 को लागू किया था। इस आदेश के राष्ट्रपति द्वारा पारित किए जाने के बाद भारत के संविधान में इसे जोड़ दिया गया। अनुच्छेद 35A धारा 370 का हिस्सा है। इस धारा के तहत जम्मू-कश्मीर के अलावा भारत के किसी भी राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर में कोई संपत्ति नहीं खरीद सकता इसके साथ ही वहां का नागरिक भी नहीं बन सकता।

35A से जुड़ी घटना –

अलगाववादियों के बंद के आह्वान के चलते प्रशासन ने अमरनाथ यात्रा दो दिन के लिए रद्द किया था । अलगाववादियों ने घाटी में बंद का आह्वान अनुच्छेद 35-ए को समर्थन देने के लिए किया था, जो राज्य को विशेष अधिकार प्रदान करता है। अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक और यासीन मलिक ने ‘संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व’ के बैनर तले पूरे प्रदेश में दो दिन के लिए बंद का एलान किया था। कई संगठनों ने धमकी दी थी कि अगर कोर्ट इस अनुच्छेद को हटा देती है तो वे जन आंदोलन करेंगे।

2. धारा 370

जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है । जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है। जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है जबकी भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है ।भारत के उच्चतम न्यायलय के आदेश जम्मू – कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं। भारत की संसद को जम्मू – कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यंत सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है। जम्मू कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी। इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू – कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी। धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI और RTE लागू नहीं है वहीं, CAG भी लागू नहीं होता।

धारा 370 से जुड़ी घटनाएं

एक रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति आदर्श के गोयल और न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की बेंच की यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई करते हुए आई। इसमें दावा किया गया था कि धारा 370 एक अस्थायी प्रावधान के तहत लाई गई थी जिसे 26 जनवरी 1957 को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के भंग होने के साथ ही खत्म हो जाना था। इसमें यह भी कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर का संविधान निरर्थक, अप्रभावी और भारतीय संविधान का उल्लंघन है। धारा 370 न सिर्फ जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देती है, बल्कि इस राज्य के लिए कानून बनाने के मामले में केंद्र की शक्तियां भी सीमित करती है. इस पर काफी समय से बहस होती रही है। इसे हटाना केंद्र में इन दिनों सत्तासीन भाजपा के प्रमुख मुद्दों में से एक रहा है।

3. अनुच्छेद 356

अनुच्छेद 356, केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो। यह अनुच्छेद एक साधन है जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है। राष्ट्रपति शासन के आलोचकों का तर्क है कि अधिकतर समय, इसे राज्य में राजनैतिक विरोधियों की सरकार को बर्खास्त करने के लिए एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इसे कुछ लोगों के द्वारा इसे संघीय राज्य व्यवस्था के लिए एक खतरे के रूप में देखा जाता है।

अनुच्छेद 356 से जुड़ी घटनाएं

1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद से केन्द्र सरकार द्वारा इसका प्रयोग 100 से भी अधिक बार किया गया है। अनुच्छेद को पहली बार 31 जुलाई 1957 को विमोचन समारम के दौरान लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी केरल की कम्युनिस्ट सरकार बर्खास्त करने के लिए किया गया था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश की भाजपा की राज्य सरकार को भी बर्खास्त किया गया था।

4. धारा 377

आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से से अननैचुरल संबंध बनाते है और दोषी करार दिए जाते हैं तो उनको 10 साल की सजा से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है। यह अपराध संजेय अपराध की श्रेणी में आता है और गैरजमानती है।

आर्टिकल 377 से जुड़ी घटनाएं

2 जुलाई 2009 को नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो व्‍यस्‍क आपसी सहमति से एकातं में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को होमो सेक्‍सुअल्‍टी के मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक जजमेंट में समलैंगिगता मामले में उम्रकैद की सजा के प्रावधान के कानून को बहाल रखने का फैसला किया था।

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