नोटेबंदी फ़ायदा या नुकसान

आज 8 नवंबर है, भारतीय इतिहास के सबसे अधिक कठोर फैसलों में से एक ‘नोटबंदी’ के एक वर्ष पूरे हो जाएंगे। 2016-17 का सर्वाधिक चर्चित, विवादित, बोल्ड टॉपिक अगर कोई है तो, वह यही है। इस विषयवस्तु पर हर किसी ने अपने समझ के अनुसार कुछ-न-कुछ जरूर बोला।

नोटबंदी के तत्काल प्रभाव से समाज में थोड़ी उथल-पुथल मच गई और जीवन को वापस पटरी पर लौटने में समय लगा। किन्तु कुछ बैंकों के साथ-साथ बैंककर्मियों पर भी हेर-फेर का आरोप लगा। इस दौरान आम जनता के साथ-साथ बैंककर्मीयों ने भी इसके प्रभाव से बढ़े काम से नाखुशी जताई कई मौके पर 1% लोगों द्वारा यह सुनने को मिलता है कि नोटबंदी सफल हुई और टैक्स में इजाफा हुआ, digitaligatation हुआ और पारदर्शिता बढ़ी। जबकि सरकारी आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। एक बच्चा भी अपने अनुभव एवं ज्ञान से बता सकता है कि नोटबंदी का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया फैसला था। जबकि नोटबंदी हुई थी, तब इसके उद्देश्य नकली नोटों का व्यवसाय, घूसखोरी, जमाखोरी, काला धन, आतंकवाद आदि पर नियंत्रण था।

जब नीति निर्धारकों ने देखा की इन उद्देश्यों की पूर्ति ना होने पर उन्हें जनता का विरोध झेलना पड़ेगा। फलस्वरूप उन्होंने नया रास्ता अख्तियार किया और इसके नियम एवं उद्देश्यों में दिन-प्रतिदिन बदलाव करते चले गये। ये तो वही बात हो गई की खीर खाना चाहते थे, आपकी गलती से खिचड़ी और कहने लगे की खिचड़ी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। नोटबंदी के बाद ऐसी अफरा-तफरी मची कि आम लोग अपने 2000 और 4000 रूपये लेकर बैंक की लाइन में अपना धैर्य दिखा रहें थे की चलिये अभी का कष्ट कल को आराम देगा। सबने देखा की ठण्ड से ठिठुरता युवक अपनी ट्यूशन फी के लिए रात भर चादर ओढ़ कर बैंक के बाहर इंतज़ार कर रहा था, आपने देखा होगा कि कैसे लोग अपने ही पैसे निकालने के लिये पुलिस की लाठियाँ खा रहे थे, एक बुजुर्ग sline की बोतल लिए व्हील चेयर पर बैठा था, कैसे बैंकों के खुलने से पूर्व की कतारे बैंको के बंद होने तक रहती थी। इधर बैंक में भी पैसों की लगातार किल्लत थी, हॉस्पिटल में मरीज और लाइन में जनता दम तोड़ रही थी। बैंक में पैसे की लगातार किल्लत थी, इधर एटीएम में नए 500 और 2000 के नोट रखने की लिए सांचे नहीं बने थे और ऊपर से मोदी जी का जनता को थोड़ा सब्र रखने और आश्वासन दिया जाता रहा है कि अगले 50 दिनों के पश्चात स्थिति सामान्य हो जाएगी। भारत की सत्तारूढ़ सरकार जहां इसे अभूतपूर्व कामयाबी और उपलब्धि मानती है, वहीं विपक्ष इसे पूर्णतः असफल, दूरदर्शिता की कमी और अप्रयौगिक आदि कहने का कोई मौका नही छोड़ती।

सत्तापक्ष इसे काले धन के विरुद्ध एक बोल्ड फैसला मानकर जश्न मनाने की बात करती है, जबकि विपक्ष इसे आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला का तमगा देते हुए काला दिवस मना रही है। पिछले साल जब माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि नोटबंदी से तत्काल असुविधा, परेशानी और थोड़ी उथल-पुथल मचेगी, लेकिन दूरगामी प्रभाव सकारात्मक होगा। अब देखते है आज 8 नवंबर को पक्ष और विपक्ष भारतीय इतिहास के सबसे कठोर फैसलों में से एक को, कैसे आम जनता के बीच प्रदर्शित करते है। किन्तु आम जनता इस दौरान हुए दर्द और परेशानी को भूल भी गयी होगी तो पक्ष-विपक्ष के इस वर्षगाँठ के कारण उसकी टीस फिर से उठेगी।

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