मॉब लिंचिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट हुई सख्त ,केंद्र को कानून बनाने का दिया आदेश

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गौरक्षा के नाम हो रही मॉब लिचिंग यानी भीड़ द्वारा हत्या पर दायर याचिका पर सुनवाई पूरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने इस मामले में केंद्रीय और राज्य सरकारों को निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने मॉब लिंचिंग और गौरक्षा के नाम पर हत्याओं के बारे में सख्त अलवाज़ में कहा है कि कोई भी नागरिक अपने हाथों में कानून नहीं ले सकता है। भय और अराजकता की स्थिति में, राज्य सरकारें सकारात्मक काम करें वरना न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की नौबत आन पड़ेगी|

अदालत ने संसद को यह भी कहा कि क्या वह देख सकता है कि ऐसी घटनाओं के लिए कानून बनाया जा सकता है? इसके साथ ही अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से दिशानिर्देश जारी करने के लिए कहा है  और इस मामले में अगले 4 हफ्तों में जवाब देने के निर्देश दिए हैं।

सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा  ने उस लॉबी को भी बड़ा झटका दिया जो जाति और धर्म के आधार पर उन लोगों की क्षतिपूर्ति करने की मांग कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश, प्रसिद्ध वकील इंदिरा जयसिंह से असहमत होते हुए कहा कि इस तरह की हिंसा का कोई भी शिकार हो सकता है सिर्फ वो ही नहीं जिन्हें धर्म और जाति के आधार पर निशाना बनाया जाता है।

भारत के संविधान में अनुछेद 48 गौरक्षा की वकालत करता है और इसको कई कानून भी है लेकिन निगत वर्षो में मोदी सरकार के शासन में ऐसे मामलों तेज़ी से हो रही मॉब लॉन्चिंग जिसमे एक समुदाय विशेष के लोगों को गौ तस्करी या हत्या के शक भर से हत्या कर दी गई और इसको लेकर पीएम के आश्वासन और गृह मंत्रालय की एडवाइजरी के सिवा और कुछ देखने को नहीं मिला है तो जब इस मुद्दे को लेकर न्यायपालिका में जनहित याचिका डाली गई तो स्वयं चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया जस्टिस दीपक मिश्रा ने इसका संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से इसको लेकर कानून बनाने का आदेश दिया है तो अब देखना होगा मानसून सत्र में सरकार इस मुद्दे को लेकर कुछ करती है कि ध्रुवीकरण की राजनीति करते हुए इसे बढ़ाये रखती है क्योंकि विपक्ष तो साफ़-साफ़ सरकार पर हमला करेगा|

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