यह है भारत के इतिहास में हुई सबसे बुरी 5 प्राक्रतिक आपदाओं की सूची, जब प्रकृति मानवता पर भारी पड़ गयी

हम सिर्फ वो घटनाएं याद करते हैं, जो हमे आनंद देती हैं और चेहरे पर खुशिया लाती हैं, लेकिन भारत देश ने अपने इतिहास मे कई प्राकृतिक आपदाओं को देखा और उनसे सामना किया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में कई खतरनाक प्राकृतिक आपदाएं घटी हैं। नदी में बाढ़ से लेकर भूकंप, तेज बारिश, ओलावृष्टि, बादल फटना, भूस्खलन, बिजली गिरना आदि तक कई प्राकृतिक आपदाओं में कुल मिलाकर लाखों लोगों की जाने अकस्मात चली गयी हैं।

यह है भारत के इतिहास में हुई सबसे बुरी 5 प्राक्रतिक आपदाओं की सूची, तो आइये हम इन दर्दनाक, सबसे खतरनाक और विनाशकारी घटनाओ की जानकारी ले..

1.लातूर और गुजरात में भूकंप

रविवार को 30 सितंबर 1993 में महाराष्‍ट्र के लातूर में आया भूकंप सबसे घातक भूकंपों में से एक था, जिसने महाराष्ट्र के लातूर जिले को अधिक प्रभावित किया था। रात में आये हुए इस भूकंप ने सब कुछ अपने पेट में ले लिया और लोगों के आंखों से नींदे छीन ली। लातूर में भूकंप सुबह के 3.56 मिनट पर आया, जब ज्यादातर लोग अपने घरों में सोए हुए थे। जिस कारण जान-माल का ज्‍यादा नुकसान हुआ। इस विनाशकारी भूकंप में लगभग 20,000 लोग मारे गए और लगभग 30,000 से अधिक लोग घायल हो गए थे। भूकंप के एपिसेंटर किलारी में एक बड़ा सा गड्ढ़ा भी बन गया था। 30 हजार मकान गिर गए। इतने बड़े पैमाने पर हुए भूकंप के कारण संपत्ति का भारी नुकसान हुआ था, हजारों घर मलबे के रुप में बदल गये थे और भूकंप की तीव्रता 6.4 इतनी बड़ी थी की इस भूकंप ने 50 से अधिक गाँवों को नष्ट कर दिया था। कई लोगों को राहत व बचाव कार्य के दौरान सेना व बचाव दल ने मलवे से जीवित निकाल लिया।

बिल्कुल ऐसा ही भूकंप गुजरात मे हुआ 2001 में, जान लेते है क्या हुआ था,

भारत के 52 गणतंत्र दिवस 26 जनवरी, 2001 को ये भूकंप आया था, जब सुबह पौने नौ बजे गुजरात गणतंत्र दिवस मना रहा था। गुजरात में आये इस भूकंप की तीव्रता 7.6 और 7.7 के बीच थी। इस भूकंप में धरती 2 मिनट तक कांपी और भूकंप का एपिसेंटर कच्छ में भचाऊ तालुका के चोबारी गांव में था। 26 जनवरी 2001 की सुबह भुज और कच्छ में आए भूकंप ने पूरे देश में गणतंत्र दिन की खुशियों को दीन बनाया। जहाँ पूरा देश गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में जुटा हुआ था, वहीं गुजरात मदद की मांग कर रहा था और पूरा देश गणतंत्र दिवस पर गुजरात की मदद के लिए खड़ा हो गया। 2001 के भूकंप के बाद पूरा कच्छ ज़िला ध्वस्त हो गया था। करीब 700 किलोमीटर दूर तक झटके महसूस किए गए। इस भूकंप से सरकारी आंकड़ों अनुसार 30 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, न जाने कितने लोग घायल और चार लाख घरों को नेस्तनाबूद कर दिया। मलबों से जीवन निकालने का काम आसान नहीं था। इसमें भारतीय सेना की भी मदद ली गई, लेकिन इन घटनाओ ने भारत के इतिहास में घटे विनाशकारी घटनाओं के लिस्ट में अपना नाम दर्ज किया।

2. हिंद महासागर सुनामी, 2004

हिंद महासागर में आयी सुनामी का असर भारत सहित 14 देशों पर हुआ था।अंतरराष्ट्रीय समयानुसार रात 00:58:53 बजे इंडोनेशिया में सुमात्रा द्वीप के पश्चिमी छोर पर 9.2 तीव्रता का भूकंप आया था। इस भूकंप की वजह से हिंद महासागर में सुनामी की जबरदस्त (100 फीट तक) लहरें उठीं। इस सुनामी से मरने वालों की संख्या 2,30,000 थी। यह सुनामी भारत के इतिहास की सबसे बढ़ी आपदाओं में से एक थी। 2004 में 9.3 तीव्रता के भूकम्प के चलते हिन्द महासागर के सीने में से सुनामी की लहरें उठी और लहरों ने पूरे तटवर्तीय राज्यों को दहला दिया। ये 7 से 12 मीटर ऊंची की लहरें जब भारतीय तट से टकराईं, तो सभी तटवर्ती राज्यों में हाहाकार मच गया। भारत में इस सुनामी से तमिलनाडु और तट से लगे अन्य राज्यों में लगभग 8499 लोग और करीब 916 पशु मारे गए थे। इससे भारत के तटवर्ती राज्यों के 3415000 लोग प्रभावित हुए थे। इस प्राकृतिक आपदा ने हजारों लोगों की जान लेली और लाखों लोगों को बेघर कर दिया। भारत ने इससे पहले इतनी भयंकर आपदा नहीं झेली थी जिसके जख्म आज भी लोगों को याद है। भारत मे सुनामी से हुए नुकसान की भरपाई में लगभग 1 खरब 63 अरब 80 करोड़ रुपये खर्च किये। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह रिकॉर्ड किया गया दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा भूकंप था। इसकी विनाशकारी क्षमता हिरोशिमा मे डाले गए बमों के प्रकार के 23,000 परमाणु बमों की ऊर्जा के बराबर थी। हर तरफ सिर्फ लाशें ही लाशें थी। इसे इतिहास में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक माना जाता है।

3.केदारनाथ में तबाही, उत्तराखंड में आयी बाढ़, 2013

17 जून 2013 को उत्तराखंड राज्य में हुयी अचानक मूसलधार वर्ष इतनी ज्यादा मात्रा में दर्ज की गई जो, सामान्य से 375 प्रतिशत ज्यादा थी। जिसके कारण हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति पैदा हो गयी। बाढ़ के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ और बहुत से लोग बाढ़ में बह गए और हजारों लोग बेघर हो गये। इसी दौरान उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद नदियों का जल स्तर बढ़ गया। सैकड़ों गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया। नतीजा जनजीवन ठहर सा गया। बाढ़ के कारण भूस्खलन होने लगा, जिससे सैकड़ों घर उजड़ गये सबसे ज़्यादा तबाही रूद्रप्रयाग ज़िले के केदारनाथ में हुई। आस-पास के सारे इलाक़े या तो बह गए हैं या पूरी तरह तबाह हो गए हैं। एक साथ कई जगह बादल फटने और चौराबारी ग्लेशियर में अस्थायी झीलों के तटबंध टूटने के कारण आए जल प्रलय ने हजारों लोगों को अपने प्रवाह से डुबो दिया। सैकड़ों लोग तो बाढ़ के साथ आये लाखों टन मलबे में दब गए, जिनका आज तक पता नहीं चला। 24 जून 2013 तक इस भयानक आपदा में 5700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 14 से 17 जून, 2013 तक 4 दिनों के लम्बे समय तक बाढ़ और भूस्खलन जारी रहा। जिसके कारण 1,00,000 से अधिक तीर्थयात्री केदारनाथ की घाटियों में फँस गये थे। सैकड़ों की संख्या में लोग अब भी लापता हैं। इस बाढ़ ने उत्तराखंड में भयंकर तबाही की थी। उत्तराखंड में आयी यह बाढ़ भारत के इतिहास की अबतक की सबसे भयंकर बाढ़ थी।

4.1999 में ओडिशा में आया चक्रवात

अक्टूबर 25,1999 को आये इस चक्रवात से 15,000 लोगों की मौत हुई थी। यह तूफ़ान भारत में आया अब तक का सबसे विनाशकारी तूफ़ान था और उत्तर हिंद महासागर का सबसे शक्तिशाली चक्रवाती तूफ़ान था। यह तूफ़ान की केंद्रीय दबाव 912 मिलिबार था, जो एक रिकॉर्ड है | यह तूफ़ान एक सामान्य चक्रवात से एक बेहद शक्तिशाली चक्रवाती तूफ़ान में विकसित हुआ और 260 की.मी. प्रति घंटे की हवा गति के साथ उड़ीसा के तट के ऊपर से गुज़रा। हजारों परिवारों को मजबूरन ओड़िशा के तटीय इलाकों से हटाया गया। 17110 की.मी के क्षेत्र के फसल बर्बाद हो गए। लगभग 275000 घरों को क्षति पहुची, जिसके कारण 16 लाख लोग बेघर हो गए। तक़रीबन 25 लाख पालतू जानवर मारे गए, जिनमें से 4 लाख गायें थी। इस चक्रवात से 90 लाख लोग प्रभावित हुए हैं, जबकि 2400 करोड़ रुपये की धान की फसल बर्बाद हो गई। चारों तरफ अंधकार था, तूफान के वेग के कारण पेड़ और बिजली के खंबे उखड़ गए। भारी वर्षा के कारण लोग घरों के भीतर रहे और सड़कों पर वाहन रुक गए। तेज हवाओं और खराब मौसम के चलते समंदर में ऊंची लहरें उठी।

5.1943 और 1770 का बंगाल का अकाल

1943-44 में बंगाल में एक भयानक अकाल पड़ा था जिसमें लगभग 30 लाख लोगों ने भूख से तड़पकर अपनी जान जान गंवाई थी। चावल की कमी होने के कारण कीमतें आसमान छू रही थी, बाजार में चावल मिल नहीं रहा था, गावों में भूखमरी फैल रही थी। सड़कों पर भूख से हड्डी हड्डी हुई मांए दम तोड़ रही थीं। लोग सड़े खाने के लिए लड़ते दिखते थे। ऐसा ही अकाल बंगाल में आज़ादी पूर्व 1770 से 1773 तक लगभग 3 वर्षों तक लगातार जारी रहा। इस अकाल ने एक बड़े पैमाने पर बंगाल के आजादी के आजादी पूर्व राज्य ओडिशा और बिहार के कुछ हिस्सों को अत्यधिक प्रभावित किया था। यह अकाल भारत को अब तक प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक इस अकाल में भूख, प्यास और बीमारी के कारण लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी। लोग भूख, कुपोषण और बीमारी के कारण मर गए थे।

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