राजनीतिक पार्टियां हैं RTI कानून से बाहर: चुनाव आयोग

हाल ही में एक याचिका कर्ता के द्वारा राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए चंदे की जानकारी का विवरण मांगा गया था। जिसके जवाब में भारत निर्वाचन आयोग ने बताया कि राजनीतिक दल आरटीआई कानून के दायरे से बाहर हैं।जबकि आर टी आई व्यवस्था, ऐसी व्यवस्था मानी जाती है जिससे आप किसी भी प्रकार की जानकारी हासिल कर सकते हैं, जो  लोक हित में हो और उससे किसी भी प्रकार का माहौल बिगाड़ा ना जा सके ।

 

क्या था निर्वाचन आयोग का जवाब- 

निर्वाचन आयोग ने याचिकाकर्ता को जवाब देते हुए कहा कि राजनीतिक दल आर टी आई कानून के दायरे से बाहर हैं। केंद्रीय जन सूचना अधिकारी के बयान का जिक्र करते हुए बताया गया है कि अपीलीय आदेश में आयोग ने कहा कि “आवश्यक सूचना आयोग के पास मौजूद नहीं है। यह राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ है, और वे आरटीआई के दायरे से बाहर हैं। वह इलेक्टोरल बांड के माध्यम से जुटाए गए चंदे या धन की सूचना, वित्त वर्ष 2017- 18 के कॉन्ट्रीब्यूशन रिपोर्ट के जरिए केंद्रीय सूचना आयोग को सौंप सकते हैं। जिसके लिए निर्धारित तारीख 30 सितंबर 2018 है।” राजनीतिक दल ऐसी  जानकारी को साझा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। चुनाव आयोग ने यह जवाब एक आर टी आई आवेदक को दिया है जिसने 6 राष्ट्रीय दलों के द्वारा जुटाए गए चंदे के बारे में जानकारी मांगी थी। वहीं इन दलों को पारदर्शिता कानून के दायरे में लगभग 5 साल पहले ही लाया जा चुका है बावजूद इसके चुनाव आयोग ने ऐसा जवाब देते हुए इस बात से अपना पल्ला झाड़ लिया। 

 

सीआईसी ने लाया था पारदर्शिता कानून के दायरे में – 

सीआईसी यानी सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन के द्वारा जून 2013 में ही इन 6 दलों को पारदर्शिता कानून के दायरे में लाया जा चुका है । इस बाबत चुनाव आयोग के द्वारा इन दलों को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर बताने की बात सीआईसी के निर्देश के विपरीत है, जिसने 6 राष्ट्रीय दलों को पारदर्शिता कानून के दायरे में लाने का निर्देश दिया है। 

 

किन-किन दलों का मांगा गया था विवरण- 

पुणे के रहने वाले विहार ध्रुव ने आर टी आई के माध्यम से 6 राष्ट्रीय दलों के द्वारा जुटाए गए चंदे का विवरण मांगा था। इन छह राष्ट्रीय दलों में भाजपा,कांग्रेस, राकांपा, बसपा, भाकपा, माकपा, शामिल थे। इसके अलावा समाजवादी पार्टी द्वारा इलेक्टोरल  माध्यम से जुटाए गए चंदे की जानकारी मांगी गई थी।  

जबकि केंद्रीय सूचना आयोग की पूरी पीठ ने 6 राष्ट्रीय दलों को 3 जून 2013 को कानून के दायरे में लाया था। और अब चुनाव आयोग और केंद्रीय सूचना आयोग दोनों के सुर बदले बदले से नजर आ रहे हैं। 

 

 ऊपरी अदालत में नहीं दी गई चुनौती- 

इन ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि RTI व्यवस्था की हालत क्या है। एक ओर जहां इस आदेश को ऊपरी अदालतों में चुनौती नहीं दी गई तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों ने आर टी आई के आवेदनों को मानने से इनकार कर दिया है। राजनीतिक दल किसी भी सूरत में ये जानकारी साझा करने के लिए तैयार नहीं है कि उन्हें कितना चंदा मिला था । वहीं कई आवेदकों को संतुष्ट जवाब न मिलने के बाद उनके द्वारा उच्चतम न्यायालय में मामला लंबित पड़ा है, जिसकी अभी तक सुनवाई नहीं हो सकी है । 

 

 12 अक्टूबर 2005 को जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर RTI कानून पूरे देश में पूर्ण रूप से लागू किया गया। सूचना का अधिकार यानी आर टी आई को देश की जनता के लिए, सरकार द्वारा किए गए कामों, और योजनाओं में लगाई गई लागत की जानकारी लेने के लिए, विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास, आदि विषयों की जानकारी प्राप्त करने के लिए बनाया गया था। बाद में यह काफी कारगर भी साबित हुआ जिसमें बड़े बड़े खुलासे हुए लेकिन मौजूदा आरटीआई व्यवस्था राजनीतिक दलों के आगे बेबस और बेजान दिखाई पड़ रही है। उम्मीद है कि इस पर जल्द ही त्वरित कार्यवाही की जाएगी ।

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