लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लड़खड़ा रहा है, भारत पत्रकारों के लिए ‘दूसरा सबसे खतरनाक’ देश है।

पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। लोकतंत्र में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पत्रकार अपनी लेखनी से समाज में घट रही घटनाओं की खबर लिखता है। लेकिन जैसे-जैसे समाज में अत्याचार, भ्रष्टाचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स इस पत्रकारों के लिए काम करने वाली संस्था का कहना है कि, दुनिया भर में पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि, आजकल अखबार, टीवी चैनल, वेब पोर्टल, दूरदर्शन केंद्र, आकाशवाणी, एफ एम रेडियों केंद्र आदि के मालिक किसी न किसी पार्टी के होते है। ऐसे में पत्रकारिता को अपने व्यवसाय व राजनीतिक हित भी देखना पड़ रहा है और इसका दबाव पत्रकारों के ऊपर आ रहा है। ब्रिटेन की संस्था इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सबसे खराब पांच देशों की सूची में भारत पत्रकारों के लिए ‘दूसरा सबसे खतरनाक’ देश है।

गत कई वर्षो से पत्रकारों पर भारत के विविध प्रांतो में हमले हुए। इन सभी मामलों में जो बातें सामने आई हैं वो ये कि, हत्या और हमले का आरोप नेताओं, बाहुबलियों और पुलिस पर समान रूप से लगा है। मारे गए पत्रकारों ने प्रभावशाली लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी और ये सभी स्वतंत्र पत्रकार थे। पिछले 7 महीने में देशभर में 9 पत्रकारों की हत्या ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। खासतौर पर बेंगलुरु में गौरी लंकेश की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस साल पत्रकार की हत्या का पहला मामला 15 मई को तब सामने आया जब मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थानीय समाचार पत्र में काम करने वाले श्याम शर्मा की हत्या कर दी गई। इसके बाद मध्य प्रदेश में ही दैनिक नई दुनिया के पत्रकार कमलेश जैन की पिपलिया में गोली मारकर हत्या कर दी गयी। भारत में अकेले छत्तीसगढ़ में इस साल के शुरूआती 11 महीने में 14 पत्रकार गिरफ्तार किए गए। इसमें वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा भी शामिल हैं। साथ ही इसी साल कर्नाटक में भी विधायकों के खिलाफ अपमानजनक आलेख लिखने के मामले में कन्नड़ पत्रिका के 2 पत्रकारों पर कार्यवाई की गयी।

पत्रकारों पर हुए हमले की सबसे बड़ी दर्दनाक घटना बेंगलुरु में हुई जब हमलावरों ने गौरी लंकेश के घर में घुसकर, गोली मार कर उनकी हत्या की। लंकेश पर 5 सितंबर, 2017 को हमलावरों ने सात गोलियां दागी थी। गौरी लंकेश कन्नड़ टैब्लॉइड अखबार ‘गौरी लंकेश’ की संपादक और हिंदू राइट-विंग विचारधारा और संगठनों की आलोचक थीं। गौरी लंकेश की हत्या के 2 दिन बाद 7 सितंबर को बिहार के अरवल में राष्ट्रीय सहारा समाचारपत्र में काम करने वाले स्थानीय पत्रकार पंकज मिश्रा को दो बाइक सवारों ने गोली मार दी। पंकज की हत्या के 13 दिन बाद त्रिपुरा में स्थानीय टेलीविजन पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या की गई। 13 मई 2016 को सीवान में हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ऑफिस से लौट रहे राजदेव को नजदीक से गोली मारी गई थी। पत्रकारों पर सिर्फ भारत में ही हमले नहीं हुए है, बल्कि पूरी दुनिया में 2016 के 4 महीनों में 19 पत्रकार मारे गए।

2011 से लेकर 2017 तक भारत देश के विविध राज्यों में पत्रकारों पर हमले हुए। इन 6 सालों में इन हमलों तादाद काफी बढ़ चुकी है। मई 2015 में मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की कवरेज करने गए आजतक के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। अक्षय सिंह की झाबुआ के पास मेघनगर में मौत हुई। उनकी मौत के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। जून 2015 में मध्य प्रदेश में बालाघाट जिले में अपहृत पत्रकार संदीप कोठारी को जिंदा जला दिया गया। महाराष्ट्र में वर्धा के करीब स्थित एक खेत में उनका शव पाया गया। साल 2015 में ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया। आंध्रप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एमवीएन शंकर की 26 नवंबर 2014 को हत्या कर दी गई। एमवीएन आंध्र में तेल माफिया के खिलाफ लगातार खबरें लिख रहे थे। 27 मई 2014 को ओडिसा के स्थानीय टीवी चैनल के लिए स्ट्रिंगर तरुण कुमार की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं से यह पता चलता है कि, कुछ खास लोगों की खास जानकारी इन पत्रकारों के हाथ लग चुकी थी या फिर उसके नजदीक वे पहुंच चुके थे जिसके चलते उनकी हत्या कर दी गई।

साल 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान नेटवर्क18 के पत्रकार राजेश वर्मा की गोली लगने से मौत हो गई। महाराष्ट्र के पत्रकार और लेखक नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को मंदिर के सामने उन्हें बदमाशों ने गोलियों से भून डाला। रीवा में मीडिया राज के रिपोर्टर राजेश मिश्रा की 1 मार्च 2012 को कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी। राजेश का कसूर सिर्फ इतना था कि, वो लोकल स्कूल में हो रही धांधली की कवरेज कर रहे थे। मिड डे के मशहूर क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की 11 जून 2011 को हत्या कर दी गई। वे अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कई जानकारी जानते थे। डे पर कुछ मोटर साइकिल सवारों ने गोली चलाई थी, जिस से उनकी मौत हो गई थी। डे अंडरवर्ल्ड के मुद्दों पर लिखा करते थे। आपको बता दे की,  सोशल मीडिया पर जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक कुल 17 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। यह रिपोर्ट काफी हैरान करने वाली है।

इन घटनाओं से एक बात जो सामने आती है, वो यह कि, बीते 4-5 सालों में भारत में पत्रकार नक्सलियों, माफियाओं, राजनीतिकों, अपराधियों के निशाने पर हैं और इन पर होने वाले हमले को रोकना सरकार व समाज का प्रथम दायित्व बनता है, साथ ही आज आवश्यकता बन गई है कि, इस पर कानून बनाकर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्थाई व्यवस्था की जाए, ताकि पत्रकारों पर हमले न हो सके। हमारे देश के संविधान में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा दिया गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि, इस पेशे से जुड़े लोगों का जीवन खतरे में है।

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