सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वतंत्र इकाइयों की गिरती साख

एक महत्वपूर्ण घटना जिसके ऊपर अचानक सारा बुद्धिजीवी वर्ग कल से चिंतित नजर आ रहा है और ये होना स्वभाविक भी है क्योंकि जिस तरह से देश के स्वतंत्र विभागों पर एक एक कर सवाल खड़े हो रहे हैं वो सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले देश के लिए एक अत्यंत संकट का विषय है ।

जिस तरह से लगातार चुनावो के बाद चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे इस फेहरिस्त में देश के एक और स्वतंत्र इकाई (सुप्रीम कोर्ट) पर जिस तरह के सवाल खड़े किए गए हैं वे अत्यंत सोचनीय है कि किस तरह उसके सबसे उच्च पद पर काबिज मुख्य न्यायधीश पर उनके ही चार वरिष्ठ साथी जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के (अमूमन सुप्रीम कोर्ट के जज मीडिया के सामने नही आते) उंगली उठाई है की उनको उनका काम ठीक ढंग से करने नही दिया जा रहा है। वरिष्ठ जज जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि जब MOP ( उच्च न्यायालय में जजों की नियुक्ति का ज्ञापन ) पर सुनवाई के अधिकार संवैधानिक पीठ को है तो इसे किसी और जज को क्यों और कैसे दे दिया गया?

साथ ही साथ कुछ दिनों पहले स्पेशल CBI जज जस्टिस लोया के मौत के केश का मनमुताबिक हस्तांतरण किया गया यह भी एक गम्भीर विषय है साथ ही यह भी बताते चलें कि जस्टिस लोया के मौत के केश में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह का नाम भी सुर्खियों में रहा है। और साथ ही साथ CJI द्वारा कॉलेजियम सिस्टम के सुधार पर कोई अपेक्षित कदम न उठाए जाने पर भी सवाल खड़े किए गए हैं ।

जस्टिस चेलमेश्वर ने CJI पर महाभियोग के सवाल पर कहा कि ये फैसला जनता को करना है।इस मामले की गम्भीरता को देखते हुए अभी तक भारत सरकार की तरफ से कोई टिप्पणी नही आई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार क्या कदम उठाती है।

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