अंतरष्ट्रीय महिला दिवस – एक दिन महिलाओ के नाम।

अंतरष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरष्ट्रीय महिला दिवस – एक दिन महिलाओ के नाम। एक दिन जिसमे हम महिलाओं की उपलब्धियों को बताते है। कैसे वे हर क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन कर रही हैं ,ये बताने का दिन।ये दिवस जिसको 100 साल से भी ज्यादा साल पहले शुरू किया गया,इसका मुख्य उद्देश्य है लैंगिक असमानता को खत्म करना। महिलाओं की समानता के लिए आवाज़ उठाना।

इस दिवस को मनाने की जरूरत ही हमे इसलिए है क्योंकि अब भी महिलाएं और पुरुषों की बराबरी की सिर्फ बात होती है , उन्हें बराबर समझा नही जाता है। “द इकोनॉमिक फोरम” के अनुसार अब भी 200 साल लग जाएंगे लैंगिक समानता में । इस दिवस को मनाने की जरूरत है क्योंकि अब भी महिलाओं को #metoo जैसी मुहिम की जरूरत है।

माना कि महिलाएं पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में कमतर नहीं है चाहे वो राजनीति, चिकित्सा, विज्ञान, सेना कोई भी क्षेत्र हो। लेकिन इसके साथ साथ ये भी सच है कि ये संख्या बहुत ही कम है और साथ ही साथ इतने बड़े बड़े क्षेत्र में होने के बाद भी वो महिलाएं खुद भी लैंगिक असमानता का शिकार होती हैं, चाहे असमान वेतन की बात हो या उनको मिलने वाली सुविधाएं या किसी काम का श्रेय। उनको अब भी पुरुषों से कम ही समझा जाता है।

और जब ये हमारे समाज की सफल महिलाओं के हाल है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं की वो आबादी जो छोटी जगहों से हैं, जहाँ लड़कियों को मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नही वे कितनी मुसीबतों का सामना करती होंगी। जिस बच्ची के लिए ना पढ़ाई है ना सुरक्षा का माहौल उससे हम किसे उम्मीद कर सकते हैं आगे जा कर उसके अच्छे भविष्य की। जब हम लड़कियों को इस लायक ही नही बनाएंगे कि वे अपनी जिंदगी किसी और पर निर्भर हुए बिना भी जी सकें तो कैसे हम घरेलू हिंसा को रोकने की बात कर सकते है। जो लड़की शिक्षित नहीं और ना ही आत्मनिर्भर वो कैसे घरेलू हिंसा का शिकार होने पर उसका विरोध कर पाएगी! और विरोध कर के कहाँ जा पाएगी, जब वो पूरी तरह से अपने घर के पुरुषों पर ही निर्भर है।

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लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए हमे सफल महिलाओं को उपलब्धियों से ज्यादा ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की समस्याओं को जानने की जरूरत है। खास तौर पर उन बच्चियों के के बारे में जो आगे चल कर हमारे समाज की महिलाएं बनेगी। हमे ये सुनिश्चित करना पड़ेगा कि इनका भविष्य सुरक्षित हो। जब तक ये बच्चियाँ बराबरी पर नही आएंगी तबतक लैंगिक समानता कभी हो ही नही सकती। जब तक इनको बराबरी का अधिकार नही मिलेगा तब तक कौन सी लैंगिक समानता? हमारा समाज इन सब से मिलकर बना है, ऐसा तो नही है कि चंद सफल महिलाएं जो किसी कंपनी की सीईओ हैं या सफल नेता उनसे ही हम महिलाओं के उपलब्धियों का आंकलन कर लेंगे।

ऐसा नही है कि जो महिलाएं शिक्षित है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर उनको किसी समस्या का सामना नही करना पड़ता या वो कभी इस पुरुष प्रधान समाज का शिकार नही बनती। कुछ महिलाएं तो पैसे कमाने के बाद भी अपने उन कमाए पैसों को भी खर्च करने का हक़ नही रखती। वे आत्मनिर्भर होने के बाद भी कई अन्य कारणों से हिंसा का शिकार होती हैं और तब भी अपने लिए आवाज उठाने से डरती हैं चाहे वो सामाजिक या पारिवारिक दवाब हो या उनका खुद का डर। ये महिलाएं अब भी अपने मन से आत्मनिर्भर नही हुई है। लेकिन इनकी स्थिति तब भी लाख गुना सही है उन ग्रामीण महिलाओं से क्योंकि जब भी ये चाहेंगी तब ही अपनी शिक्षा और आत्मनिर्भरता के कारण इनके लिए अपने हक़ की लड़ाई बहुत आसान होगी। लेकिन बिना आत्मनिर्भर हुए ये नही संभव।

तो इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम महिलाओं की उपलब्धियों को गिनने के साथ साथ महिलाओं की समस्याओं पर भी ध्यान दे ख़ासतौर पर उन महिलाओं की जो ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हैं, जिन्हें ये ही नही पता कि उनके अधिकार क्या क्या हैं। जागरूकता की कमी है, सबको जागरूक बनायें ।वे महिलाएं जो खुद सक्षम हैं वो आवाज़ बने उनकी, जिन्हें आपकी जरूरत है।

सभी महिलाएं खुद के हक़ के लिए आवाज़ उठाये, बिना डरे और बिना समाज की चिंता किये। क्योकि समाज आपसे मिलकर बना है और हिंसा का शिकार होने के बाद यूँ चुप बैठ के हम उसको और बढ़ावा देते हैं। बहुत से लोग आपको फॉलो करते है चाहे वो आपकी बेटी, बहन या कोई अन्य महिला हो, वो सब आपसे सीखते हैं। इसलिए अपने अधिकार जानिए औऱ अपनी और अपने से कमज़ोर महिलाओ की आवाज़ बने। बिना डरे सहमे आगे बढ़िये अपनी सफ़लता को ओर,और उदाहरण बनिये वर्तमान में अपने आस पास उपस्थित महिलाओं तथाअपनी आने वाली पीढ़ी की महिलाओ के लिए।

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