सुनीता को मिला आशीर्वाद

 

“कबीरा जब हम पैदा हुए जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोये”

रचयिता जब किसी को बड़ा या छोटा बनाने की ठानता है, तो उसका मकसद भी साफ़ होता है। अलग बात है, हममें कोई दिव्य दृष्टि, नहीं वर्ना जीवन से हमें कभी कोई शिकायत नहीं होती। सुनीता केड़िया चार भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं। बिहार के खगड़िया में सुनीता का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। बच्चों के लालन-पालन में पिता की भूमिका नगण्य थी। सबसे बड़ी सुनीता को बचपन में ही माँ के साथ परिवार चलाने का हुनर आ गया। माँ की उत्कृष्ट सोच और अदम्य साहस का परिणाम ये हुआ कि सुनीता १०वीं की परीक्षा शत प्रतिशत नंबर से पास कर अपने स्कूल की टॉपर रहीं। अपनी पढ़ाई के दौरान ही सुनीता अपने से छोटे क्लास के बच्चों को पेंटिंग और क्राफ्ट सिखाने लगी थी। कहतें हैं न ”पूत के पांव में पालने में ही दिख जाते हैं ” हुनर की धनी सुनीता धुन की भी धनी बनने लगी। घर में आय भी हो जाती और सुनीता की स्वयं की हौसलाअफजाई भी। विषम परिस्थितियां सुनीता के पांव की बेड़ियाँ बनने लगीं। कहाँ वो अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी और कहाँ वो रिश्तेदारों के बीच और परिवार की मानसिक, आर्थिक स्थिति में बोझ बनने लगी। सुनीता साइंस ले के आगे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। स्कूल के अध्यापकों का पूरा सहयोग भी जरा इस बार सुनीता को नियति से न बचा पाया।

परिणय सूत्र के धागे में बांध दिया गया सुनीता को। अच्छा लड़का घर-बार इतना ही तो क्राइटेरिया है न बेटी के विवाह का, सो हो गया। मन का मीत मिला पर मन मार के। शादी भी सामान्य आय वर्ग में ही हुई थी। सुनीता पति के साथ जयपुर शिफ़्ट हो गई। समय के साथ एक नयी जिंदगी ने भी किलकारी भरी। सुनीता एक प्यारे से बेटे की माँ बन गई। एक जिंदगी सांस लेने लगी और अभी माँ जी भर के लाड़ले संग उसका बचपना जीती कि, नियति ने फिर दस्तक दी। पति को कैंसर जैसी भयंकर बीमारी हो गई। वाह रे ईश्वर धन्य है तू भी! सुनीता की नयी दुनिया जहाँ अस्पताल, डॉक्टर, दवाइयां और घर की खोखली होती पोटली। 

इस नयी जिंदगी में एक सितारा उदय होने को था। ये बात या तो विधाता को पता थी या फिर सुनीता को। संतान की उत्पत्ति से ज़्यादा ज़रूरी है उसका लालन-पालन। ये बात सुनीता तो अपने बचपन में ही जान गयीं थीं। ”दूध का जला छांछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।”

आशीर्वाद जिसे घर में सुनीता प्यार से अनमोल बुलाती हैं, कि शिक्षा सार्थक हो और नाम भी इस जद्दोजहद में लग गई। शहर बदलने लगे और जीवन जीने के तरीके भी। पहली कक्षा में सेंट ज़ेवियर्स स्कूल साहेबगंज में दाख़िला हुआ। फिर पटना के एक मोंटेसरी स्कूल में। अनमोल को इसी बीच कुछ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हुई और स्कूल से बाहर होना पड़ा। अहमदाबाद शिफ़्ट हुई सुनीता, फिर मेहसाणा। शिक्षा कहाँ मुफ़्त की हो और गुरुजनों का सहयोग भी मिले ये था सुनीता का नया तरीका अनमोल को अनमोल बनाने का। मिशनरीज़ स्कूलों की तलाश देहरादून ले गई छोटे अनमोल को। दो साल वो हॉस्टल में रहा वहां। इसी बीच सुनीता पुनः गर्भवती हुईं। बच्चे आपसे पूछ कर नहीं पैदा होते और उनको मारने का हक़ भी आपको नहीं, ऐसा सुनीता का मानना हैं। बीमार पति, घर से दूर अनमोल के बीच एक नन्ही सी जान ने किलकारियां भरीं। करीबियों के गर्भपात करा लेने के सलाह को धत्ता बताते हुए अपने ही रिश्ते में उन्होंने एक निःसंतान दंपत्ति की गोद भर दी।

                         “अगर पलक पे हैं मोती तो ये नहीं काफी,
                           हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का”  (ग़ज़ल-ज़ावेद अख़्तर)

आशीर्वाद अब ८वीं दर्ज़े में था। साल २०१३ पति ने भी सात साल के बाद सुनीता को अलविदा कह दिया। ९वीं और १०वीं पटना के डी.ए.वी स्कूल में हुई अनमोल की। इन सब दिनों में सुनीता को कुछ वक़्त ने माँजा और ज़्यादा वो ख़ुद को माँजती रही। अपने घर का कारोबार जो कि फैशन ज्वेलरी का था, सुनीता उसे जारी रखे हुए थीं। अपने संघर्षरत दिनों में उन्होंने मेकअप आर्टिस्ट का कोर्स किया मुंबई आकर। दूसरों को सजाने का हुनर क्या आया कि ख़ुद की ज़िंदगी भी सजने लगी। लॉरिअल जैसे नामी ब्रांड का ”कलर ट्रॉफी अवार्ड” जिसमें मेकअप आर्टिस्ट का ख़िताब सुनीता की झोली में आया।

इधर अनमोल भी अपनी १०वीं की परीक्षा में अव्वल आया। एक सवाल फिर अब आगे की पढ़ाई कैसे? किसी भी बेहतरीन संस्थान में दाख़िला इतना आसान तो कभी नहीं रहा पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी अब इतनी आसान नहीं रही। कोचिंग संस्थाओं की महंगी फी एक साधारण और निम्न आय वर्ग को ये सोचने पर मजबूर करती है, पढ़ाई उम्दा विषय से करें। सुनीता स्वयं विज्ञान विषय से पढ़ना चाहती थीं। जो सपना वो नहीं जी पाई थीं, वो अनमोल की आंखों में भरना चाहती थीं।

हमारी बातचीत के दौरान सुनीता जरा संज़ीदगी से कहती हैं ”मेरी बुनियादों में कोई टेढ़ थी, अपनी दीवारों को क्या इल्ज़ाम दूँ।”

और अपना बचपन मैं कतई दुहराना चाहती थी, सो एक अदद तलाश शुरू हुई और मुक़म्मल हुई ‘अभयानंद सुपर 30’ में आकर। सुपर 30 एक ऐसी संस्था जहाँ ”शिक्षा बिकाऊ नहीं और किसी धनाढ़्य की थाती भी नहीं के भाव से’’ बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार कराती है। सुपर 30, उर्मिला सिंह प्रतापधारी सिन्हा फाउंडेशन और इसके ट्रस्टी ए.डी.सिंह सिंह द्वारा सहयोग प्राप्त एक ऐसी संस्था जहाँ चाहने वालों को राह मिल ही जाती है। पूर्व डीजीपी अभयानंद की उम्दा सोच, सधे हुए गुरु पंकज, अरुण और रवि सर एवं सुपर 30 टीम के सभी सहयोगी सदस्य इस मकसद से जीते हैं कि खुद से अतर जीवन को जीने का जरिया कैसे सिखाया जाये विशेषकर उन छात्रों को जिनमें आग तो है कुछ कर गुजरने की पर सुविधा की लौ नहीं है।

अनमोल और सुनीता के लिए ये संस्था वरदान साबित हुई। दो साल की कठिन मेहनत रंग लायी। अपने पहले प्रयास में ही अनमोल का सेलेक्शन भारतीय प्रोद्योगिकी विज्ञान संस्थान मुंबई में हो गया। ये एक साझा प्रयास था सुपर 30, माँ सुनीता और अनमोल का। सबने मिल के अनमोल के लिए सपना देखा और अनमोल भी सबकी आँखों में चमक लाने में सफल रहा। सुनीता सुपर 30 का नाम लेते ही भावुक हो जाती हैं। सुविधा वंचित होना कोई अभिशाप नहीं।

अनमोल भी परवरिश की कसौटी पर सौ फीसदी खरा उतरा। माँ से कदमताल करते वक़्त मासूम पांव ममता की छांव से निकल के माँ के लिए सुकून बन गये।

अनमोल मेरा ईश्वर का आशीर्वाद ही है, ये कहते सुनीता की आवाज़ की खनक गर्व से भरी होती है।

नियति ने एक बार और दस्तक दी सुनीता को पर इस बार सुनीता के हौसले के सामने नतमस्तक हो। घर वालों की राय से सुनीता ने एक नयी पारी की शुरुआत की। जीवन साथी की तलाश जिस उम्र के पड़ाव पर सबसे ज्यादा होती है, उस दहलीज पर आ खड़ी थी सुनीता। एक घर का दरवाजा जो मेरा इंतज़ार कर रहा था वो था जय काबरा का घर। जय भी अपनी पहली पत्नी को खो चुके थे। एक प्यारी सी बिटिया काव्या के पिता हैं और अब सुनीता के जीवनसाथी और अनमोल के पिता भी। जय जो पेशे से चार्टेड अकॉउंटेट हैं, अपनी पत्नी के बारे में कहते हैं ”she lives for the universe. ”

अब जय और सुनीता अपने पारिवारिक व्यवसाय को नयी रूपरेखा देने में लगे हैं। ‘रेशम‘ जो एक फैशन ज्वेलरी ब्रांड बनकर उभरता नाम है। जहाँ गुणवत्ता पर पूरा जोर दिया जाता है और उचित दाम पर जन सामान्य को भी उपलब्य हो सके, इसकी पूरी ताक़ीद की जाती है। इस व्यवसाय के जरिये वो हर जरूरतमंद व्यक्ति/स्त्री की मदद करना चाहती हैं, जो छोटे या बड़े शहरों में अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए या तो किसी पर निर्भर हैं या फिर संघर्षरत। इस कार्य में बेटी काव्या काबरा भी माँ की हमकदम है।

सुनीता सामाजिक और राजनितिक पटल पर भी सामानांतर रूप से भी सक्रिय हैं। कई प्रतिष्ठित सम्मान भी सुनीता ने हासिल किये हैं। बिहार प्रदेश मारवाड़ी सम्मलेन २०१५ का ‘महिला उद्यमी रत्न’ सुनीता के नाम है। स्तन कैंसर जैसे गंभीर बीमारी पर सुनीता का रूख़ भी सराहनीय रहा। राजधानी में आयोजित ‘पिंक वॉक’ का हिस्सा बन उन्होंने महिलाओं को स्तन कैंसर पर जागरूक किया।

उनसे हुई बातचीत के दौरान उन्होंने समाज को कभी रंज़िशें नज़र से नहीं देखा। एक खूबसूरत मुस्कान के साथ कहती हैं, लोग मिलते गए, कारवां बनता गया। नियति की बिसात पर शह और मात का नाम ही तो है ज़िन्दगी। जो मिला गले लगा लिए और जो नहीं मिला वो तो हमारा हिस्सा था ही नहीं।

हमारी बातचीत को हमने ”नमन’‘ कह समेटा, और मैंने मन ही मन कहा ”अच्छा किया जो तूने आँचल को परचम बना दिया।”

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