आखिर इस तारिख को फिक्स हुई ट्रम्प -किम जोंग की मुलाक़ात

शुक्रवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नार्थ कोरिया के राजदूत किम जोंग चोल से मुलाक़ात की और उन्हें एक औपचारिक पत्र सौंपा जिसमें अंकित था कि वह 12 जून को सिंगापुर में उनके देश यानी नार्थ कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग से मुलाक़ात करेंगे |

अमेरिका के प्रसिद्द अखबार वाल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार किम जोंग ने स्वयं ट्रम्प के साथ शिखर वार्ता में रूचि दिखाई है जिससे ट्रम्प भी खुश है | राजदूत से मुलाक़ात के बाद ट्रम्प ने मीडिया प्रतिनिधियों से सिंगापुर चलने की तैयारी करने को कहा |

किम के करीबी चोल ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ से दो दिनों तक मुलाक़ात की थी जिसके बाद वह राजधानी वाशिंगटन पधारे | चोल पर यूँ तो अमेरिका में प्रतिबन्ध था लेकिन जिस तरह के समीकरण बने है उससे अमेरिका के रुख में नमी दिखी है ऐसा 18 सालो में पहली बार हुआ है जब कोई उत्तर कोरियाई अधिकारी अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने ओवल ऑफिस पहुंचा हो ,तो वास्तव में यह एक ऐतिहासिक पल है |

एक तरफ 65 साल पुरानी दुश्मनी दोस्ती में तब्दील हो जाये यह पूरा विश्व उम्मीद लगाए हुए है ताकि समृद्धि ,शांति और विकास संभव हो सके | परन्तु एक प्रश्न अभी भी है कि परमाणु स्थल नष्ट करने के बाद भी क्या नार्थ कोरिया अपने परमाणु हथियारों को पूरी तरह नष्ट करेगा ? क्या अमेरिका उसी मनाने में कामयाब होगा ? एक्सपर्ट्स की माने तो जैसे ट्रम्प एक बात पर अटल नहीं रहते जैसे उन्होंने ऐन मौके पर मुलाक़ात को पिछले महीने रद्द कर दिया वैसे ही किम जोंग भी अपनी जुबां पर स्थिर रहे इसकी उम्मीद कम ही है क्योंकि उन्होंने हमेशा यह दलील दी है कि अमेरिका से अपनी रक्षा करने के लिए उसे परमाणु शक्ति बने रहने की आवश्यकता है और एक वजह है अपने लोगों के भीतर अमेरिका के प्रति डर पैदा कर उनको अपनी एजेंडे पर चलवाना |

टैरिफ वॉर छेड़ देने के बाद से यूरोप ,चीन व रूस जैसी महाशक्तियां अमेरिका से खफा है और चीन की तो मानो कमर ही टूट गयी है इसलिए शिष्टाचार की चाशनी में नार्थ कोरिया को डिबोकर चीन अपनी कूटनीतिक बिसात बिछाये है जिससे लगता है कि वह ट्रम्प वाले अमेरिका से डायरेक्ट पंगा फिलहाल नहीं लेना चाहता है तो देखते है क्या यह मीटिंग होगी और यदि होगी तो क्या दोनों पक्ष एक आम सहमति पर पहुंच पाएंगे क्यूंकि एक का हित दूसरे पर आघात करने वाला है |

मेरी नज़र में हर तरफ से मार झेल रहे नार्थ कोरिया को अमेरिका की बात माननी ही पड़ेगी वरना वह अपने परमाणु स्थलों को नष्ट न करता और ऊपर से उसका हुक्का-पानी देखने वाले चीन की भी यही इच्छा है कि अमेरिका को प्रसन्न करे तो यह समझौता करवाने की एवज़ में उसके ऊपर लगे टैरिफ वापस हो या तो कम कर दिए जाएँ और अंत में बात अमेरिका की करें हुआ तो अच्छा न हुआ तो बुरा दूसरे का ही क्योंकि हर स्तिथि में विश्व के सत्ता केंद्र अमेरिका के पास चीज़ का तोड़ है इसलिए यह गेम पहले से उसका है |

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