क्या दलितकार्ड दिलाएगा बीजेपी को आनेवाले चुनावों में सत्ता? भारतीय राजनीति में दलित कार्ड कितना महत्व रखता है?

भारतीय राजनीति में दलित कार्ड कितना महत्व रखता है?

भारत देश मे सबसे ज्यादा संख्या में दलित और गरीब लोग रहते है।  देश में अनुसूचित जाति-जनजाति की आबादी करीब 20 करोड़ है। लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसका मतलब लोकसभा के 131 सांसद इस आबादी से आते हैं। इनमें से 67 सीटें भाजपा के पास हैं। आज तक दलित वोटों के चलते ही सत्ता में आये हर सरकार ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया है। 2014 में पूर्ण बहुमत से सत्ता पाए हुए मोदी सरकार को भी चुनावों में पहली बार लगभग एक-चौथाई दलितों ने मतदान किया। लेकिन 2014 के बाद लगातार दलित जनता में सरकार के प्रति रोष बढ़ता हुआ दिखाई दिया। जिसके चलते देश मे हुए कई विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में बीजेपी की हार होती हुई दिखाई दी। इसी कारण आनेवाले 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के लिए दलितों के वोट सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।

4 साल में भाजपा ने दलित वोटरों को लुभाने के लिए कई बार दलित कार्ड का इस्तेमाल किया। इसके चलते भाजपा ने दलित समुदाय के नेता को राष्ट्रपति बनाया। अब केन्द्रीय योजनाओं में ज्यादा राशि रखकर यह साबित करने का प्रयास किया जाएगा कि, भाजपा ही दलितों के हितों का ध्यान रख सकती है। अगर हम पीछे मुड़ कर भारत के राजनैतिक इतिहास को देखें, तो भारत की आजादी की लड़ाई में कांग्रेस और महात्मा गांधी ने कई बार अछूतोद्धार मुद्दे को उठाया है और एक अहम स्थान दे रखा है। वैसेही पीएम मोदी सत्ता में आने के बाद हमेशा से दलितों के विकास की बात करते रहे हैं। अपनी दलित हितैषी छवि बनाने और दलित समाज तक उसे पहुंचाने के लिए वे और भाजपा के नेता बहुत प्रयत्नशील है। इससे पता चलता है कि, भारत की राजनीति में दलित कार्ड कितना महत्त्व रखता है।

दलितकार्ड दिलाएगा बीजेपी को आनेवाले चुनावों में सत्ता?

लोकसभा चुनावो से पहले होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और राजस्थान विधानसभा चुनावों में मिजोरम को छोड़कर तीन अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव में ओबीसी बड़ा वोट बैंक है। इन्हें आकर्षित करने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को अंबिकापुर में रैली को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘‘मैं स्पष्ट रूप से यह कहना चाहता हूं कि, एससी/एसटी अधिनियम और आरक्षण तब तक लागू रहेगा जब तक भाजपा सरकार सत्ता में रहेगी।’’ अमित शाह ने कहा, ‘यहां के अभूतपूर्व जनसमूह को देखकर लग रहा है कि, राज्य में एक बार फिर रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है।’ इस बयान से पता चलता है कि, अगर भाजपा को इन राज्यों में सत्ता पर आना है, तो वोटरों का ध्रुवीकरण करना होगा। अगर 2014 और उसके बाद हुए चुनावो में वोटरों का ध्रुवीकरण देखा जाए, तो यह साफ साफ देखा जा सकता है कि, जाति और धर्म अभी भी प्रभावी हैं, साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब भी लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं और इसके चलते भाजपा साल 2019 के लोकसभा और उससे पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ व कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग के साथ खड़ा दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

यह बात तो बिल्कुल साफ है कि, भाजपा कई राज्यों में हिंदू एकीकरण के कारण ही सत्ता में आई है। अगर भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में नहीं जीत पाई तो भाजपा का सत्ता में बने रहना कठिन होगा। इसके चलते भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने किया हुआ यह बयान, काफी मायने रखता है। इस बयान के बाद यह तो साबित हो गया है कि, 2019 चुनाव के पहले दलित ही नहीं अब विभिन्न जातियों को रिझाने की कोशिश शुरु हो गयी है। हर राजनीतिक पार्टी व मोर्चा अब जातीय सम्मलेन और बैठक का आयोजन करने जा रहा है। चुनावी वर्ष के पहले हर राजनीतिक दलों की निगाह दलितों के धुव्रीकरण रहेगी और यह बात तो साफ है कि, जो इसके मजबूत चक्रव्यूह का निर्माण करेगा वही 2019 से आगे के 5 साल तक का सत्ता का ताज अपने सिर पर रखने में कामयाब हो पायेगा।

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