जानिए क्यों हुई लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भाजपा की हार, क्या 2019 साल रहेगा चुनौती भरा?

देश में हुएं लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में, विधानसभा के 11 सीटों में से मात्र एक पर बीजेपी की जीत हुई है, जबकि चार लोकसभा में एक पर बीजेपी और एक पर बीजेपी समर्थित उम्मीदवार की जीत हुई है। साथ ही देश की निगाहें जिस जगह पर टिकी हुई थी, वो कैराना उपचुनाव में आरएलडी के बैनर पर संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी उम्मीदवार मृगांका सिंह को 49 हजार से ज्यादा वोटों से करारी शिकस्त दे दी है।

11 विधानसभा सीटों में से सिर्फ एक सीट पर ही बीजेपी को जीत प्राप्त हुई है। यह सीट उत्तराखंड की थराली विधानसभा सीट है। बीजेपी विधायक मगनलाल शाह के निधन से यह सीट खाली हुई थी और बीजेपी ने उनकी जगह मुन्नी देवी को उतारा था। इनके अलावा झारखंड में सत्ताधारी बीजेपी को भी झटका लगा है। वहां दोनों विधानसभा सीट पर विपक्षी जेएमएम ने कब्जा बरकरार रखा है। पड़ोसी राज्य बिहार में जेडीयू की जोकीहाट सीट को विपक्षी राजद ने ले लिया है। पंजाब की एक सीट पर कांग्रेस, महाराष्ट्र की पलसू काडेगांव सीट पर कांग्रेस, कर्नाटक की आरआर नगर सीट पर कांग्रेस, मेघालय की अंपाती सीट पर भी कांग्रेस उम्मीदवार की जीत हुई है, जबकि केरल में चेंगानूर सीट पर सीपीएम, पश्चिम बंगाल की महेशताला सीट पर तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार की जीत हुई है।

जैसे ही कल 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के नतीजे आए, यह पता चला कि, गोरखपुर, फूलपुर के बाद कैराना में भी बीजेपी‌ की हार हुई है। अब ऐसे में विपक्षी दलों का यह हौसला और मजबूत हुआ है कि, रणनीतिक रूप से मजबूत गठबंधन कर 2019 में बीजेपी को सत्ता में वापसी से रोका जा सकता है।

हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 72 और अपना दल को एक सीट पर जीत मिली थी। इस तरह यूपी की 80 लोकसभा सीटों में बीजेपी के पास 73 सीटें थीं, यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में एक बार फिर पार्टी ने 403 विधानसभा सीटों में से 312 पर जीत दर्ज की, लेकिन अब बीजेपी के पास 73 लोकसभा सीटों में से 70 सीटें रह गई हैं, 3 सीटें हाथ से निकल गई हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि, बीजेपी को हार का मुंह क्यों देखना पड़ रहा है?     ‎

1. किसानों की कर्जमाफी 

पूरे देश में सबसे ज्यादा गन्ना किसान वेस्ट यूपी में हैं। इसलिए गन्ना किसानों की समस्याएं भी यहां सबसे ज्यादा है। आंकड़ों की मानें तो वेस्ट यूपी में गन्ना किसानों का 12 हजार करोड़ रुपयों का भुगतान होना है, जो अभी तक नहीं हुआ है। जबकि देश के पीएम आैर प्रदेश के सीएम 2014 आैर 2017 के चुनावों में इस बात वादा तक कर चुके हैं। लेकिन अभी तक उनका भुगतान नहीं हुआ है। जिसकी वजह से किसानों में भाजपा प्रति काफी रोष था।

2. विपक्षी एकता

विपक्षी पार्टियों के एकजुट होने से बीजेपी का सामाजिक समीकरण और वोट बैंक बिगड़ा है। कैराना में बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण बनी समाजवादी पार्टी, आरएलडी, बीएसपी और कांग्रेस का एक साथ आना। बीजेपी के खिलाफ इस जंग में बीएसपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने आरएलडी उम्मीदवार का साथ दिया और सबने मिलकर कैराना में बीजेपी के किले को ढहा दिया।

3.जिन्ना विवाद की वजह से वोटरों का ध्रुवीकरण हुआ, जो बीजेपी को उल्टा पड़ गया। साथ ही दलित उत्पीड़न और बलात्कार की बढ़ती घटनाएं भी कारण बनी, जिसके चलते भाजपा के वोट कम हुएं।

4.सबसे बड़ा संकेत इन उप-चुनावों में जाट किसानों और मुसलमानों के बीच अतीत का भाईचारा। चुनाव प्रचार के दौरान हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा तूल नहीं पकड़ पाया।

5.पिछले कुछ महीनों में हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट आरक्षण की मांग के लिए जाटों ने आंदोलन किए, लेकिन उनके खिलाफ केस दर्ज किए गए और आरक्षण की मांग पूरी नहीं हुई।‌

6.साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों के खिलाफ हुई हिंसा ने भी दलित समुदाय में बीजेपी के प्रति गुस्सा भर दिया, जिसका नतीजा इलेक्शन में बीजेपी के खिलाफ वोट के रूप में सामने आया।

7.मुस्लिम समुदाय के लोगों को गौरक्षा के नाम पर निशाना बनाए जाने से मुस्लिम समुदाय में नाराजगी और भी बढ़ी है। कैराना में जाट, मुस्लिम और दलित तीनों का ही दबदबा है, और तीनों ही बीजेपी से खफा है। ये वजह भी बीजेपी की हार का बड़ा कारण बनी।

8.गन्ना किसान उचित दाम और बकाया रकम न मिलने से नाराज़ हैं। यह भी वजह रही कि, बीजेपी को गन्ना किसानों की नाराजगी का सामना करना पड़ा।

9. यूपी आैर केंद्र की बीजेपी सरकार ने किसानों को बीज पर डेढ़ गुना अनुदान देने का वादा किया था। लेकिन अभी तक यह दावा को हकीकत की जमीन पर नहीं आया है। जिससे भी किसान काफी नाराज था।

10. ‎सरकार का पाकिस्तान से चीनी के आयात का फैसला कर किसानों को नाराज कर दिया है। कैराना के बीजेपी के खिलाफ नतीजे उन्हीं फैसलाें का परिणाम हैं।

हाल ही में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई।‌ साथ ही कैराना के परिणामों का असर बिहार और दक्षिण की सियासत पर भी पड़ेगा। बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहने में माहिर नीतीश बीजेपी के अपने नए-नए साथ पर कोई बड़ा फैसला भी ले सकते हैं। उधर, दक्षिण की सियासत में भी बीजेपी को घेरने की कोशिश हो रही है। एक तरफ आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू ने बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता का झंडा उठाया है तो दूसरी तरफ तेलंगाना ने टी चंद्रशेखर राव ऐंटी बीजेपी, ऐंटी कांग्रेसी गठबंधन की कोशिश कर रहे हैं। अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। तीनों जगहों पर बीजेपी की सरकार है। इन राज्यों में बीएसपी की संक्षिप्त ही सही लेकिन प्रभावी उपस्थिति है। यूपी में संयुक्त विपक्ष का मॉडल सफल होता देख अब इन राज्यों में भी कांग्रेस बीएसपी समेत अन्य छोटी-छोटी पार्टियों को एकजुट करने में जुट गई है,‌ ऐसे में 2019 के लिए उसकी उम्मीदें और भी धुंधली हो जाएंगी।

‎साल 2014 में बीजेपी ने भले ही प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की हो, लेकिन साल 2014 के आम चुनावों के बाद बीजेपी का ग्राफ लगातार गिरा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण उपचुनावों में बीजेपी की हुई हार है और इसके ‌चलते आनेवाला 2019 साल बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा।

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