राजनीति से किस प्रकार संविधान को खतरा है?

राज करने की नीति कैसी हो यही “राजनीति” कहलाती है| भारत दुनिया का सबसे व युवा लोकतान्त्रिक देश है जो अपने संविधान के ढाँचे पर काम करती है| भारत एक संवैधानिक ,संघीय ,संसदीय ,लोकतान्त्रिक गणतंत्र है| भारत में सत्ता के दो केंद्र होते है -केंद्र सरकार व राज्य सरकार क्योंकि भारत एक द्वि-राजतन्त्र का अनुसरण करता है यानी केंद्र में एक केंद्रीय सत्ता वाली सरकार और उसके अंतरगर्त राज्यों में राज्य सरकार|

भारत में लोकतंत्र के तीन अंग वर्णित है – कार्यपालिका ,न्यायपालिका और विधायिका| वास्तव में इन तीनो का संविधान के प्रति मूल्य कर्तव्य है – उसकी रक्षा और उसका अनुपालन करना लेकिन जब हम व्यवहारिकता की कसौटी पर देखें तो कार्यपालिका संविधान को लागू करवाती है , न्यापालिका उसकी संरक्षक है तो वहीँ विधायिका उसमें संशोधन करते हुए दोनों कानून बनवाती है|

मौजूदा दौर में राज करने की नीति ऐसी बदली है कि नीति अब इस सिर्फ राज करनी की हो चली है| मान लीजिये कि “राज” ऊपर और “नीति” नीचे दब गयी है| पहले यह सिर्फ राजनीति और राजनेताओं के दायरे तक ही था पर यह बदनुमा कीचड़ अब हमारे अन्य संवैधानिक अंगो तक भी अपने पैर पसारना शुरू कर चुका है| अब तक स्वंतंत्र और स्वायत्ता प्राप्त न्यापालिका भी राजनीती से ग्रसित दिखी जब 4 वरिष्ठम जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ -मीडिया के समक्ष मोर्चा खोल दिया जिसने न्यापालिका व विधि क्षेत्र में व्याप्त काली राजनीती को उजागर कर डाला जिस पर अक्सर बात तो होती थी लेकिन अफ़सोस आज तक कुछ भी नहीं| फिर सब ने देखा वकीलों की लॉबी में दो फाड़ ! कोई सीजेआई के साथ , कोई 4 जजों के साथ तो कोई तटस्थ! बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया भी तमाशा देखने के बाद डैमेज कण्ट्रोल करने को आ जाता है पर अंत में मीटिंग्स का दौर और समय के साथ एक-एक करके जजों की विदाई और उसके बाद कौन किसे पूछने वाला है ? सवाल ही रह जाते है – अगर कुछ होना नहीं था तो किया ही क्यों ऐसा?

प्रयास के बिना आखिर पहल किस बात की ? आप जपेंगे ईमानदारी पर आपकी नियत में बेईमानी का इत्र है !

अब इस घटना से दो बातें – नेगेटिव और पॉजिटिव ली जा सकती है| एक तो यह कि न्यायपलिका जो कि भारतीय लोकतंत्र का तीसरा अंग है उसको मीडिया यानी चौथे स्तम्भ से संवाद कायम करना पड़ा जिससे एक लोकतान्त्रिक संवाद का उम्दा उदाहरण देखने को मिलता है लेकिन यह पॉजिटिव पहलू मन को सिर्फ बहलाता है क्योंकि मर्म समझना है तो नेगेटिव पहलू की तरफ जाइये – तीसरा अंग न्यायपालिका चौथे स्तम्ब मीडिया से लोकतान्त्रिक संवाद तो करती है तो ठीक है लेकिन वह उससे क्या याचना करती है ? हमें इस राजनीति से बचाओ हम इससे ग्रस्त है ? वह भी उस मीडिया से जो खुद राजनैतिक सम्पादक मण्डली के जकड़ में न जाने कब से है! ऐसे में एक बंदी तो दूसरे बंदी की रिहाई कैसे कर सकता है ? एक दुखद लोकतंत्र की दयनीय स्तिथि|

वक़्त अभी भी है खैर न करिये कुछ इस पर काम करिये क्योंकि कही देर न हो जाये !

तो निचोड़ यही है कि जब तक नीति पुनः राज करने की नहीं होगी तो हाँ संविधान को राजनीति से खतरा हर जगह , हर पल और हर मोर्चे पे है| ज़रुरत है सुधार की जगह क्रान्ति लाने की क्योंकि अभी नहीं तो कभी भी नहीं!

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