राष्ट्रीय त्योहारों पर राजनीति क्यों? क्या यह जनता के साथ हो रहा विश्वासघात नही है ?

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है, जहां प्रत्येक महीने में कोई ना कोई त्योहार जरूर होता है। इन त्योहारों के आते ही राजनीति भी गरमा जाती है। भारत में हर त्योहार को लेकर राजनीति की जाती है। इसके पीछे सिर्फ लोगों को लुभाकर उनके वोटों को अपनी तरफ आकर्षित करना यही एक कारण होता है, फिर उत्सव चाहे दही हांडी हो या फिर गणपति उत्सव और मुद्दा साइलेंस जोन को कम करने का हो या फिर पटाखे फोड़े जाने का। कभी कभी तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक चला जाता है, दलीलें पेश की जाती है, सुनवाई होती है, किसी एक वर्ग को आकर्षित करने के लिए इतना सब कुछ किया जाता है और फिर चुनावों के पहले श्रेय लेने के लिए पक्षों में खींचतानी होती है। साथ ही हर एक राजनीतिक दल ने अपना अपना एक त्योहार तय कर लिया है। ईद को ऐसे ही त्योहार में माना जाता है। इसी तरह होली का त्योहार है। पिछले कुछ समय से छठ पूजा का राजनीतिक इस्तेमाल शुरू हुआ है।

हाल ही में देखा जाए तो, कांग्रेस 2 साल बाद दिल्ली के होटल ताज में इफ्तार पार्टी का आयोजन कर रही है। लेकिन इफ्तार के मौके पर ही इस पार्टी का आयोजन क्यूं ? इस सवाल का जवाब यह है कि, इफ्तार के इस मौके का फायदा उठाकर राहुल गांधी 2019 के आम चुनाव के लिए महागठबंधन करना चाहते हैं। लेकिन इस त्योहार में जनता शामिल नहीं है, जबकि सत्ता पर आने के लिए यह लोग जनता का ही सहारा लेते है। अगर इनकी राजनीति से जनता का फायदा होनेवाला है और इनके कहने के अनुसार अगर पार्टी जनता के विकास के लिए काम करती है, तो इनके आयोजित किए गए पार्टियों में इन्हे जनता- जनार्दन को भी शामिल करना चाहिए। लेकिन सिर्फ स्वार्थ के हेतु से आयोजित किए गए इन पार्टियों से जनता के भावनाओं के साथ, इस त्योहार के प्रति उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ किया जाता है।

शहरी इलाकों में और ग्रामीण क्षेत्रों में हर स्तर पर जो चुनाव होते हैं, उनमे हारे हुए उमीदवार को, नाराज उमीदवार को मनाने के लिए और जीते हुए उमीदवार के जश्न के लिए इन पार्टियों का ऐलान किया जाता है, जहाँ पर जनता का ही पैसा पानी की तरह बहा दिया जाता है, ताकि पार्टी सत्ता मे टिकी रहे। यह साफ है कि, रोजा इफ्तार पार्टियों का आयोजन करने वाले नेता केवल मुसलिम वोटों को आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं। होली, दीपावली, मकरसंक्रांत पार्टियों का अईजं करने वाला नेता हिन्दू वोटों को और ऐसाही चलता रहता हैं। यदि ये कार्यक्रम विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सद्भाव को बढ़ाने की नीयत से आयोजित हों तो अलग बात है, लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं होता।

इतने सालों से राजनीतिक दल ही नहीं, राज्य सरकारें भी इफ्तार पार्टियां कर रही हैं, जिसमें जनता का पैसा खर्च होता है। जनता के मन में हमेशा से यह प्रश्न है कि, सरकारें एक समुदाय के धार्मिक पवित्र त्योहार को मना कर क्या संदेश देना चाहती हैं? इफ्तार पार्टीबाजी, राजनीतिक गठबंधन को बनाने-तोड़ने या शक्ति-प्रदर्शन के लिए नहीं है। यह तो दो प्रार्थनाओं के बीच के समय में आत्म-मंथन करने का सुनहरा मौका देता है। रोजा तो उसी का खुलवाया जाता है, जिसने पूरे दिन रोजा रखा हो। जब किसी ने रोजा ही नहीं रखा, तो उसको इफ्तार पार्टी में बुला कर रोजा खुलवाना उस व्यक्तिव धार्मिक रीति को नीचा दिखाना नहीं तो क्या है? इफ्तार का या फिर किसी भी धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार का राजनीति से कोई संबंध नहीं है, लेकिन राजनीति का इनके साथ संबंध गहरा होता जा रहा है। हालांकि देश के नागरिक बहुत समझदार हैं, इसलिए वे इनके झांसे में आने वाले नहीं हैं। उन्हें समझना चाहिए कि परिपक्व लोकतंत्र में वोट मजहबी पार्टियों से नहीं मिलते, विकास और सिर्फ विकास से मिलते हैं।

मीडिया में छपे एक समाचार के अनुसार हमारे हिन्दुस्तान के एक भाई एडवोकेट मुहम्मद खालिद जिलानी ने प्रधानमंत्री कार्यालय से यह सुचना मांगी थी कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पद ग्रहण करने के बाद से लेकर अब तक सभी धर्मों के कौन- कौन से पर्व, त्योहार पर बधाई संदेश देशवासियों को किस माध्यम से दिया है। दूसरी जानकारी यह मांगी गई थी कि, ईद-उल-फितर, ईद-उल-जुहा और ईद-ए-मिलादुन्नबी के अवसर पर पीएम मोदी ने बधाई संदेश दिए हैं कि, नहीं और तीसरी जानकारी यह चाही थी कि, पीएम मोदी 2014 व 2015 में किस- किस रोजा इफ्तार पार्टी में शामिल हुए है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें जानकारी दी है कि, प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2014 व 2015 में किसी भी रोजा इफ्तार पार्टी में शिरकत नहीं की है। इससे पता चलता है की, देश का पंतप्रधान इस प्रकार की राजनीति मे ज्यादा विश्वास नही रखता।

एक सीधी सी बात है की, आज तक इन पार्टियों से मुसलमानों, हिंदुओ का या फिर किसी भी जाती का क्या फायदा हुआ है ? इसलिए इस चीज का दिखावा करने की जरुरत ही क्या है? हमारे देश में गरीबों की संख्या अधिक है, जो जल्दी बहकावे में आ जाते हैं। क्या यह उनके साथ किया हुआ विश्वासघात नही है ? जनता का गुस्सा तभी कम होगा जब सरकारें वो करेंगी जो करने के लिए उन्हें चुना गया है। अगर राजनीति’ का अर्थ है, राज करने की नीति व नियम। तब इस प्रकार एक खास समुदाय को लुभाने की राजनीति करना, राजनीति के नीति और मूल्यों के साथ खिलवाड़ नही तो क्या है? इसलिए यह सवाल खड़ा होता है राष्ट्रीय त्योहारों पर राजनीति क्यों?

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