2019 के लिए क्या होगी अमित शाह की ‘चाणक्य’ नीति! कौन सा दल है एनडीए की रीढ़ की हड्डी?

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए के ढीले पुर्जे कसने की कवायद शुरू कर दी है। एनडीए के कई संगठन सरकार से नाखुश चल रहे हैं। लोकसभा चुनावों के आने में अभी 11 महीने बाकी हैं, लेकिन अमित शाह ने इसी कारण अभी से ही एनडीए के घटक पक्षों के प्रमुखों से मिलना शुरू कर दिया है। घटक दलों के प्रमुखों के साथ बंद दरवाजे के पीछे हो रही मुलाकातों से देश में राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। इसका अंदाजा अमित शाह के मैराथन बैठकों से लगाया जा सकता हैं।

बुधवार को अमित शाह मुंबई में एनडीए के घटक दल शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे से उनके आवास मातोश्री में करीब दो घंटे मिलें। उनके बीच दो घंटे तक बातचीत हुई। हालांकि मुलाक़ात के बाद शिवसेना का बयान आया कि, वह अकेले ही चुनाव लड़ने के अपने फैसले पर कायम है। लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है की, राज्य में शिवसेना को भाजपा की जरूरत है। साथ ही एनडीए का भाग रह चुकी चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी पहले ही एनडीए से बाहर जा चुकी है। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों तक उन्हें भी एनडीए में फिरसे शामिल करने का जोरो से प्रयास अमित शाह करेंगे।

वहीं पंजाब में एनडीए के घटक दल में शामिल अकाली दल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भारतीय जनता पार्टी से नाराज चल रहा है।  साथ ही अकाली दल की मांग है कि, स्वर्ण मंदिर समूह के लंगर को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाए। हालांकि केंद्र सरकार ने मांग मंजूर की है, लेकिन तब जब केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अपना पद छोड़ने की धमकी दी। इसीलिए अकाली दल के नेताओं को मनाना और उनके साथ बातचीत करना भाजपा के लिए और NDA के लिए जरुरी था। इसके चलते बुधवार को शिवसेना से मिलने के बाद, गुरुवार को चंडीगढ़ में अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल से हुई मुलाक़ात अमित शाह के लिए आश्वस्त करने वाली थी। दोनों नेताओं के बीच गठबंधन को आगे ले जाने के लिए करीब दो घंटे तक बातचीत हुई। अमित शाह से मुलाकात के बाद सुखबीर सिंह बादल ने बताया कि, बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन टाइम टेस्टेड है, जो कि मजबूत है और आगे भी कायम रहेगा। वहीं, बिहार में नितीश कुमार के साथ भाजपा का संपर्क और समर्थन तो बना हुआ है, लेकिन भविष्य में इसके बने रहने की बजाय टूटने की आशंका ज्यादा है। वहीं जनता दल यूनाइटेड के नेताओं के बयान से लग रहा है कि, उनके अलग होने का संकेत ज्यादा हैं। इसीलिए यहां पर अमित शाह को अपना पूरा अनुभव लगाना होगा।

पिछले चार साल में बीजेपी ने अपने घटक दलों के साथ मिलकर बीस से ज्यादा राज्यों में अपनी सरकार बनाई है। त्रिपुरा से लेकर दक्षिण-पश्चिम में गोवा तक पार्टी का परचम लहरा रहा है। बीजेपी के शीर्ष नेता हमेशा अपने भाषणों में सरकार के कार्यक्रम और नीतियों से ज्यादा बात कांग्रेस मुक्त भारत पर करते हैं। 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ‘मोदी वर्सेज ऑल’ का नारा बीजेपी के कोर वोटर्स को पसंद आया, लेकिन बीजेपी जैसे-जैसे ‘मोदी वर्सेज ऑल’ के रास्ते पर आगे बढ़ रही है, नये साझीदारों के एनडीए से जुड़ने की संभावनाएं खत्म होती जा रही हैं। अगर विपक्ष की ताकत को इकट्ठा किया जाये तो देशभर की 543 लोकसभा सीटो में 429 सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी को बेहद कड़ी टक्कर मिलती नजर आ रही है। पिछले चार साल में बेशक बीजेपी ने बहुत से विधानसभा चुनाव जीते हों, लेकिन गठबंधन के रूप में एनडीए को नहीं संभाल पाई है। इसीलिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह समय चुनौतियों से भरा हुआ है। उनके सामने एनडीए के बाकी दलों को साथ लेकर चलने के साथ ही पार्टी को 2014 की तरह एक और बड़ी जीत दिलाना यह भी लक्ष्य है और इसीलिए साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति से और घटक पक्षों का साथ मिलकर, भाजपा आगे जाएगी।अगर बीजेपी सहयोगियों को साधने में नाकाम रहती है तो उसका सरकार में रहना मुश्किल हो सकता है।

टीडीपी के अलग होने के बाद एनडीए में बीजेपी के साथ अभी शिवसेना, जेडीयू (जनता दल (यूनाइटेड) , अपना दल, एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी), एसएडी (शिरोमणि अकाली दल), आरएलएसपी (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी), पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी), पीएमके , एसडब्ल्यूपी, एनपीपी और एआईएनआर कांग्रेस हैं।

क्यों जरुरी है दलों का साथ?
चुनाव को लड़ने का पहला तरीका है, जनमत को अपने पक्ष में मोड़ना और दूसरा, तालमेल के जरिये अंकगणित अपने पक्ष में बिठाना। आनेवाले समय में ऐसा लग रहा है कि,‌ जनमत को अपने पक्ष में बनाये रखने के साथ बीजेपी को अंकगणित पर भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी और इसीलिए जरुरी है दलों का साथ। इस वजह से हाल ही के दिनों में अमित शाह ने अपने घटक पक्षों के साथ बातचीत करने का सिलसिला शुरू किया है। इसका मतलब साफ है कि, वे अपने बाकी दलों को साथ लेकर 2019 के लोकसभा चुनावों का सामना करेंगे।

जो पार्टियां एनडीए में मौजूद हैं, वे लगातार शिकायत कर रही हैं कि, बीजेपी गठबंधन धर्म भूल चुकी है। सत्ता में आने  बाद भाजपा हमें भूल चुकी है। इन सारी शिकायतों को ध्यान में रखे, तो यह बात बहुत साफ है कि, बिना किसी चमत्कार के 2019 में बीजेपी का अपने दम पर सत्ता में पहुंच पाना कठिन है। यानी एनडीए में इस वक्त कोई ऐसी पार्टी ढूंढना मुश्किल है, जो यह खुलकर दावा करे कि, वह बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार है। इसलिए घटक दलों को भाजपा की और भाजपा को एनडीए कायम रखने के लिए और सत्ता में रहने के लिए घटक दलों की जरूरत है।

कौन सा दल है एनडीए की रीढ़ की हड्डी?


शिवसेना महाराष्ट्र में बीजेपी की सबसे पुरानी मगर आक्रामक आलोचक सहयोगी मानी जाती है। हाल में शिवसेना ने एनडीए से राह अलग करने के संकेत दिए है। एनडीए में शिवसेना अपने 19 सांसदों के साथ बीजेपी के बाद दूसरी बड़ी पार्टी है। सूत्र बताते हैं कि, बातचीत के दौरान उद्धव ठाकरे ने अमित शाह के सामने कई बातें उठाईं। उन्होंने महाराष्ट्र में बीजेपी के संगठन और फडणवीस सरकार पर भी सवाल उठाए। बीजेपी के सूत्रों ने मीटिंग को सफल बताते हुए कहा कि, दोनों दलों के बीच आगे भी कई मौकों पर मीटिंग होती रहेगी। ताकि पहले की तरह बीजेपी-शिवसेना के रिश्ते बेहतर बने रहें। शिवसेना इससे पहले अकेले चुनाव लड़ने की बात कह चुकी है। अगर शिवसेना भी टीडीपी के रास्ते पर चलती है तो एनडीए 314 से घटकर 296 पर पहुंच जाएगी। ऐसे में अगर बीजेपी एनडीए के इस रीढ़ की हड्डी को मनाने में और सहयोगियों को साधने में नाकाम रहती है, तो उसका सरकार में रहना मुश्किल हो सकता है।

दूसरे दल का कौनसा नेता निभा सकता है एनडीए के लिए अहम भूमिका?


बिहार में चुनावी साल से पहले से सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव को लेकर अपनी तैयारी शुरू कर दी है। खुद बिहार के सीएम और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने भी 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसते नजर आ रहे हैं। नितीश कुमार एनडीए के लिए और बिहार के राजनीति का विचार करें, तो बिहार के लिए भी एक अहम नेता की भूमिका निभाते है। इससे पहले 2005 से 2014 तक वो बिहार के मुख्यमंत्री रहे है और लोकतंत्र की सेवा की है।वह जदयू राजनीतिक दल के प्रमुख नेताओं में से हैं। 17 मई 2014 को हुए लोकसभा में जदयू की हार हुई, जिसके चलते उन्होंने ईस्तीफा दे दिया। हालांकि, वह 10 अप्रैल 2016 को अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए। 26 जुलाई, 2017 को फिर से वो बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए। लेकिन गठबंधन सहयोगी आरजेडी के बीच मतभेद के साथ उन्होंने फिर से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद लालू यादव के जेल जाने पर उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया। आने वाले 2019 के आम चुनाव को लेकर बिहार की राजनीति में तेजी से घटनाक्रम बदल रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घर पर हुई पार्टी मीटिंग में फैसला लिया गया कि लोकसभा चुनाव में एनडीए से बिहार के लिए चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे।

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