हिन्दू धर्म में सूर्योपासना का महापर्व ‘छठ’

हिन्दू धर्म भारत का अति प्राचीन, सबसे बड़ा और मूल धर्म है। ‘वेद’, हिन्दू धर्म के सर्वपूज्य ग्रंथ है। हिन्दू धर्म को वेदकाल से भी पूर्व का माना जाता है, वो इसलिए की वेदों की रचना किसी एक काल मे न होकर भिन्न-भिन्न कालो में हुई है। इसका मतलब ये हुआ कि वेद धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया है-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद। तत्पश्चात ऋषि‍ अथर्वा द्वारा अथर्ववेद का संकलन कि‍या गया। वेदों में ब्रह्मांड की आत्मा ‘सूर्य’ को कहा गया है।

सूर्य ही इस पृथ्वी पर जीवन का सार है, ऊर्जा और प्रकाश का स्त्रोत है और यह एक सर्वमान्य सत्य है। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक. यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के अनुसार, देवताओं में सूर्य का स्थान महत्वपूर्ण है। यजुर्वेद में कहा गया है कि “चक्षो सूर्यो जायत” अर्थात, सूर्य को भगवान का नेत्र कहा गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उत्पति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नही कि आदि काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। प्रारम्भ में सूर्योपासना मंत्रों के द्वारा होती थी। कालांतर में मूर्ति पूजा के प्रचलन के पश्चात, यत्र-तत्र सूर्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। प्राचीन काल के भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए है, उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध है। वेदों में ही नही बल्कि आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है। हिन्दू धर्म मे सूर्य की उपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। इसे महापर्व, लोक आस्था का पर्व भी कहा जाता है। मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे ‘छठ’ कहा जाता है। छठ वर्ष में दो बार होता है – पहली बार चैत्र माह और दूसरी बार कार्तिक माह में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।

मान्यता के अनुसार, यश, पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुख्यतः स्त्रियां लेकिन पुरुष भी इस पर्व को उतनी ही श्रद्धा से करते है। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व का वैज्ञानिक महत्व भी है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। छठ करने वाली स्त्रियों को ‘परवैतिन‘ भी कहा जाता है। इन चार दिनों में आस्था ओर श्रद्धा से लोग अपने आस-पास साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखते है, लोग सड़क की भी साफ-सफाई का ध्यान रखते है ताकि गुजरने वाले परवैतिन को किसी प्रकार की असुविधा न हो। यह अनुपम लोकपर्व मुख्यतः पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे नेपाल की तराई के गांवों में बहुत ही आदर के साथ मनाया जाता है। इस चारदिवसीय पर्व के दौरान व्रतियों को लगातार 36 घंटे का निर्जला व्रत रखना होता है। नहाय खाय इस चार दिवसीय महापर्व की शुरुआत पहले दिन कार्तिक-शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है।

सर्वप्रथम पूरे घर की साफ-सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके पश्चात व्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रति के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। सेंधे नमक से बने कद्दू-चना दाल और अरवा चावल प्रसाद के रूप में खाया और खिलाया जाता है। लोहंडा और खरना इस इस महापर्व के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर के उपवास बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा, सामान्य खीर और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। सामान्यतः नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से छठी मैया की विशेष कृपा होती है।

संध्या अर्घ्य महापर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और मौसमी फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ पूरा परिवार तथा आस-पड़ोस के लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रति आस-पास के तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले जैसा दृश्य बन जाता है। उषा अर्घ्य महापर्व के चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रति वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। व्रती जल में ध्यानमग्न होकर सूर्य की वंदना करते हुए सूर्य के उदय होने की प्रतीक्षा करते है और उगते हुए सूर्य को जल और दूध का अर्ध्य देते है। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध या दही का शरबत पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। यह लोकपर्व समाजिक सदभाव, समाजिक एकता का पर्व है जिसमे सम्पूर्ण समाज सारा कुछ भूलकर श्रद्धा से इस पर्व में समिल्लित होता है। छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता, और लोकपक्ष है।

भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ आदि से मिट्टी के चूल्हे पे निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। यह शानदार भारतीय परिवेश को प्रदर्शित करता है। इस महापर्व में समाज के विभिन्न वर्गों की उपयोगिता है और साथ ही उन वर्गों के धन उपार्जन के लिए अवसर उपलब्ध कराती है। शास्त्रों से भिन्न छठ आम लोगो द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर महिमामयी सूर्य, आम-जन और उनका जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पंडित या पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। आवश्यक होता है तो जन-सहयोग की जो श्रद्धा से ओत-प्रोत सहर्ष ही अपनी सेवा के लिए तैयार रहते है। यह महापर्व लोगो को संबल,सक्षम बनने का भी संदेश देती है, इस उत्सव के लिए समस्त जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है, नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों को सुगम बनाना, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए, और इन सब के लिए समाज, सरकार के सहायता की राह नहीं देखता बल्कि स्वयं ही इसे पूर्ण करता है। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है। अब तो पूरे विश्व में जहाँ कही भी बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग होते है वो वहाँ भी छठ पर्व करते हौ। इस तरह से छठ का प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में हो गया है।

तो आइए श्रद्धा से समिल्लित होते है लोकआस्था के इस महापर्व में जो कि आज ‘नहाय-खाय’ से शुरू हो रहा है। ‘आज का रिपोर्टर’ के टीम की तरफ से अपने पाठकों को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं, छठी मैया की कृपा आप सभी पे बनी रहे। (स्त्रोत – विकिपीडिया)

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