केरल में दलितों को मिल रहा है, सम्मान

सामाजिक कुरीतियाँ तोड़ता केरल कुछ लोगों के लिए अति हर्ष-उत्साह का विषय हो सकता है तो कुछ लोगों के लिए कुंठा का। लेकिन यह एक सामाजिक सरोकार का अति साहसिक कदम है।

केरल में हाल ही के दिनों में सरकार ने एक ओर कुछ तथाकथित नीच जातियों को उनके जाती या वर्ग सूचक शब्दों से पुकारने ( गवर्नमेंट रिकॉर्ड में भी)पर रोक लगा दी है साथ ही साथ दूसरी ओर वहां की मन्दिरो में पुजारी बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य नही रह गया है। अब कोई तथाकथित नीच जाती का व्यक्ति भी मंदिरों में पुजारी रह सकता है। ये दोनों फैसले इस देश के भविष्य के लिए अति निर्णायक साबित हो सकते हैं और ये फैसला इस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है जब इस देश के धर्म एवं जाती के नाम पर राजनीति तेज है। हम साथ ही साथ यह भी याद करते चले कि केरल साक्षरता के मामले में त्रिपुरा के बाद दूसरे क्रम पर आता है।

शायद इसीलिए उनके लिए ये स्वीकार करना सहज हो गया और इससे संकेत साफ हैं शिक्षित राष्ट्र, समर्थ राष्ट्र, समृद्ध राष्ट्र।

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