क्या सच में हम अच्छे और वह पागल है?

जब देश के प्रधानमंत्री स्वच्छता का संदेश देने के लिए दिल्ली में झाड़ू उठाते हैं तो उनके साथ पूरा देश खड़ा दिखाई देता है। आमजन को जागरुक करने हेतु करोड़ों के विज्ञापन दिए जाते हैं, नवरत्न बनाए जाते हैं, मंत्री से लेकर संतरी तक, अफसर से लेकर चपरासी तक, शिक्षक से लेकर विद्यार्थी तक, व्यापारी से लेकर ग्राहक तक, लेखक से लेकर पाठक तक, अमीर से लेकर गरीब तक उनको अनुसरण करते हुए झाड़ू उठा लेते हैं। उनकी आंखों में एक सपना होता है, स्वच्छ देश हो अपना।
कुछ सुखी पत्तियां बिछाकर झाड़ू लगते हुए तस्वीर खींचवाते हैं तो कोई गंदे नालों एवं तालाबों की सफाई करते हुए फोटो लेते हैं तो कुछ बिना फोटो खींचाए हीं सफाई अभियान में लगे हुए हैं, हर वर्ग अपनी स्वेच्छा से सहयोग के लिए आ रहा है। लेकिन कोई भी अभियान बिना किसी कार्ययोजना एवं दूर दृष्टि के लंबे समय तक नहीं चलता। वैसे ही कर्मचारियों, कचड़ा प्रबंधन इकाई, डस्टबीन की व्यवस्था और कचरा निस्तारण के अभाव के कारण स्वच्छता अभियान भी धीरे-धीरे मंद पड़ता प्रतीत हो रहा है। जहां विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च हुए हैं वही सफाई कर्मियों के वेतन पढ़ने की बात तो दूर समय पर मिलना भी मयस्सर नहीं हुआ। जनसंख्या विस्फोट एवं शहर में बढ़ती भीड़ के बावजूद लगातार पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं होने से गंदगी का अंबार लगा रहता है। लोग झाड़ू लगाकर कचरे को एक जगह से दूसरी जगह इकट्ठा कर देते हैं।
लेकिन उसे फेंकने का साधन ठीक से उपलब्ध नहीं है। कहीं न कहीं इन मुद्दों पर हमारे नीति-नियंताओं का ध्यान आकृष्ट नहीं होने के कारण सफाई की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। यही कारण है कि लोगों का उत्साह धीरे धीरे ठंडा पड़ रहा है। आज के समय में कोई भी जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता है, चाहे वह अपने परिवार की हो या समाज की। चाहे वह जिम्मेवारी किसी जनप्रतिनिधि की हो या लोकसेवक की। सब पूछते हैं कि इस देश ने मुझे क्या दिया ? जबकि उन्होंने इस देश क्या दिया या यह नहीं बताएँगे।हम खुद की बात करें तो हमेशा दुसरो को उपदेश देने में आगे रहते हैं लेकिन जब इसका पालन हमें खुद करना होता है तो कहीं ना कहीं जी चुराते हुए दिखाई देते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है जब मैं आई जी एम एस हॉस्पिटल पास अपने एक मित्र के इंतेज़ार में खड़ा था। तभी मैंने देखा कि एक मैंला कुचैला व्यक्ति दुकान पर आकर खाने को कुछ मांगता है, दुकानदार ने उसे प्लेट में 2 लिट्टी दे दिया। लिट्टी खाने के पश्चात उस व्यक्ति ने प्लेट को पास के कूड़े के ढेर पर डाल दिया। वही मैंने देखा कि कुछ पढ़े लिखे संभ्रांत परिवार के अच्छे लोग अपनी लिट्टी खाकर प्लेट को इधर-उधर फेंक रहे थे। मैंने देखा कि वह एक एक कर उन प्लेटों को चुनकर कचरे के ढेर पर रख देता था, फिर उस कचरे के ढेर को आग लगा दिया।
मैं इसे देखकर हतप्रभ रह गया। मैंने जिज्ञाशावश उस दुकानदार से पूछा कि यह कौन है ? उसने बताया कि यह पागल है, रोज ऐसे ही आ जाता है और मांग कर कुछ खा लेता है, बदले में सफाई करके चला जाता है। किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, किसी को कुछ नहीं कहता। फिर तुरंत मेरी नजर एक दूसरे युवक पर पड़ी जो गुटखा खाकर पुरिया वहीं नीचे फेंक रहा था। इसे देखते हीं मेरे मुंह से निकल गया क्या सच में हम अच्छे और वह पागल है ?
Connect with Us! अपनी राय कमेंट्स में दें. ताजा ख़बरों के लिए हमें फॉलो करें. अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई, तो इसे लाइक और शेयर करना न भूलें. Subscribe our Youtube Channel: AajKaReporter Follow us on: Facebook, Twitter, Instagram