बिरहा से विरह

आज जब हमारे दिमाग पर पाश्चात्य के गानों ने कब्ज़ा कर लिया है, तब दिल आज भी लोकगीत सुनने की चाहत रखता है। वही लोकगीत जो धीरे धीरे दम तोड़ती नज़र आ रही है। वही लोकगीत जो पहले गलियों में गुज़रते सुनाई दिया करती थीं, न जाने आज किस कोने में जाकर छिप गई हैं। कजरी, सोहर और बिरह को सुनने के लिए हमेशा हमारे कान तरसते रहते थे, न जाने फ़िल्मी गानों के आ जाने से वह भूख कैसे मर गई? ज़रा सोचिए वो भी क्या ज़माना था जब एक पत्नी अपनी वेदना को गीत के रूप में प्रकट करती गाती थी…..रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे। बेशक उसे साहित्यिक भाषा का ज्ञान न था मगर फिर भी वो गाने में भाव और आनंद की कमी न होने देती थी । इसी गाने की तरह और भी कई बेहतरीन लोकगीत देहात में ही जन्मे हुए हैं।

इस आधुनिकता की दौड़ में बिरहा भी पीछे रह गया और धीरे धीरे लुप्त होता जा रहा है। उन्नीसवीं सदी में जन्मे इस लोकगीत ने आज़ादी की लड़ाई में भी लोगों का उत्साह वर्धन किया। बिरहा वह लोकगीत है जिसमें किसी कहानी को गीत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और समाज को एक संदेश देने का प्रयास किया जाता है। जैसा की फ़िल्मी गानों में होता है कि कई बार वाद्य यन्त्र का उपयोग इतना अधिक हो जाता है कि इस बीच मुख्य गायक की आवाज़ दब जाती है, बिरहा में ऐसी दिक्कत कभी नहीं होती। बिरहा में वाद्य यंत्र के तौर पर केवल ढोलक, हारमोनियम और करताल का इस्तेमाल किया जाता हैबिरहा में भी और हिंदी रचनाओं की तरह रस होता है, जैसे हास्य, वीर, श्रृंगार रस आदि। गुरु बिहारी को बिरहा का जनक माना जाता है। बिरहा गायक को एक गायक के तौर पर सिद्ध होने के लिए किसी न किसी अखाड़े यानि दल की सस्यता प्राप्त करना अनिवार्य है। एक गायक को क्या गाना है यह उसका अखाड़ा तय करता है। हर बिरहा गीत का अंत ‘छाप’ से होता है जिसमें गायक गीत के संदेश और रचयिता के बारे में श्रोताओं को बताता है।

हालाँकि धीरे धीरे यह गीत विलुप्त होता जा रहा है मगर आज भी पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसके दीवानों की संख्या अच्छी खासी है। आज हमे यह समझने की आवश्यकता है समय के साथ खुद को बदलना अच्छी बात है मगर अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।

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