बिहार की शिक्षा व्यवस्था के ‘लोटा युग’ में आपका स्वागत है

बतौर शिक्षक हमें अपमानित करने के लिए सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। जैसा कि आप सभी को पता होगा पिछले चार पांच महीनों से बिहार में शिक्षकों को वेतन नहीं मिला है। ऐसे में शिक्षकों के परिवार का गुजारा कैसे हो रहा होगा, इसकी सरकार को कोई चिंता नहीं। आप सोचिए कि हम पढ़े-लिखे नौजवानों की जिंदगी कैसे कट रही होगी, परिवार कैसे चल रहा होगा। हम लोग एक मजबूरी की जिंदगी, अभाव की जिंदगी में घुट घुट कर जीने को विवश हैं। और ऐसे में एक सुबह हमारे पास फरमान आता है कि कल सुबह से सभी शिक्षक इस बात की निगरानी में लग जाइए कि आप के कितने ग्रामीण लोटा लेकर सुबह-सुबह खुले में शौच को जा रहे हैं। स्वागत है आपका बिहार में शिक्षा के लोटा युग में।

बात यहां पर खुले में शौच मुक्त बिहार बनाने की हो रही है। निसंकोच यह मुहिम बहुत ही सराहनीय है। इस मुहिम को ले कर हम सभी बिहारवासी उत्साहित हैं। हम तहे दिल से चाहते हैं कि बिहार खुले में शौच मुक्त राज्य बने। बिहार स्वच्छ बने बिहार के लोग स्वस्थ बनें। लेकिन सरकार की जो कार्य प्रणाली है वह चिंताजनक है। सरकार को क्या अधिकार है कि राष्ट्र निर्माता शिक्षकों को शौच निरीक्षक बना दिया जाए? शिक्षकों का कर्तव्य है विद्यालयों में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना न कि ग्राम विकास की योजनाओं का, बिहार सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन करना। पहले से ही शिक्षकों को विभिन्न प्रकार के गैर शैक्षणिक कार्य में लगाया जाता रहा है। कभी उन्हें बीएलओ के तौर पर वोटर सूचि का संधारण करने के लिए भेजा जाता है तो कभी उन्हें जनगणना में लगाया जाता है। हद तो पिछले दिनों तब हो गई जब छठ पूजा की घाटों निरीक्षण की ड्यूटी में लगा दिया गया। इन सारे फरमानों को शिक्षकों ने आज तक बर्दाश्त किया है। लेकिन इस बार जो बिहार सरकार की मंशा है वह बिल्कुल ही निंदनीय और अपमानजनक है। क्या शिक्षक अध्यापन कार्य छोड़ कर शौच निरीक्षक की भूमिका निभाएंगे?

सरकार एक सिरे से बिहार में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने में लगी है। सरकार चाहती ही नहीं है शिक्षक शिक्षण कार्य करें सरकार चाहती है कि शिक्षक अध्यापन कार्य छोड़कर के विभिन्न लोकलुभावन योजनाओं के क्रियान्वयन करें। सरकार को अपनी योजनाओं की सफलता की गारंटी चाहिए। सरकार जानती है कि उसके प्रशासनिक पदाधिकारी इतने निकम्मे हैं इतने नाकारा है कि उसकी योजनाओं की सफलता की गारंटी नहीं ले सकते, उसे सफल नहीं करा सकते हैं। बिहार में अगर एक मात्र कर्मठ और क्रियाशील कर्मचारी अगर कोई हैं तो वह शिक्षक हैं। लेकिन यह विचारणीय बात है कि बिहार सरकार ऐसे कर्मठ और स्फूर्त रूप से सभी योजनाओं में सक्रिय भूमिका निभाने वाले शिक्षकों को समान काम समान वेतन के मौलिक अधिकार से वंचित करती है। उन्हें अपमानजनक कार्यों में लगाती बिहार सरकार की जनता को सोचना चाहिए कि क्या शिक्षकों को अध्यापन कार्य छोड़कर के शौच मुक्त बिहार बनाने में सुबह और शाम लोटा निरीक्षण का जो काम कराया जा रहा है क्या इससे उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा अंधकारमय होगा। शिक्षकों की गरिमा पर लोगों का विश्वास और बढ़ेगा या शिक्षकों की गरिमा दिन-प्रतिदिन गिरती जाएगी। जब किसी राज्य में किसी देश में शिक्षकों की गरिमा नहीं रहती है, शिक्षकों का सम्मान नहीं रहता है तो वह राज्य अधोगति को प्राप्त करता है। बिहार को अगर प्रगतिशील बनना है, पूरे प्रदेश में विकास की बयार बहनी है तो शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए।

खुले में शौच मुक्त योजना बिहार सरकार पंचायती राज व्यवस्था के मुखिया, पंचायत समिति, वार्ड सदस्य, पंच, टोला सेवक व विकास मित्र की जवाबदेही होनी चाहिए ना कि राष्ट्र निर्माता शिक्षकों को इस कार्य में लगाना चाहिए। अगर कोई शिक्षक सुबह 6 बजे से 7 बजे और शाम में 5 से 6 शौच निरीक्षक का कार्य करेंगे तो फिर वह विद्यालय समय से जा पाएंगे? अधिकांश शिक्षक ऐसे हैं शिक्षक हैं जो अपने विद्यालय से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। क्या यह संभव है कि वह सुबह सुबह उठकर अपने विद्यालय के पोषक क्षेत्र में जाकर के निरीक्षण करें? क्या यह संभव है कि जो शिक्षक अपने विद्यालय से 50 किलोमीटर दूरी पर रहते हैं वह टॉर्च और मोबाइल लेकर कौन खुले में शौच जा रहे हैं इसका निरीक्षण करें? यह बिल्कुल ही गैर जिम्मेदाराना आदेश है। सरकार के इस तरह के आदेश की कोई जरुरत नहीं थी। सरकार को अगर खुले में शौच मुक्त बिहार बनाना है तो सबसे पहले सरकार सुनिश्चित करें कि हर एक परिवार के पास शौचालय हो। सरकार पहले शौचालय शौचालय बनवाए। मैं पूछना चाहूंगा क्या सरकार ने शत प्रतिशत परिवारों को शौचालय के लिए सहायता राशि दिया है? क्या उनके जमीनी स्तर पर वार्ड मुखिया पंचायत समिति और जो भी पदाधिकारी हैं क्या वह बिना हजार दो हज़ार घूस लिए वह शौचालय की राशि मुक्त कर रहे हैं? आपको जानकर आश्चर्य होगा शौचालय बनाने के लिए वार्ड सदस्य, मुखिया या पंचायत समिति रुपये 1000 कमीशन लेते हैं उसके बाद गरीब परिवारों को सहायता राशि मिलती है।

ऐसी परिस्थिति में खुले में शौच मुक्त बन पाना असंभव है। सरकार सच में चाहती है कि बिहार खुले में शौच मुक्त बने तो उसके लिए सरकार को अपना तंत्र ठीक करना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शत प्रतिशत परिवारों को शौचालय बनाने के लिए बिना किसी घूस या कमीशन के सहायता राशि मिले। शत प्रतिशत परिवारों का शौचालय बने इसके लिए वार्ड पंचायत मुखिया और अपने पदाधिकारियों के जरिए इस बात को सुनिश्चित करें। सबसे पहले सभी घरों में शौचालय बन जाए उसके बाद पंचायती राज व्यवस्था के कर्मचारियों से एवं अपने पदाधिकारियों से इस बात का निरीक्षण कराएँ कि कोई खुले में शौच तो नहीं जाते। उन्हें प्रेरित करें न कि प्रताड़ित करें।

खुले में शौच मुक्त बिहार की जो सबसे बड़ी समस्या है वह है शौचालयों की कमी। बिहार में अधिकांश लोग गरीब हैं। गरीब परिवारों के पास इतना धन नहीं है कि वह शौचालय बना सके। कई गरीब दलित परिवारों के पास कितनी जमीन भी नहीं है कि वह अपना एक कमरे का मकान बना सकें। तो शौचालय बनाने के लिए अलग जमीन कहां से लाएं? ऐसी परिस्थिति में सामूहिक शौचालय बनवाने चाहिए। सामूहिक शौचालय बनवाने से जिन परिवारों के पास जमीन नहीं है वह भी शौचालय का उपयोग कर सकते हैं। हर जगह चौराहों पर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय की व्यवस्था हो।

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शिक्षकों को इस कार्य में लगा करके उनका अपमान करने के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा। आप सोचिए क्या होगा अगर किसी गरीब महिला की शौच करते वक़्त उसकी तस्वीर खींचें? ऐसी परिस्थिति में शिक्षकों की पिटाई होगी या नहीं होगी? सरकार चाहती है शिक्षक और ग्रामीण आपस में भिड़ जाएं और शिक्षा के ऊपर से ध्यान हट करके सारा ध्यान आपसी वैमनस्यता में चला जाए। जो सम्मान शिक्षकों का समाज में है सरकार उस सम्मान को धूमिल करना चाहती है। सरकार चाहती है कि सरकारी शिक्षण व्यवस्था ध्वस्त हो जाए ताकि निजी शिक्षण व्यवस्था ज्यादा ज्यादा बढ़ सके और जो प्राइवेट स्कूलों का रोजगार है जो धंधा है वह फल फूल सके। सरकार समान शिक्षा प्रणाली लागू करने के बजाए सरकार सरकारी स्कूलों को ध्वस्त करने में लगी हुई है। इस का एकमात्र कारण यह है सरकार चाहती है कि निजी शिक्षण व्यवस्था ज्यादा से ज्यादा फले फूले। जो कॉरपोरेटर शिक्षण व्यवस्था में आ गए हैं उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले। और सरकारी विद्यालयों में जो गरीब बच्चे पढ़ते हैं उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिल सके। सरकार चाहती है गरीब बच्चे और गरीब ही बने रहें गरीब कभी अमीर नहीं बने ग़रीब कम शिक्षित नहीं बने ताकि वह कल खड़े होकर के सरकार खिलाफ सवाल नहीं उठाएं।

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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार आज वर्तमान समय में केवल लोगों को प्राप्त है इनके पास धन है वह अच्छी शिक्षा ले रहे हैं। जिनके पास धन नहीं है वह गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। सरकार किया मंशा स्पष्ट है कि वह शिक्षकों को विद्यालय में पढ़ाने नहीं देना चाहती है। वह सरकारी शिक्षकों को विभिन्न गैर शैक्षिक कार्य करना चाहती है ताकि सरकारी विद्यालयों में पठन-पाठन ध्वस्त हो जाए। सरकार गरीब और अमीर की खाई को और बढ़ाना चाहती है। अगर इस गरीब बिहार की गरीबी को मिटाना है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एकमात्र उपाय है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तभी आएगी जब शिक्षकों को उचित सम्मान मिलेगा और उन्हें इस तरह के अपमानजनक कार्यों से दूर रखा जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है सरकार शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से दूर रखे। लेकिन सरकार हाई कोर्ट के आदेश के मांग को मानने की बजाय सरकार शिक्षकों को नित नए विभिन्न विभिन्न गैर शैक्षणिक कार्य लगाती रहती है। और इस बार जो सरकार ने फरमान जारी किया है वह घर अपमानजनक है। इस फरमान से शिक्षकों के मान-सम्मान की अपूर्णीय क्षति हुई है। अगर शिक्षक इस कार्य में लगते हैं तो शिक्षकों की गरिमा धूमिल होगी। शिक्षकों का महत्व समाप्त हो जाएगा और आम लोगों की नजर में शिक्षक गरिमाहीन बन कर रह जाएंगे। कोई विद्यालयों में हास्य के पात्र बन जाएँगे शिक्षक।

ये लेखक के निजी विचार हैं

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