भोजपुरी में अश्लीलता- कौन जिम्मेदार?

आज कल भोजपुरी लोकगीतों में अश्लीलता को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। मशहूर गायिका कल्पना पटोवरी को निशाना साध कर लोग अपनी कुंठा का भौंडा प्रदर्शन कर रहे हैं। तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग उनके बहाने भोजपुरी को लोकभाषा से कुलीन भाषा मे तब्दील करने की जंग छेड़ चुके हैं। इस विदेशों में बैठे इन महानुभावों को कुछ ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी नहीं जिनसे मैं उन्हें रूबरू करवाना चाहता हूँ।

पहली बात, भोजपुरी को ज़िंदा उन्हीं लोगों ने रखा जिन्हें आज आप अश्लील कह रहे हैं। आपलोगों ने तो कब का भोजपुरी बोलना छोड़ दिया था। आपके पुरखे तक अँग्रेज़ी माध्यम से पढ़ कर बड़े-शहरों और विदेशों की ओर भाग रहे थे उस वक़्त ये रिक्शे वाले, ठेले वाले, बस और ऑटो वाले ही भोजपुरी शान से बोल रहे थे और ज़िंदा रखे हुए थे। आपको तो अपने बच्चों से अँग्रेज़ी में टॉक करने का चस्का लगा हुआ था, आप भला अपने बच्चों को भोजपुरी क्यों बोलना सिखाते? उस वक़्त भी इन्हीं गरीब मज़दूरों के बच्चे अपनी मातृभाषा भोजपुरी में ही बतियाया करते थे। आप लाख भोजपुरी सम्मान समारोह कर लें लेकिन कटु सत्य यह है कि आप लोगों ने ही भोजपुरी से मुँह मोड़ लिया था।

भोजपुरी स्वाभिमान समारोह में लंबे चौड़े भाषण देने वाले कितने महानुभावों के बच्चे आज भोजपुरी में बातचीत करने में सक्षम हैं। बच्चों की बात तो छोड़िए केवल ये बताइये कि ये सारे महानुभाव ही क्या स्वयं अपने घर में या अपने मित्रों से भोजपुरी में बात करते हैं? नहीं करते हैं।बुद्धिजीवियों को तो चस्का लगा है अँग्रेज़ी में कन्वर्सेशन करने का। भोजपुरी मिट्टी से जो लोग निकले वो भोजपुरी को भूल गए। ये बात सिर्फ भोजपुरी के लिए नहीं हैं बल्कि सभी लोकभाषाओं के लिए है फिर चाहे वो भोजपुरी हो, मैथिली हो, मगही हो या अंगिका हो। जो भी स्व-घोषित बुद्धिजीवी लोग पढ़-लिख कर अपनी मिट्टी से दूर गए उन्होंने अपनी बोली से नाता ही तोड़ लिया। अपनी ही बोली को हीन-भावना से देखने लगे। अपने घर के बच्चों को अँग्रेज़ी में बात करने के लिए प्रेरित करने लगे। इन सारी विषम परिस्थितियों के बावजूद आज भोजपुरी अगर बोली जा रही है, गाई जा रही है, सुनी जा रही है और भोजपुरी में फिल्में बन रही हैं तो सिर्फ उनके वजह से जिन्हें आप अश्लील ठहरा रहे हैं।

दूसरी बात, भोजपुरी एक लोकभाषा है। इसे आपका बुद्धिजीवी वर्ग भूल जाता है। भोजपुरी में नितिन चंद्रा जैसे फिल्मकारों ने प्रयास किया है फ़िल्म बनाने का लेकिन उनके फ़िल्म का विषय कुलीन है जबकि भोजपुरी के दर्शक ठेठ देहाती अंदाज़ वाले। ऐसी कुलीन फिल्में बना कर फ्लॉप होने के बाद फिल्मकार दर्शकों पर ही ठीकरा फोड़ देते हैं कि भोजपुरी में अच्छी फिल्म कोई देखना ही नहीं चाहता। क्यों देखे कोई आपकी उबाऊ फ़िल्म? सिर्फ इसलिए कि आपने भोजपुरी में बनाई है। वाह, ये भी कोई बात हुई! आप कोई भी उबाऊ-पकाऊ फ़िल्म बनाएँ और उसके सारे भोजपुरी भाषी देखने जाएँ वो भी केवल इसलिए कि आप जैसे स्वघोषित महान फिल्मकार ने भोजपुरी में फ़िल्म बनाई। महाशय, लोगों की पसंद को समझिए। भोजपुरी एक लोकभाषा है। यहाँ हिट होने के लिए स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करने वाली सिनेमा बनाइये जिसे रिक्शे ठेले वाला 30-40 रुपए में टिकट खरीद कर किसी छोटे से शहर के सिनेमा हॉल में देख सके न कि मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ध्यान में रख कर सिनेमा बनाइये।

आख़िरी बात, ये अश्लीलता का ढिंढोरा मत पीटिये। जिस अँग्रेज़ी को आप सबसे कुलीन और इज्ज़तदार भाषा मान कर अपने बच्चों को अँग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा दिलवा रहे हैं न उसी भाषा के सुप्रसिद्ध रैपर एकॉन गाते हैं I wanna f**k you और एनरिक तो एक कदम आगे बढ़कर उद्घोषणा करते हैं I m f**king you tonight. लेकिन अँग्रेज़ी को तो कोई अश्लील भाषा नही कह रहा। अँग्रेज़ी में जितना अश्लील साहित्य उपलब्ध है शायद ही दुनिया के किसी भाषा में उपलब्ध हो लेकिन फिर भी शायद ही कोई अँग्रेज़ी को हीन भावना से देखता हो। फिर भोजपुरी के साथ ये अश्लीलता का तमगा क्यों?

और हाँ, अगर स्वघोषित बुद्धिजीवियों का भोजपुरी प्रेम जाएगा ही गया है तो वो इस भाषा के लिए कुछ करें। अपने घर में, अपने बच्चों के साथ भोजपुरी में बात करना शुरू करें। अपनी आगे आने वाली वाली पीढ़ियों में भोजपुरी के प्रति प्रेम-लगाव उत्पन्न करें। भोजपुरी भाषा में अच्छा साहित्य, स्वस्थ मनोरंजन व बेहतर गीत-संगीत प्रदान करें। केवल भोजपुरी कलाकारों को अश्लील घोषित करने से काम नहीं चलेगा। लोकभाषा को ज़िंदा रखने के लिए इसे बोलने, सुनने, देखने व गाने-गुणनाने वालों के लिए कुछ बेहतर दें। ये जरूर याद रखें कि एक पीढ़ी लगेगी बदलाव आने में। एक दो दिनों में कुछ नहीं होने वाला।

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