‘माँ’ भाव एक, शब्द बहुतेरे

‘मातृ दिवस की मंगलकामनाएं’

पहला ठौर और पहला कौर भी। मेरे अमावस का चाँद भी और संताप सी दोपहरी का चन्दन भी। तुझसे हो कर आये, ये मेरा स्वर है। तेरे हो कर रहें, ये मेरा शऊर

कितनी मूरतों में गढ़ी गई माँ तुम और कितनों के कूची कलम पर क़सीदे बन कढ़ी गई माँ तुम। बड़े जुगत जतन से जब जब भी स्याही और रंग जुटता है, तुम्हेँ पढ़ने, लिखने या उकेरने को पहला आख़र ही नहीं मिल पाता और न मिल पाता हैं वो रंग जिसमें तुझे रंगू और न ही वो मिट्टी जिससे तुझे गढूं। ये सब तो तेरी थाती है माँ, कि मेरी इकाई भी तुमसे, दमक भी तेरा और दस मास की माटी भी तेरी।

ऋणी हो कर शेष हैं और अशेष जो हुए माँ तो फिर फिर तेरे होकर आने को कामना रत भी।

माँ को समर्पित चंद पंक्तियां:-

‘तू कितनी अच्छी है…’ – By Saurabh

‘मेरी मां…’ – By Vinay

‘मैं कभी बतलाता नहीं…’ – By Nihal

 

 

 

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