मुझ पर थोड़ा सा रहम खाओ……

बीते कुछ वर्षों में जिस तरीक़े से बलात्कार के प्रकरणों में दिन ब दिन बढ़ोत्तरी हुई है उससे आने वाले वक्त का अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाएं कितनी महफूज़ रहेंगी। कानून और न्याय का मत ख्याल करिएगा कि वो आपकी इज्ज़त आपको वापस दिलवा देगी । क्योंकि लालफीताशाही से तो न्याय मिलने में बहुत समय लग जाएगा और कानून की चौकीदारी आप जैसों के लिए नहीं क्योंकि उनकी चौकीदारी यहीं पर दिख जाती है जब उनका प्राथमिकी दर्ज़ करते हुए सवाल आता है कि “रेप कैसे हुआ”?
जरूरत है कि खुद से आत्मरक्षा हेतु तत्पर हो जाएं क्योंकि सडक़ों पर घूम रहे ये वहशी दरिंदे कब आप पर टूट पड़े कोई ठीक नहीं

बलात्कार, रेप , आबरु का लुटना, अंग वस्त्रों का चीर फाड़ होना और जबरन “उसके साथ” हवस की भूख मिटाना
आज के समय में भारत में एक ऐसी आम बात होती जा रही है जिस पर लोगों की भावनाएँ एवं भावुकताएं मरणासन्न होती जा रही हैं। सब सहानुभूति के लिए साथ खडे़ तो हैं पर उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो इस बात पर भी हमेशा की तरह एक ही तकिया कलाम लगाए बैठे हुए हैं जिनका मानना है, समुदाय विशेष के होने के वजह से ही ऐसा हुआ है।
धिक्कार है ऐ निक्रिष्ट बुद्धि के मनुष्य जो तुमको ऐसा लग रहा है, कुछ तो शर्म की होती ये बोलने से पहले …
ज्यादा कुछ नहीं बस कुछ मिनट के लिए सबकुछ भूलकर ये सोचकर देखो कि वो तुम्हारे ही आंगन की कोई हंसती हुई आवाज़ में से एक थी………….जो रोज़ शाम आपको खींचकर पूछती थी …आपने मुझे खिलाने के लिए क्या लाया….
क्या कुछ समझ आया……।

ये वे संवेदनाएं जो आज ऐसी निर्मम क्रृत्यों से दिन प्रतिदिन शून्य होती जा रही हैं।
न्याय दिलाने की बात कौन कहे न्यायालय की चौखट तक पहुंचाने वाले खुद ही अस्मिता भक्षक बने जा रहे हैं
कोई सिसकती आवाज़ अगर खाकी रंग के पास जाए भी तो उसे ये डर सताता है कि न.जाने कब इसका हाथ मेरे आंसू पोछते हुए गर्दन से नीचे उतरकर नीचताई न दिखा दे।
हां कुछ तो इसी डर की वजह से सांस नहीं लेती होंगी, निः सन्देह ये होता होगा
क्यों नहीं हो सकता
जब सफेदी से सराबोर कपड़े पहनकर कोई भाषण देते हुए
भाईयों, बहनों, मित्रों, बेटों-बेटियों का रिश्ता जोड़ सकता है तो क्या वो अपनी गंदगी नहीं दिखाएगा
अरे आपने ही तो उसे मसीहा बनाया है अब वो नंगा नाच भी करे तो आप उसकी नग्नता ढक भी नहीं सकते हैं
क्यों ?
अरे! क्योंकि कानून उसकी चौकीदारी जो कर रहा है ।
रोष, आक्रोश, घृणा सब जायज़ है लेकिन ये भारत देश में ऐसी विपदा आन पड़ी है जहां आज ये मुद्दे राजनीतिक, संप्रदायवाद, धर्म आदि से जोड़कर दिखाए जाते हैं और दुःख इस बात का है कि बहुत बडा़ तबका जिसे ये समझने की जरूरत है कि सभी अपने है वो भी आंखों में काली पट्टी बांधकर केवल भेड़ो की झुंड में शामिल हो गया है।

न मंदिर बची है, न मस्जिद बची है न ही बचा गिरिजाघर
ये जिस्म के भूखे फाड़ रहे हैं, कपड़ों के टुकड़े खुद के घर

न बाप का रिश्ता साफ बचा है न भाई का न मामा का न चाचा का न ताऊ का ऐसा कोई रिश्ता नहीं है जिस पर बलात्कार जैसे गंदे कृत्य के धब्बे न लगे हों
न दादी बची न मां और न ही बहन जिसपर मानवरूपी दानव ने अपने नाखून न चुभोए हों।

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क्यों ये मानवीय संवेदनाएं शून्य हो गई हैं क्यों “वो” केवल जिस्मानी दिखती हैं।
थोड़ा सा रहम खाओ और सोचो कि वो खिलखिलाती हुई कलियां हैं जो तुम बलात्कारियों को पैदा करती हैं सोचो कि तुम्हें तो घला घोटकर ही वो मां मार देती गर जिसे अंदेशा होता कि तू कल किसी मां के पल्लू को फाड़ेगा ।
वक्त है कि समाज जातिवाद धर्मवाद से बचकर अपने देश की मां – बेटियों और बहनों की सुरक्षा के बारे में विचार करें।

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