रोजा तोड़ कर बचाई हिंदू युवक की जान – ‘हिंदू-मुस्लिम’ भाई-भाई की कहावत हुई चरितार्थ

कहते हैं दुनिया में इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता और धर्म को निभाने के लिए इंसानियत को नहीं भूला जा सकता।

इसी कारण समय दर समय कभी-कभी कुछ ऐसे वाक्ये समाज के सामने उभर कर आते हैं, जिसे देखकर यकीन कर पाना थोड़ा मुश्किल जरूर होता है, लेकिन वही इंसानियत की मिसाल होती है। हम बात कर रहे हैं एक मुस्लिम युवक द्वारा अपने रोजे को कुर्बान करते हुए एक हिंदू युवक की जान बचाने के बारे में। आइए जानते हैं इस पूरी खबर को

क्या है पूरा मामला

देहरादून के एक निजी अस्पताल में अजय बिजल्वाण नाम का एक शख्स भर्ती है, जिसकी हालत बहुत गंभीर बताई जा रही थी। और वह कुछ दिनों से आईसीयू में भर्ती था। लीवर में संक्रमण की वजह से अजय की प्लेटलेट्स बहुत तेजी से गिर रही थी और उससे “ए पॉजिटिव” खून की आवश्यकता थी जो नहीं मिल पा रहा था। उसी दौरान WhatsApp के एक ग्रुप पर मदद से संबंधित एक मैसेज आरिफ खान नाम के इस शख्स को मिला जिसको देखने के तुरंत बाद आरिफ अस्पताल की तरफ रवाना हो गया और वहां पहुंचकर उसने खून देने की बात कही। तब डॉक्टरों ने कहा कि खून देने से पहले आपको कुछ खाना पड़ेगा और आरिफ ने बिना देर किए हुए खाने के लिए हां कर दी । और उन्होंने अपने रोजे को यहां पर तोड़ दिया। और उन्होंने खून देकर के अजय की जान तो बचाई ही बचाई साथ ही साथ इंसानियत की एक जीती जागती मिसाल भी कायम कर गए।

क्या है आरिफ की सोच-

आरिफ का कहना है कि रमजान के इस्पात महीने में जरूरतमंदों की मदद करने का ही बड़ा महत्व है। वहीं इस बाबत आरिफ ने कहा कि मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मैं किसी के काम आ सका ।

आरिफ के इस कदम से खुश है उनका परिवार-

आरिफ के द्वारा उठाया गया यह कदम पहले तो किसी को नहीं मालूम था लेकिन जब वह अस्पताल से घर लौट कर आए और उनके घर वालों को यह बात पता चली तब से उनके घर वालों को भी आरिफ के ऊपर गर्व महसूस हो रहा है उनका मानना है कि रोजा टूट गया तो कोई बात नहीं लेकिन किसी की जान बच गई इससे बढ़कर और क्या हो सकता है। हमें अपने बच्चे पर गर्व है ।

समाज में आए दिन ऐसे अनेक घटनाएं होती रहती हैं जिसके माध्यम से देश में रह रहे संप्रदायों के बीच मतभेद उत्पन्न करने की कोशिश की जाती है और इसका खामियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है। वैसे आज पूरे देश में आरिफ के कारण ही सही, इंसानियत की चर्चा तो हो रही है, उनकी मिसालें दी जा रही है, इन चर्चाओं में सहसा कवि इकबाल की मशहूर कविता की कुछ पंक्तिया स्मरण हो आयीं :

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा ।।”

आज के सन्दर्भ में कवि इकबाल की उक्त पंक्ति अति प्रासांगिक हो जाती है, हमे भी आरिफ की तरह ही मजहब से इतर मानव सेवा के भाव से सदैव तत्पर रहना चाहिए। आज समाज में आरिफ जैसे और भी नौजवानों की जरूरत है जिससे वह देश के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनें।

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