वृंदावन जो प्रेम की नगरी है, और यहाँ महिलाएं बिना प्रेम के रहने को मजबूर हैं।

वृंदावन,मथुरा क्षेत्र में आने वाला एक धार्मिक स्थल जिसे कृष्ण की लीलाओं के स्थान के रूप में जानते हैं। एक ऐसी नगरी प्रेम, उल्लास, खुशी, कृष्ण भक्ति से सरोबार, हमेशा जैसे कोई त्यौहार।

अकेले वृंदावन में ही 5000 से ज्यादा मंदिर है जहां रोज़ हज़ारों श्रद्धालु देश और विदेश से आते हैं। लेकिन इन मंदिरों के बाहर, हर गली बाज़ार या कोई भी पब्लिक प्लेस में इन भक्तों के साथ साथ कुछ विधवाएं भी मिलेंगी, जो भक्त तो है लेकिन बाकियों की तरह खुश नही।वो आयी तो बाहर से हैं पर उनका यहाँ रहना सिर्फ मजबूरी है। इनमें भक्ति तो हैं पर उल्लास नहीं, याद करती हैं भगवान को पर दुख में । उनके रोने और भजन गाने में कोई अंतर नहीं। ये यहाँ भगवान की शरण मे है क्योंकि इनके लिए और कहीं कोई जगह नही ,न ही कोई सहारा। ये विधवाएं वृंदावन जैसी जगह जो प्रेम की नगरी है , में बिना प्रेम के रहने को मजबूर हैं। और इसका मुख्य कारण है हमारे देश मे विधवाओं के साथ होने वाला व्यवहार। सती प्रथा तो कब की खत्म हो चुकी पर आज भी कुछ जगह ऐसी है जहां उनकी हालत अब भी बदतर है। उनको आज भी अपने पति की मौत का दोषी मानते है,उसके भाग्य का दोष। और फिर उनको ऐसी जगहों पर छोड़ के चले जाते हैं जिससे उनको कोई जिम्मेदारी न उठानी पड़े। उनके घर वाले उनके भरण पोषण से बचने के लिए उन्हें इन आश्रम में छोड़ जाते हैं, “भगवान के भरोसे” जबकि घरवाले अच्छे से जानते हैं कि उन विधवाओं को भगवान से ज्यादा उनकी जरूरत है। कुछ विधवाओं को उनके घरवाले जबरदस्ती छोड़ जाते हैं और कुछ अपने घरवालों से परेशान हो कर खुद ही आ जाती हैं। लेकिन इनके यहां वृंदावन में आकर भी इनकी स्थिति में कुछ सुधार नही होता ,वो और बेकार ही होती है। कुछ बदलता नही हैं पहले शोषण करने वाला घर का कोई होता था फिर यहां आकर आश्रम या मन्दिर का कोई सदस्य। इन विधवाओं से पूरे दिन भजन के बाद चंद रुपये और थोड़ा सा खाना मिलता है जो इनके लिए बिल्कुल पर्याप्त नही होता । इन विधवाओं के अनपढ़ और आत्मनिर्भर ना होने का फायदा ये आश्रम वाले उठाते हैं क्योंकि वे अच्छे से जानते हैं कि इनका अब कोई ठिकाना नहीं,ना ही तो उनके घरवाले कुछ साथ देंगे क्योंकि वो तो पहले ही छोड़ चुके हैं और ना ही तो वो विधवाएं खुद में इतनी समर्थ।

हम सब एक ऐसे समाज मे रहते हैं जहां शोषित की सहायता के नाम पर। उसका और शोषण किया जाता है, चाहे वो सरकारी संस्थाएं हो या समाज सेवा के नाम पर आई गैर सरकारी संस्थाएं। और हम भारतीय कौन से मानवीय मूल्यों की बात करते है जहाँ इंसानों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार होता है। भगवान के ही घर में इतने बुरे बुरे काम कर देते है ये तथाकथित भक्त या इन आश्रम में भक्ति भाव से आये लोग। ये कौन सा तरीका है विधवाओं की सेवा करने का ? इनके रहने के लिए सरकारी और गैर सरकारी दोनो ही तरह के आश्रम हैं जहाँ सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। ना ही तो इनके रहने के लिए पर्याप्त स्थान, न सफाई की कोई व्यवस्था, बीमार होने पर इलाज़ की उचित व्यवस्था नहीं। और तो और उनके मरने के बाद उनका ढंग से क्रियाकर्म भी नही किया जाता ,कुछ को तो मरने के बाद काट कर ऐसे ही बैग में भर के फेंक दिया जाता है।

कैसे उनके साथ इतना अमानवीय व्यवहार होता है और कहाँ चले जाते हैं भारतीय संस्कृति की बात करने वाले? ये तो हमारी संस्कृति नही। और सबसे बड़ी बात ये सब होता है इन लाचार औरतों के साथ जो भगवान की शरण मे आयी हैं। ये विधवाएँ बोझ नहीं और ना ही हमारे समाज से अलग, ये हमारे समाज का ही हिस्सा हैं। और इनके इस स्थिति का जिम्मेदार भी हमारा समाज ही है क्योंकि अब भी विधवाओं के साथ पहले जैसे ही उपेक्षित व्यवहार होता है।लेकिन सरकार द्वारा उनको उपेक्षित कर के या उन्हें किसी बाहरी राज्य का बता कर अपनी जिम्मेदारी से बचा नही जा सकता है। तो क्या हुआ अगर वो बंगाल से या कहीं और से आई हैं , जैसे दूसरे प्रदेश से आकर सांसद बना जा सकता है वैसे ही वो कहीं से भी आकर वृंदावन में रह सकती हैं। कुछ गैर सरकारी संस्थाएं है जो इनके लिए आगे आयी है, जिन्होंने इन्हें सुविधाएं देने के साथ साथ इनको रोजगार से भी जोड़ा है । लेकिन इनका प्रतिशत बहुत ही कम है। इन विधवाओं की संख्या बहुत ही ज्यादा है जिनके मुकाबले ये सब संस्थाएं बहुत कम है और जो सरकारी आश्रम है उनमें ना ही तो ऐसा कोई कार्यक्रम चलाया जाता है और जो काम होते भी है वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर सिर्फ नाम के लिए रह जाते हैं।

वैसे तो इन आश्रमों से जुड़े लोगों को खुद ही सेवाभाव से, निःस्वार्थ भाव से ये काम करना चाहिए साथ ही साथ सरकार को भी इनका बार बार औचक निरीक्षण करने की जरूरत है।अगर इन आश्रमो से जुड़े लोगो को प्रॉफिट ही चाहिए तो कोई और व्यवसाय करें, यूँ किसी मजबूर से तो लाभ ना कमाए। हमारे शासन/ प्रशासन दोनो को चाहिए कि उनके हित मे और ज्यादा काम करें और भावनात्मक रूप से जुड़ कर,तभी सुधार सम्भव है। उनको भी बराबर हक़ होना चाहिए अपने जीवन को पूरे सम्मान के साथ जीने का, जिससे वो अभी पूरी तरह से वंचित हैं।

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