सोशल मीडिया पे ट्रोल होने पर, फोर्टिस का होश उड़ा देने वाला जवाब

7 वर्षीय डेंगू पीड़िता की मौत के बाद पीड़िता के माता-पिता ने फोर्टिस हॉस्पिटल पर आरोप लगाया कि फोर्टिस हॉस्पिटल ने पीड़िता के इलाज में 15 दिनों के दौरान 18 लाख रुपये का बिल दिया। जल्द ही यह मामला तूल पकड़ने लगा, लोगो ने सोशल मीडिया पर हॉस्पिटल और हॉस्पिटल प्रबंधन को ट्रोल करना शुरू किया एवं मीडिया ने भी गंभीरता से इस बात को उठाया। सभी प्रमुख न्यूज़ चैनलो पर इस घटना को दिखाया गया। इससे हॉस्पिटल प्रबंधन पर दबाब पड़ा और बाध्य होकर उन्हें सफाई देनी ही पड़ी।

फोर्टिस हॉस्पिटल प्रबंधन ने इस आरोप के जवाब में, यह दावा किया है कि वे मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन करते हैं। अस्पताल ने यह भी कहा कि मरीज के परिवार को उसकी गंभीर स्थिति के बारे में सूचित किया गया था। प्रबंधन ने आगे कहा कि पीड़िता के परिवार ने मेडिकल सलाह के विरुद्ध बच्ची को ले गए और उस दिन उसकी मृत्यु हो गयी।
ज्ञात हो कि, पीड़िता की मृत्यु के बाद उसके माता-पिता को डेड बॉडी बिल के भुगतान के बाद ही दी गयी। 15 दिनों की चिकित्सा का बिल 18 लाख रुपये का विवरण कुछ इस प्रकार है:-

यह समझ से परे है कि चिकित्सा के दौरान 2700 ग्लोव्स एवं 660 सिरिंज की क्या जरूरत आ पड़ी थी, और इतनी ही उम्दा चिकित्सा उपलब्ध करवायी गयी थी बच्ची को तो इसके पश्चात भी उसकी मौत??? अगर बच्ची की स्थिति इतनी ही नाजुक थी तो 15 दिनों में कुछ सुधार क्यो नही हुआ???

यह एकलौता ऐसा वाकया नही है, ऐसी कितनी घटनाएं दब जाती है, दबा दी जाती है। ऐसे वाकये तभी नजर में आते है जब कोई विवाद जुड़ता है या मीडिया उसे हाईलाइट करती है। इस से एक बात तो तय है कि मीडिया और सोशल मीडिया कितना प्रभावशाली मंच है की इस घटना को पूरे देश के सामने ला दिया। एक अन्य प्रमुख बात यह है कि हॉस्पिटल में बिल कैसे तैयार किये जाते है, उनकी विश्वसनीयता क्या है? क्या ऐसे गमगीन स्थिति में मृतक के परीजन उस बिल के विवरण को देखते होंगे और यदि देखते भी होंगे तो कितना समझते होंगे? आप सोचे कि बिल तैयार कैसे किया जाता होगा, 2700 ग्लोव्स 15 दिनों में, 180 ग्लोव्स प्रतिदिन, यह आंकड़ा कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि डिस्पोजल ग्लोव्स की दुकान का आंकड़ा है।

खैर जिस देश मे सरकार जनता से उनके वाहनों का बीमा नही होने या लैप्स हो जाने पर जुर्माना वसूलती है, जबकि जनता के स्वास्थ्य के लिए ऐसा कोई प्रावधान नही है। इसका मतलब सरकार की नजर में वाहन ज्यादा महत्वपूर्ण है। उस देश में इस प्रकार की घटना की ही उम्मीद की जा सकती है। सरकार की ढुल-मूल नीति के कारण ही सरकारी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति बदहाल है और इसका सीधा फायदा निजी हॉस्पिटल्स को होता है, बेचारे मरीज जाए तो कहा जाए? आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति होती है उनके साथ। दुख टैब ज्यादा होता है जब पैसे भी खर्च हो जाते है और मरीज की जान भी चली जाती है।

(यह लेखक के अपने विचार है, चित्रों को ट्विटर से लिया गया है।)

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