बिहार का नियोजित शिक्षको का मामला : सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा- योग्यता समान है तो वेतन एक सा क्यों नहीं ?

बिहार में 3.7 लाख नियोजित शिक्षकों के बराबर वेतन के भुगतान के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई जारी रहेगी। राज्य में 52 हजार शिक्षक हैं जबकि पंचायतों के माध्यम से भर्ती शिक्षकों की संख्या 3.7 लाख है।

मंगलवार को, न्यायमूर्ति एएम सप्रे और यूयू ललित की पीठ से पहले राज्य सरकार ने कहा कि शिक्षकों को समान वेतन के भुगतान के कारण, राज्य की वित्तीय स्थिति खराब हो जाएगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम की जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए सरकार ने इन शिक्षकों को 2006 में पारिश्रमिक पर रखा था।

अब उन्हें भर्ती नहीं किया जा रहा है  इस कैडर को चरणबद्ध तरीके से ख़तम किया जा रहा है। इस पर खंडपीठ ने सरकार से पूछा कि जब नियोजित शिक्षकों की योग्यता और अन्य स्थितियां नियमित शिक्षकों की तरह होंगी, तो उन्हें समान वेतन देने में क्या समस्या है? इस मामले पर उनकी भर्ती का केवल स्रोत अलग है कि क्या सरकार उनके साथ भेदभाव कर सकती है?

खंडपीठ के ही एक न्यायमूर्ति यूयू ललित की ने कहा कि यदि नियम इस भेदभाव को वेतन में उचित ठहराते हैं, तो इन नियमों में एक समस्या है। बिहार सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी, गोपाल सिंह और मनीष कुमार उपस्थित थे।

उन्होंने कहा कि यदि नियोजित शिक्षकों को नियमित शिक्षकों की तर्ज पर समान कार्य के लिए समान वेतन अगर दिया जाता है तो राज्य सरकार पर प्रति वर्ष करीब 52 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा, जिसे वहन करना मुश्किल है।

आपको बता दें कि राज्य सरकार की मजबूरी एक तरह से जायस इसलिए है या फिर तो इस समस्या के उत्पन्न होने का कारण यह बात भी है कि इससे पूर्व केंद्र सरकार नियोजित शिक्षकों को वेतन लाभ देने से मना कर चुकी है। उसने कहा था कि बिहार के बाद अन्य राज्यों की ओर से भी इसी तरह की मांग उठने लगेगी जिसे पूरा करना मुश्किल हो जाएगा

अब नितीश कुमार इसी आधार पर विशेष राज्य की मांग फिर अलापे या फिर तो न्यायपालिका को अपनी मजबूरी सिद्ध करने में पूरा सरकारी तंत्र लगा दें है तो आखिर इस बार वह भी सही लेकिन एक बात तो है इतने सारे शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ने से बेरोजगारी का खतरा तो है साथ ही उन पढ़ने वाले बच्चों के जीवन में भी ग्रहण सा प्रतीत हो रहा है|

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