2017 में, हरियाणा में जन्म के समय का उच्चतम लिंगानुपात दर्ज किया गया

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यह विडंबना ही तो है कि जिस देश मे नारी शक्ति का प्रतीक है उसी देश मे उन्हें बेहतर दर्जे एवं लिंगानुपात को संतुलित करने के लिए सरकार को “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” व इस जैसे अन्य अभियानों की जरूरत पड़ती है। यह कटु किन्तु सत्य है, यह हमारे समाज की दोहरी मानसिकता दर्शाती है।

पूरे देश मे महिलाओं की स्थिति, संख्या, संबलता, सम्मान आदि की बातें हो रही है, सिर्फ बाते ही हो रही है वो भी सोशल मीडिया, लोकल मीडिया, समाचार पत्र, न्यूज़ चैनलो पर

लेकिन जमीनी स्तर पर कोई विशेष बदलाव नहीं है। 2018 कि शुरुआत में एक अच्छी खबर आई है कि बेटियों के कब्रगाह, उनको कोख में ही मार डालने के लिए कुख्यात हरियाणा में लड़कियों की संख्या में पहले से बढ़ोतरी हुई है। यह प्रसंशनीय भी है, यह बदलते समाज, बदलते सोच का परिचायक है। देर ही सही किन्तु हरियाणा अर्थात ‘भगवान का निवास’ में कुछ ऐसा तो हुआ जो इसके नाम को सार्थक करता प्रतीत हो रहा है।

सरकारी आकड़ो के अनुसार, हरियाणा में 2017 में प्रति 1000 लड़को पर 914 लड़कियों के जन्म का उच्चतम अनुपात दर्ज किया गया है। राज्य में पिछले वर्ष 5.09 लाख बच्चे पैदा हुए थे, जिनमे 2.6 लाख लड़के एवं 2.4 लाख लड़कियां थी। इससे पूर्व 2011 की जनगणना में हरियाणा में जन्म के समय मे प्रति 1000 लड़को पर 834 लड़कियों का अनुपात दर्ज किया गया था, यह सबसे न्यूनतम लिंगानुपात था।

राज्य के 17 जिलों में लड़को के मुकाबले पहली बार लड़कियों की संख्या 900 या उस से अधिक रही है। गत वर्ष राज्य के किसी भी जिले में 880 से नीचे का लिंगानुपात नहीं है।

इस खबर को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने रिट्वीट करके राज्यवासियों एवं अपने प्रसंशकों से साझा किया है। बेटियां बढ़े यह अच्छी बात है, बढ़नी भी चाहिए।

आइए समाज से मिलकर यह गुजारिश करते है कि –

 “बेटी है वरदान, करो इसका सम्मान

  बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ…”

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