इस कागद की स्याही कभी सूखे नहीं!- कड़ी-II

‘इस कागद की स्याही कभी सूखे नहीं!’- अंतिम कड़ी;

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अब आगे:-

हाँ तो मैं कहाँ थी, रमा के नायक कृष्ण पर। निःसंदेह ही कृष्ण क्योंकि वो सदेह भी था और विदेह भी। मौन भी, मुखर भी, अनपढ़ और मूर्धन्य भी। ये कौन सा लास्य था, जो रमा को यहाँ लाया था। बात बेबात इतने बड़े संसार में वे एक दूसरे को समझने लगे थे, वर्ना मर्यादित रमा ऐसे तो आसक्त न होती परपुरुष पर और वो भी परायी स्त्री पर। ये कोई ठिठोली नही कि जो जरा हंस के हवा में उड़ा दें। कहते हैं पुरुष की कामनाओं पर स्त्री रति न हो तो विलाप शुरू और स्त्री की संवेदनाओं पर पुरुष न्योछावर न हो तो उसका मेनका, रम्भा, उर्वशी बनना सब बंद। मंद मुस्कान और चंचल चित से जरा बाहर आएं तो पता चले कि, रमा एक स्त्री नहीं कितने स्त्रैण मन का प्रतीक है।

विदेह रमा जो लाज-लज्जा से दूर थी और साज-सज्जा से भी, अब संवरने लगी थी, अपने सांवरे की सोलह कलाओं से। वो बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। नायक जो था उसका उसके साथ। कभी कंठ में गरल बनकर कभी गले का हार, घट और पनघट भी, कभी पांव में पाज़ेब तो कभी होठ तो कभी स्वयं सम्मोहिनी (कृष्ण की बांसुरी का नाम) बस, जैसा रमा चाहे ठीक ठीक वैसा ही उसका नायक होता।  कहती वो उससे देखो घुंघरूं बन बंधे हो मेरी पैंजनी में, जो बिन बोले करवट भी ली तो छन्न से आवाज आएगी और सुनो कि, मुझे आधी नींद में जागना पसंद नहीं। वो चलती, ठुमकती, थिरकती, अरसे से सोई रमा उकेर रही थी उसे कागद पर।

हल्दी, मेहंदी, गीत-संगीत और जड़ाऊ जेवरों संग लिए सप्तपदी के सारे वचन हवा के एक झोंके से हल्के हो गए थे , और वो भी तो जीने लगा था रमा संग। वो कहता कि हर बार ही उसकी आँखें उसे ढूँढती। साहस कर रमा की तरह उसने भी तो कहा था, तुम क्यूँ नहीं मिलती कभी खुद से। मिलो कि मैँ तुम्हें सांस -सांस जी लूँ। मौन से ये संवाद कब रमा की प्रार्थना बन गया, पता ही न चला। पता तो ये भी न चला कि कब वो उसकी मर्यादित, पर बंद दीवार पर अपने कारीगरी से एक नक़्क़ाशीदार झरोखा बना गया। वो मुस्कुराती कहती कि सुनो तुम्हारी सेंधमारी का हुनर तो तुम जन्म लेते ही दिखा दिए थे हे माधो !

रमा की कही अनकही बातें कई बार उसके अनपढ़ नायक को पल्ले नहीं पड़ती तो वो हंसती और कहती पागल के ‘प’ वाले ‘ष’ किस नक्षत्र की पैदाइश हो तुम, इतना भी नहीं जानते कि हे साँवरे, दिये की लौ संग मिले हैं हम,याद है न, देखो की रंग पर्व (होली ) पर तुममें रंग जायेंगे।  आलिंगन ले वो कहता, मैं कोरा कागद हूँ तो रमा हौले से कहती, फिर तो मैं तुम पर ग्रंथ लिख जाऊंगी। वो फिर- फिर कहता मुझमें बांचने जैसा कुछ भी तो नहीं, तो वो और करीब आ के कहती सुनो, तुम बांचे गए अनगिनत वेद ऋचाओं में और फेरे गए कितने मनकों पर, पर तुमको बिन देखे रंग दिए सूर अपने रस में और तुम तो वही हो न, जिसे बिन पढ़े ही गढ़ गए रैदास। गंवार राधा ने भी तो ऐसा साधा तुम्हें, कि सृष्टि में राधे बिन कृष्ण नहीं।

सुनो कि, मिले हो अन्तर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड, टेलीग्राम और रंगीन कागज़ों के लेटरपैड वाली दुनिया के परे ,

जब प्रेयसी की “कम लिखूंगी, ज्यादा समझना” वाली लाइन पर तुम दौड़े आते थे, तो हमें भी कम न आंको कि, हठी है हम घाट बनारस के, बैरंग जाने नहीं देते। जो डिजिटल के ज़माने में यूं पाती पर उतरे हो तो “तुम वही पढ़ना जो मैं लिख न पाऊं” कि मैं हर बार गुनूं तुम्हें और ग्रन्थ बना जाऊँ। एक नई पारी की शुरुआत हो चुकी थी रमा और उसके नायक की, ऐसा उसने बोला भी तो था रमा से, बेहतरीन खेलेंगे इसे। इस बार प्रार्थना में दो जोड़ी हथेलियां जुड़ी एक साथ और कामना की, कि इस काग़द की स्याही कभी सूखे नहीं ! अभी बहुत कुछ लिखे जाना बाकी है प्रिए।

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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।