इस कागद की स्याही कभी सूखे नहीं!

जय श्रीराम
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जय श्रीराम का नाम ले कहानी प्रारंभ की तो नायिका के नाम का चयन आसान हो गया। मर्यादित पुरुष ‘राम’ की नायिका ‘रमा’, सुदंर नाम है, तुला लग्न का। मान्यता है कि, कार्तिक मास में पैदा हुई बालिकाओं’ के रमा’ नाम रखे जाएं तो मंगल होगा। ऐसा नहीं कि सिर्फ़ रमा ही हो।

वो कभी सकुचाई न थी। बचपने में राजनीति करने का सपना लिए, मार्गेट थैचर और इंदिरा गांधी उसके आदर्श थे। शरारत इतनी की, तरकश का ब्रम्हबाण, पर सातवीं दर्जे में सत्तर की सोच। ये ऐसे ही न था, कहते हैं न‌ बिन गुरु ज्ञान मिलत नहीं माधो।  सब एक साधक की अराधना का प्रतिफल। हिंदी ही तो पढ़ाते थे पंडित जी और चाय भी पीने आते। मां भी बड़े आदर भाव से कुछ खाने को परोसती, क्योंकि उनकी सप्तपदी का मंत्रोच्चार पंडित जी ने ही किया था। चाय की चुस्की में कभी कबीर बुन जाते तो कभी रहीम के धागे की गांठ खुल जाती। तुलसी का चंदन अभी-अभी तो मन शीतल कर गया ही कि हे माधो!  विद्यापति का बसंत भी गया। उसे साहित्य में दर्शन कम दरस ज्यादा होने लगे।

युवा होते मन में एक गड्डमड पुरुष की परिकल्पना आकार लेने लगी। रसखान, अज्ञेय, मीरा, दुष्यंत, बिहारी सबका नायक बस मेरा… सप्तपदी की कामना तो दूर, उसके ठौर ठिकाने भी अपने मिजाज़ से बदल दिए जाते।

जीवन ज़मीन पर हर पल नया आकार लेता है। रमा अब पारिवारिक हो गई थी, निरंतर जीवन निर्वाह के जो़ड़-घटाव,गुणा-भाग सब शुरू।

इन सबके बीच वो कभी खोई न थी। संत कबीर की धुन की धनी रमा, अपने अस्तित्व को संजोए हुए थी। ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’। बस इसी तर्ज़ पर जीना था उन्मुक्त रमा को।

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ऐसा नहीं था कि मर्यादा का उसे भान न था, पर ये बात भी वो जानती थी कि, बिना इच्छा दमन के ये संभव नहीं। बम्हमुहुर्त में प्राणों के आयाम और नियम, जनमानस की भाषा में जिसे प्राणायाम कहते हैं, से रमा के जीवन में भी नया आयाम आया. जब बेला और मालती के फूल अपनी मादक गंध बिखेरते चरम सीमा पर होते, रमा उन हवाओं में अपनी सुधि बिसराती जाती।

रमा को पढ़ना और पढ़ाना बेहद पसंद था। गणित में चारों खाने चित्त रमा को षटकोण वाला ‘ष’ समझाना कुछ यूं आता था। बच्चे जब भी बारहखड़ी के ‘श’, ‘ष’,और ‘स’ में कन्फ्यूज़ होते तो उन्हें वो खूब हंसाती। सुनो शरबत और संतरा जानते हो न, तो इसे याद कर लो और षट्कोण के ष को पागल के ‘प’ से सीखो, प में एक (/)लिटा दो वो बंद हो जाएगा और सो जायेगा. बन गया मूर्धन्य ‘ष’।

कोई बीस-बाईस साल पहले का ये मूर्धन्य मौन मन रमा में रमने लगा, और रमा भी तो।

वैदिक काल में मानव का सबसे पहला मित्र सूर्य हुआ करता था। पौ फटते ही नील कमल खिलता, और रमा रूमानी होने लगी। वो राम की कम कृष्ण की ज्यादा होने लगी, क्योंकि वो उन्मुक्त थी, मर्यादित नहीं। ये आनंद सिर्फ़ वो जानने लगी और उसका कृष्ण वही ‘ष’ पागल के ‘प’ वाला।

दुनिया की नज़रों में पागल और ख़ुद की नज़र में ज़हीन हो गई थी वो।

उसने तय किया वो लिखेगी एक पाती उसके नाम, पर फिर एक बाधा, कैसा डाक और कौन डाकिया।

अमलतास के फूल, वैशाख का चंपई महीना और दिन गुरुवार सब प्रीत के पीले रंग से सराबोर थे, पर रमा सुर्ख़!

साहस कर वो मिली उससे सकुचाई और बौराई सी, आंखें बंद की और एक ही सांस में कह गयी अपने दिल के हालात और वो सुन गया सब कुछ क्योंकि रास रंग में वो भी तो रंगा था। कहा उसने कि महफूज़ हो तुम भी हमारे अंतस में! मिलेंगे रमा के पागल वाले ‘प’ के मूर्धन्य ‘ष’ से अगले अंक में। आगे ज़ारी…

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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।