जर्दे वाली आँख (अंतिम कड़ी)

कहानी अब तक;

जर्दे वाली आँख (भाग- 1)

जर्दे वाली आँख (भाग-II)

जर्दे वाली आँख (भाग-III)

जर्दे वाली आँख (भाग-IV)

आगे,

सुनूं दिल लगा के पढ़ ले कॅरियर बन जायेगा। मैं तो पोस्ट ग्रेड करना चाहूंगी हिस्ट्री से। अब्बू को बोला है। सुनूं तू भी रूक मेरे साथ दो साल और कर ले पी जी।

तब्बू प्यारी लाल दीवारों से बाहर निकलने का वक़्त आ गया है। अब दर्शन पढ़ लिए. ज़िन्दगी जहाँ जहाँ दरस कराने ले जाएगी, चले जायेंगे। हठी हैं हम पर समय से रार नहीं करते।

एनी वे सबके रिजल्ट तो अच्छे ही आये पर चेहरे उतरे क्यूं हैं ? क्या पागल लडकियां हैं। अरे.करना पी जी करना होगा तो भी अभी तो सामान बांधो,हॉस्टल पुनः अलॉट होगा तो आ जाना दूसरी मंज़िल पर। चलो निकलो प्रदीप सर के मस्से से, मोहन सर की बरछी से, रागिनी मैम के फॉल से, शैल मैंम के आर्डर से,, लाइब्रेरियन के लिप ग्लॉस से, चुड़ैल कमज़र्फ वार्डन के चंगुल से। नाहक ही सबके मन भारी हो रहे हैं।

सुनूं एनफ जरा बड़ी हो जा। कब तक बचकानी बातें करेगी। ग्रेजुएट हो गई है तू। आई मीन सीरियस हो जा। दुनिया यूं तुझे ना अपनाएगी। जरा दुनियादारी सीख।

मेरी प्यारी तब्बू हूँ मैं निष्ठुर, निर्मोही। पर बात सुन कुछ मिले और छूटे तो क्या मुझे ग्रेजुएट की तरह बात करनी चाहिए। यार हम पांच साल सेशन लेट लतीफ़ ले के साढ़े पांच साल में प्रमाण पत्र भी पा गए और पदक भी पर बारहखड़ी ही न जान पाए। स से सुनैना तो बन न पाए पर आधे स से स्नातक हो गए। फेयरवेल है न तुमलोगों का।

अहमक़ लड़की तेरा भी है। यार सुनूं अल्लाह तुझे अक़्ल बख्शे। मैंने तुझे पांच साल बर्दाश्त किया ऐज ए रूममेट। ये हाल रहे तेरे तो,, कोई दिलेर ही होगा जो तुझे झेलेगा। वैसे तेरा ये बचकानापन ग़ुम ना होने देना। तू है तो बरछी, जो दिल पर टू द पॉइन्ट टिक जाएगी। दोस्त तो तू ज़हीन है।

हाँ ठीक है ठीक है,पर इस फेयरवेल शब्द को ऐसे कहते हैं न, ”पुनर्मिलन की आस में मिलन समारोह”

यार तब्बू मिलने बिछड़ने का ये सिलसिला तो प्राकृतिक है। सहज है। जो देह से निकले तो विदेह में मिलेंगे और प्राण से छूटे तो फिर देह की यात्रा जारी। देखो दोस्त इस जनम में कुछ कसक रह जाये तो रार ठान लो ईश्वर से एक और जन्म की पर रोओ मत। तुम लोग मेरे हिस्से की गंगा जमुना बहा लेना। आसूंओं में सारी प्रीत बह जाती है।

कोई २५ साल पहले का दिलेर यूं मिलेगा। सुनैना के परिवार वाले मेस में। तब्बू हर बात में। कब से शुरू थी ये यात्रा। वाह रे ईश्वर, ख़ुद से बड़बड़ाती सुनूं। तूने मुझे पहले हठ दिया था या दिल।

तब सुनैना नैन मिलाती न थी किसी छवि से। आज भी पागलपन का ये दौर जारी था।अब वो नैन लड़ाती अपनी प्रार्थना में। किसी मूरत में ना मिलता उसका मछरदानी के डंडे वाला त्रिभंग, और न ही ठाट बनारस का बैरागी। कोई तब्बू ना थी पर मनःसंवाद जारी था, उससे ही जो २५ साल या पता नहीं कितने जन्मों से उसकी तासीर है। वो भाव में, आत्मा में, प्राण में बस रहा था। तस्वीर तो अब भी न थी पर हर शब पर उसकी छवि बस उसका चेहरा।

मिलता उससे बैरागी ब्रम्ह मुहूर्त में सांस बनकर। मिलता अभिजीत मुहूर्त में भोर के रंग का कुमकुम बनकर और लगा था अनामिका पर। दिन की हर घड़ी में प्रिये, सखे, प्रियतम,, जोगी, मुनि, मौन, जैसे सम्बोधनों पर उतरता। मिलता किसी कीर्तन में, किसी तबले की थाप पर, किसी गीत के मुखड़े पर और उतरता अंतरे पर, ग़ज़ल के काफ़िये में। मिलता मन सरीखे हलके पीपल के पात पर भी और तुलसी की गाँछ में भी। मिलने तो वो लगा रसोई की आंच में भी। अमिया की खट्टी चटनी में भी ,चाय की एक चम्मच एक्स्ट्रा शक्कर में भी। दुपट्टे के कोर पर उससे बतिया के हल्के हुए दो चार सूख गए आसुंओं में भी। मिलता वो भीड़ -भाड़ वाले मॉल में भी, भागती सड़कों पर भी।

Clicked by Aryam Chowdhary

मिलने लगा घनी अंधेरी रात में भी, नम आंखों में भी, और खिड़कियों के सूखे काँच पर भी। जनमों से गलबहियां किये बैठा था कहती नौलखा हार बन पड़े रहो मौन। उतरता उसके हर हर्फ़ पर ढाई आखर बनकर। उकेरती उसे हरे रंग की स्याही से तो कहती सांवले रंग में हरा मिला न सखे तो रंग नीला होगा। अनंत आकाश में रंग होता है जो प्रीत का तो अथाह सागर में होगा ही रास।

मिलने तो लगा था वो बारहमासे में भी।

चढ़त अषाढ़ झमाझम बरसे, सावन रिमझिम ना
भादो बिजली चमाचम चमके, पिया मोरे गए विदेशवा ना
क़्वार मास बन टेस फूलत है, कार्तिक नहंनवा ना
अगहन मास हमें नहीं भावे, सखी सब चले गवनवाँ ना
पूष मास में शीत बहुत है, माघे मक्कर ना
फागुन फाग खेलब हम केहि संग, पिया मोरे गए विदेशवा ना
चैत मास में खेत कटत है ,वैशाख में ब्याहे ना
जेठ भूभुरि मैं गर्मी मर गई, पिया मोरे गए विदेशवा ना।

अब तो ऐसा कोई पहर नहीं जहाँ तुम नहीं और कोई जगह भी नहीं जहाँ तुम नहीं मौन!

राख हुए तो थे हम दोनो कल साँझ की धूपदानी में। और जो पवित्र धुंआ निकला, तुमने देखा प्रिये एक जोड़ी मेरी आँखें और एक जोड़ी तुम्हारी आँखें कुल मिला के एक जोड़ी हमारी आँखें लाल हुई थी।.सुर्ख़ जर्दे सी। याद करो कि जतन तो दोनों ने किये थे धुएं से आँखें नम न हों पर अभिशिक्त हो बहे तो पवित्र जल बन निकले। पिघले तो मैं कहती तो थी तुम भी पानी और हम भी। रंग आँखों का ढलकेगा तो अंतस में महावर बन रचेगा।

(समाप्त)

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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।