जर्दे वाली आँख (भाग- 1)

नाम उसका सुनैना और आँखे उसके, उसकी जर्दे वाली।  वो हर बार कहती जाने कितनी कत्थई ,भूरी, गुलाबी ,नीली और पनीली आँखें हमें तकी पर हमारी ठसक पर टिक न पायीं।  ठहाके लगाते हुए आगे कहती, ऐसा है गंगा जी में जा के तनिक पानी में मुँह निहार आओ अपना। ऐसी भी बला कि खूबसूरत तो नहीं थी वो, पर उसे रचियता पर लेषमात्र भी संदेह न था।  कहती बड़ी फुरसत में भगवान गढ़ें हैं, हमको कौनो कमी नहीं छोड़े। और दस मास सीने के बाद जब हमको भेजे तो बिन मकसद तो नहीं गिरे इस धरती पर।

सजना सँवरना कभी रास न आया और कॉस्मेटिक्स पर तो इतनी ठोस राय कि किसी भी कंपनी का प्रॉडक्ट हो हमारे लिए जरा सूटेबल नहीं है। हॉस्टल के कमरे में जब रूम पार्टनर सवेरे सवेरे कॉलेज की पहली क्लास के लिए विक्को टर्मरिक वाली क्रीम के दाग चेहरे पर लगा रही होती तो इसकी ठिठोली से बिदक जाती थी ”काहे को साफ सुथरे चेहरे पर चेचक का टीका लगा रही हो ”  जवाब मिलता तब्बसुम का सो जाओ तुम मुर्दों की भांति भागलपुरी चादर तान के। आ जाना जैसे तैसे क्लास में।  याद है न अगली क्लास प्रदीप सर की है , मरी मत रहना। हाँ हाँ वो हमलोग को पढ़ाने थोड़े ही न आएंगे।  फेयर एंड लवली , इमामी और विक्को की गंध से तो क्लास के दरवाजे पर आते ही उनकी मूर्छा तय है और अगर फिर भी जैसे तैसे अपनी डेस्क पर पंहुच गए तो भांति भांति की चमक से आँखों में मोतियाबिंद आ ही जाएगा।  जोर का ठहाका लगता बगल के रूम में भी इस बात पर। बेचारे प्रदीप सर इस बात से एकदम अनभिज्ञ कि गर्ल्स हॉस्टल में वो कितनी बार सिगरेट के धुएं का छल्ला बना उड़ाये जाते रहे।  दर्शनशास्त्र जितना संजीदे विषय पर बालिकाओं के बीच गुरु कभी संजीदा नहीं रहे।

पाला तो उनसे सुनैना का भी पड़ा पर हर बार इस बात पर कि रोज़ सुबह की क्लास में सामने हॉस्टल से आने में १० मिनट की देरी क्यूँ ? सहेलियों से कोई पंगा कभी रहा नहीं इसलिए इस बात पर भरी क्लास में भी बेइज़्ज़ती महसूस हुई नहीं। जी में तो आता है कह दे देखो सर आप हमारे प्लेटो, अरस्तू , चार्वाक और नीत्शे हो नहीं और न तो हम उन बालिकाओं में से हैं, जो आपके चेहरे पर पड़े मस्से और तिल में कोई दिलचस्पी रखतें हैं, पर हेकड़ी कंट्रोल करते हुए खुद को समझाते, चुप हो ले इंटरनल मार्किंग इसके हाथ में है। रोक दिया एसेस्मेंट तो अगले सेमेस्टर में दर्शन शास्त्र पढ़े ना पढ़े इसके दरस तो होने ही हैं। एडहॉक पर आये थे गुरु जी पता चला परमानेंट हो गए हैं। ”सॉरी सर” बोल ले सुनैना और जरा आँखों में आँखे डाल के। ये मंजर अगली क्लास में भी होगा ये बात सबको पता थी वहां।

मेस में चर्चा होती तो कभी ये ज़िक्र हो ही जाता सुनैना तुझमें ऐसा क्या दिखता है जो प्रदीप सर चुप हो जाते हैं हर बात पर। वो इठला के कहती मुझपर उसकी छवि जो है, ख़ुसरो की छाप दिखती होगी मुझपर, कि

अपनि छवि बनाय के जो मैं पी के पास गई

जब छवि देखि पिऊ की सो मैं अपनी भूल गयी।

चुप कर पागल। तब्बसुम को इल्म था इस पागलपनें का।

 बी आर चोपड़ा के महाभारत का समय वाला पहिया घूमता रहा। सिल्वर जुबली मनाने के बाद, २५ साल होते हैं न इसमें। एकाध कम ज्यादा साल रख लें तो सुनैना वही, पर बदल गया था गंगा जी में मुँह धुलवाने का तरीका। किसपर किसकी छवि सज रही थी ये ठीक ठीक गणित बैठने लगा था । गंध तो आज भी थी पर काजल, मेहँदी, परफ्यूम, लोशन, फाउंडेशन वाली अब भी न थी।

हॉस्टल के ठहाकों की गूँज अब भी है। मेस पारिवारिक हो गया है। दर्शन शास्त्र तो मार्क्सशीट में सिमट गया। ईंट गारे से बनी बहुमंजिली इमारत में एक घर भी बन गया। डिज़िटल के ज़माने में मोबाइल के कॉलर ट्यून पर जरा १९८१ की फिल्म सिलसिला का गाना बजा।

”मेरी सांस सांस महके कोई भीना भीना चन्दन” ठीक ठीक पता है आज की गंध कुछ ऐसी ही थी। फ्लैशबैक से बाहर आयी सुनैना तो चेहरे पर पानी का छींटा मारा।  गंगा जी तो नहीं थी पर मुँह देख के आओ पानी में  वाली बात पर मुस्कुरा बैठी मन ही मन। अबके तिल और मस्से पर दिल धड़कने लगा था। उम्र को मारो गोली ,जेठ की दुपहरिया भी मुँह मराये। जाने कितने आँखों का लस तोड़ के सुनैना बसे बैठी थी किसी ”जर्दे वाली आँख में”।

अबके इस एडजेक्टिव का पेटेंट भी सुनैना का ही था, जैसे उसका वो।

आगे जारी…

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