जर्दे वाली आँख (भाग-II)

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नशीली आंखों में बंद क्या हुई सुनैना एक एक कर जिया हुआ सारा लम्हा याद आने लगा। कहती इंसानी फ़ितरत है प्रिये, सुकून मिला तो कंधे पर सिर रख के सारा अफ़साना कह जाये। बोल लेने दो, रो लेने दो, हंस लेने दो, कुल मिला के सार ये कि या तो पीठ में पीठ सटाये बैठे रहो या फिर कंधे पर सिर टिकाये रहने दो।

प्रदीप सर की क्लास ओवर हुई तो पता चला स्टाफ रूम में प्रदीप सर इंग्लिश वाली रागिनी मैम की साड़ी का फॉल ठीक करते नज़र आये थे। ये उसने अपनी आँखों से नहीं देखा था, ग्राउंड में गौरेया की तरह गॉसिप करती लड़कियों की चीं-चीं,  बकबक थी। ”हाँ तो कौन सा गुनाह कर गए ” गोरी चिट्टी धवल चांदनी सी रागिनी मैम सफ़ेद साड़ी में एकदम सरस्वती की प्रतिमूर्ति ही तो लगती हैं। ये देखो फॉल ठीक करने के बहाने चरण स्पर्श कर गए,  तर गए।

”महान है तू सुनैना और तेरी उल्टी खोपड़ी” सब एक सुर में चहचहाती। तब्बसुम को ठीक-ठीक पता था, ये उलट खोपड़ी ज़माने के हिसाब से हैं, सोचती तो सही ही है। रात को हॉस्टल में मच्छरदानी का डंडा चौकी के पाये में क्रास कर लगाते हुए बोलती, देख तब्बू, ठीक से खड़े हैं न त्रिभंग। अब ये त्रिभंग कौन है सुनैने। यार तुम कभी तो बिन पहेली बुझाये जन मानस की भाषा में बोला करो। तपाक से ज़वाब देती, आज तुलसी को पढ़ आयी हो क्या हिंदी के क्लास में ”जन मानस ” तब्बू इतना भारी भरकम शब्द जान गयी और बेचारी सुनैना पर प्रयोग कर होमवर्क भी कर लिया। पर सखी रूई के फ़ाहे से भी हल्के त्रिभंग को न जान पायी। मेरी प्यारी तब्बू त्रिभंग ”कृष्ण’’ को कहते हैं। ऐसे ही मच्छरदानी के डंडे से पांव में पांव फंसाये खड़ा रहता है अपना सखा। बस-बस सुनूँ प्यारी कृष्ण आ गए तेरे तो पूरी रात हम सो न पायेंगे। ठीक है ठीक है हम तो कम्बख़त मच्छरों की वजह से भी न सो पायेंगे। सुन नेट को चौकी पर चारो तरफ से लटका देते हैं, मच्छर काटने के पॉइन्ट ऑफ़ व्यू से नेट के अंदर आएंगे नेट तब गद्दे के नीचे दबा देंगे चारो ओर से। मच्छर अंदर हम बाहर। तब्बू अपना सर मत ठोंक, बात सुन मुझे बंदिशें पसंद नहीं चाहे वो मच्छरदानी की ही क्यों न हो। दूसरी चौकी पर सोते हैं, त्रिभंग को ताकते ताकते नींद आ जाएगी। चलो माता, बोल तब्बू मान जाती।

घूमी खोपड़ी का एक नमूना यह भी कि, हाजमा ख़राब हो तो हो सुबह के नाश्ते में पांडे हलवाई की कचौरी, जलेबी और सब्जी १२ रुपए वाला बहुत भाता है। ज़िक्र हुआ मेस में, यार पांडे के हाथ में क्या स्वाद है, आवाज़ आयी सुनैना की, ”ऊ जो बिन मांजी कड़ाही खुरच खुरच के सब्जी चलाता है न और ऊपर से गली का सोंधा धूल गरम मसाले का काम करता है ” ये उसका जायका है।

चुप कर ले पागल कुछ भी बड़-बड़। हाँ काहे हमको तो इस सिस्टम से भी एतराज है कि लोकल गॉर्जियन अब रजिस्टर में ये लिखता है ”मैं सुनैना को फलां टाईम पर हाट बाज़ार कराने के बाद सुरक्षित हॉस्टल में जमा कर रहा हूँ ” अरे हम कौनो राशन की बोरी हैं का, जो मथुरा के पुरोहित के यहाँ सालाना जमा कराया जाता है।

किस्से सुनूँ / सुनैना के कम हुए ही नहीं कभी। सब कहते हैं सबसे किनारे वाले बाथरूम में एक सीनियर दीदी ने आग लगा के आशिक़ी में जान दे दी थी, उसमें कभी मत जाना। तब्बू बोलती यार अभी सेकेंड ईयर में ही हैं, पूरी ज़िंदगानी बाक़ी है। तब्बसुम के अल्फाजों और आवाज़ की कद्रदान सुनैना बोलती इस बात पर ”तो इसमें कौन सा अतरंगी काम कर गयीं, आशिक़ तो यूं भी जलते हैं ”. .खीझ के तब्बू बोलती, जा गलबंहिया कर आ, बाल्टी मग सहित दीदी बाहर उठा के पटक देंगी, तब तुझे रूह की ताक़त का अन्दाज़ा होगा। रात को भी कॉमन रूम की लकड़ी वाली सीढ़ी पर ठक ठक कर के दीदी पीछे लग जाती है। सुनैना फिर फिर कहती, आने दो। हमारा स्पॉटलेस सफ़ेद चादर भागलपुर वाला तो जब हम तान के सोते हैं, का मज़ाल जब तक दिल के करीब कान न लाओ, कोई जान पाए हम रूह हैं की देह। हमको ना छू पायेगा कोई, तू अपना देख ले।

anyway छोड़ तेरा पागलपन सुनैनी, आज कॉमन मीटिंग हैं, संडे की फिल्म डिसाइड होगी। बिंग ए प्रीफेक्ट ऑफ़ सेकेंड ईयर विद संगीता दी, फिर अपनी पसंद मत थोपना। ठहाका जोर से लगाते सुनैना बोलती, तब्बू यार वो चरण ला दे ,मैं स्पर्श कर लूँ जिसने एक कॉमन और एक प्रीफेक्ट च्वाइस का रूल बनाया।

उसकी बदौलत १२वीं बार कुमार गौरव देखने को मिलेगा। लव स्टोरी में विजेता पंडित न भी होती तो फिल्म कम्पलीट ही होती। १२वीं बार भी सेम टू सेम चॉकलेटी कुमार गौरव तब्बू।

देखो तब्बू रोमांस की पराकाष्ठा बिन पगलाए हुई है क्या कभी? खिसके लोग ही ये काम करते हैं। भोलेनाथ को ही देख लो,  इतना भभूत भस्म लपेट के सती के प्यार में तांडव किये थे। अब कोई नार्मल लड़की तो ना होगी जो मटमैले जोगी के प्यार में अग्नि को गले लगा बैठी।

तब्बू बीच में ही बात काटती, बस भाई बस कुमार गौरव से शिव के तांडव तक। घट से घाट तक, महान हो सुनैने। चल चुपचाप सो ले।

अबके सुनैना तनिक मद्धम आवाज़ में कहती, ‘’सखी हम सोते नहीं किसी की आंखों में बंद हो जाते हैं’’

विनय गुल महबूबानी

आगे जारी …..

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