जर्दे वाली आँख (भाग-IV)

कहानी अब तक;

जर्दे वाली आँख (भाग- 1)

जर्दे वाली आँख (भाग-II)

जर्दे वाली आँख (भाग-III)

आगे,

एक बात कहें तब्बू हम सभी अपनी अपनी ज़िन्दगी में, इस लाल हवेली को जो हमारा हॉस्टल है या यूं कह लो उम्र के सबसे नाजुक दौर का आशियाना इसको बड़ा मिस करने वाले हैं। कहते हैं जहाँ व्यक्ति जन्म लेता है ,वहां की ज़मीन से भी उसकी नाल पोठी जुड़ी होती है और इन लाल दीवारों से हमारी प्राण पोथी जुड़ी है सखी।

अरे सुनूं क्या ख़ाक ज़िंदगी, इस नापाक़ रूह को नहीं देखा ? किसकी बात कर रही हो तुम इस खबड़नझल्ली वार्डन की। तब्बू प्यारी इश्क़ भी कभी सहज हुआ है क्या ? पर एक बात बता गर्मियों की छुट्टियों के बाद तू इतनी बिफरी क्यूँ है बुड्ढी सी जान पर।

तू देख सुनूं तीन सीनियर्स ने प्रेम विवाह क्या कर लिया, लाल हवेली की दीवारों को लाँघ कर, लगता है हम सब निक़ाह क़बूल आये हैं। कमज़र्फ औरत ने कभी उम्र जिया भी है या नहीं। कैंडल लाइट में गुलशन नंदा को पढ़ती है फुसफुसा के पर अम्मी जान के ख़त को आज चिल्ला के पढ़ रही थी। खतों को यूं सूंघती है जैसे उसमें संदेश नहीं नशे का पाउडर आया हो। कह रही थी तब्बसुम फ़ातिमा तुम्हारी अम्मी जान का खत है लिखा है, भैया अगले हफ़्ते मिलने आएंगे। उम्दा रौशनी है हमारी निगाहों में मेरा ख़त ये क्यूँ पढ़ रही है। कम्बख़त ज़हन्नुम में जाएगी।

By Vishal Rai

बस बस प्रिय तब्बू , इतनी नाराज़ न हो। सुना है शैल मैम का आर्डर है सबकी चिट्ठियां खोली जायें और तभी सुपूर्द की जाये हमें। पर तू इस पर इतना मत सोच एक तो तेरी अम्मी की चिट्ठी आती है और एक इस सुनैना की माँ का अंतर्देशीय पत्र नीले रंग वाला। आखिरी शब्द ”तुम्हारी माँ” पर मैं भी पूरा समंदर बहा डालती हूँ। न हम किसी को चिट्ठी में उड़ेलते हैं और न तुम किताबों में ख़त पढ़ती हो, तो बस मलंग रहो।

चल जैवलिन थ्रो की प्रैक्टिस है आज, to the point बरछी फेंको सुने दो महीने हो गए मोहन सर के। हम हमेशा ये सोचते हैं सर एक ही भाषा पर क्यों नहीं टिकते। जैवलिन को बरछी बोलते हैं। ऐसा लगता है किसी के दिल में लहराते हुए जाओ और to the point टिक जाओ।

सुनूं प्लीज़ यार जैवलिन में भी दिल ला दिया तूने। पागल तो पक्की है तू सुनूं। मेरी ख़ामोशी पर तो कोई सिरफ़िरा नज़्म पेश भी कर दे, पर तू सब रंग ,कभी शिव ,कृष्ण, बुद्ध ,गंगा, सूरज, चाँद , क़िताब भी तू, नायक भी तू और नायिका भी। ज़ेहनी तौर पर तेरा अपना ही कैरेक्टर डिफाइन नहीं। कोई पागल ही तुझसे सर लड़ायेगा। आज तो तूने बरछी से दिल पर वार भी करने की सोच ली। ख़ुदा तुझे अक़्ल दे।

आमीन तब्बू। एक बात तो तय है दोस्त जीवन के किसी मोड़ पर तुम्हारी आवाज़ की क़शिश को सुनने वाला मिल जायेगा पर मैं तलाश करूंगी उस रंगरेज़ की जो सब रंग चुपचाप जी जाये और हमारे न सुर लग पाने वाले राग को रास बना जाये। अब ये बात भी है कि मुझ जैसे अतरंगी पर भी कोई ठौर ढूंढता है कि नहीं।

वैसे मैंने कादम्बिनी मैगज़ीन सब्सक्राइब की है, किसी ने कहा कुछ लिखते हैं, छपती हैं। हमने कहा पढ़ लेंगे। भेज दो। उसने कहा कुछ तुम्हारे लिए भी। हमने कहा, हमारे लिए तो बुद्ध हिमालय छोड़ सारनाथ आये थे, शिव जी हमसे मिलने तो घाट पर आये और बूँद बन घट में बैठे, और त्रिभंगवत तो हम जन्मों से हैं , कालिदास ने बादलों से काशी से उज्जैन बरसने का सन्देश हमारे लिए ही भेजा। चार्वाक,नीत्शे ,प्लेटो ,अरस्तू सबको तो गले लगाए बैठे हैं। कबीर की उलटबासियां भी मेरी।

टैगोर की देहाती नायिका भी मैं। जिसके नायक में इतनी सी तो बात हो

जैसी हो वैसी ही चली आओ ,सिंगार को रहने दो

ओस से भीगी मिट्टी में पांव अगर सन जाये

घुँघरू गिर जाये पायल से तो भी कोई बात नहीं

जैसी हो वैसी ही चली आओ सिंगार को रहने दो

तुमको भी पढ़ लेंगे। वो मन कैसी स्त्री जिसमें नायिका के हर किरदार को जी जाने का मादा न हो। देह नहीं विदेह से रंगों सखी। पुरुष शब्द भी देह न बन गुमान किये जाये तो बस रंगरेज़। और हमारी तलाश तो पूरी होगी वहीं।

By Nihal Kashyap

चुड़ैल वार्डन को भी प्रेम पत्र पसंद नहीं। पत्रिकाओं में आओगे तो लोग भी खलबलायेंगे नहीं। ये दुनिया में दोस्ती शब्द से लोगों को इतना गुरेज़ क्यूँ हैं। तुम देखो दो लोग बतिया क्या लें आपस में तनिक कितनों का तेल पानी जल जाता है। सिस्टम ये ईश्वरीय तो कतई नहीं।

सुनूं चुप हो जा। चल बरछी बन लहराते हैं। नोट्स भी लिखने हैं वापस आ के।

क्या यार ढाई आख़र तो लिख नहीं पा रहे नोट्स लिखेंगे। पर जब हम लिखेंगे तो तय है हर हर्फ़ में ढाई आख़र होगा और रंगरेज़ भी सबके हिस्से का सबका अपना अपना। तुम ज़रा आँख बंद करो दोस्त और बलखाते इस हर्फ़ की प्रूफ रीडिंग कर दो।

आगे जारी…

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