‘प्रेम गली अति संकरी रमे” भाग-II

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“प्रेम गली अति संकरी रमे” भाग-I

अब आगे :-
congestion और suffocated ओह यस साहिबां आई कैन से की तीन भाषाओँ की शाख पर मेरे मन का ऊल्लू बड़ी तसल्ली से बैठता। संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी को छोड़ दो तो, स्कूल में हम ये ही सवाल पूछते, बाकी सब सब्जेक्ट पढ़ के कौन सा तीर मार लेंगे। और ये भी पढ़ के तो मेरी तरकश में तुम्हारे अलावा कोई नागपाश है नहीं।

चौबे सर हमारे प्रिंसिपल और अंग्रेजी के अध्यापक भी। सख़्त और विद्वान। उनका पहला कदम क्लास की देहरी पर पड़ता तो उस पदचाप से पूरा क्लास ताज हो उठता और मैं मुमताज़। फिर हम यही सवाल पूछ्ते विद्वान तो ठीक हैं इतने अनुशासित क्यों हैं बोन्साई की तरह।
माँ की कजरी, ठुमरी, चैती और भजन वाले कृष्ण तो बड़े विद्वान, है पर काम तो सब out of the box करते हैं।
जानते हो साहिबा सवाल उनको बहुत आता है, जिनको गणित नहीं आता है। और इस मामले में हमारी भी गिनती आला दर्ज़े के सहपाठियों में शामिल थी। ”सिफ़रलाल रंग की स्याही से मिलता हमें और बटा सौ होता। जब इस अंज़ाम का पुरस्कार मिलता तो श्यामपट्ट के सामने। मेरे साथ पूरी कक्षा के सामने खड़े सहपाठी जीवन के अंतिम क्षणों के साथी लगते। कभी परायापन लगा ही नहीं। आज तो सांसों की डोर टूट जाएगी इस बात पर भी हौसला इतना बुलंद होता की अगले दिन present सर ना बोलने की कसम ले बैठे होते स्कूल के पीछे वाले पोखरे के किनारे। दूर अपने हौसले से भी दूर कंकड़ पत्थर को फेंक जो वर्तुळ बनाते। उस गोले में कितने छल्ले बने ये दूर से ही सुन्दर कांड के फटिक सिला की भांति चार सीढ़ियों वाले घाट पर आसन लगाए हम सही-सही गिन जाते। एक दर्प उभर आता अपने चेहरे पर और उसकी छवि उस वर्तुळ के बीच जा के पानी के रंग में विलीन हो जाती। उससे भी अपने गणित पर ज्यादा गर्व होता है, कि उस परिधि में उभरती आवृत्ति को हम आज भी बिना कंपास बॉक्स के उकेर दें। अब तुम मिले हो, इतने सारे reactions सहजता से बोल जाते हो कि विषय से ही मुहब्बत हो जाती है।

रमा, हे ब्रम्हा की मानस पुत्री, हे शारदे की वीणा की झंकार तनिक अपनी वाणी को विराम दो। जरा सी फूंक पर wind chimes सी बजने लगती हो। बैठो जरा पास मेरे उकेरो उस आवृति को उसी सिफ़र वाले लाल रंग की स्याही से। जो लाल स्याही गाढ़ी हो गयी हो तो बचपने वाला कलम जोर से छिड़को , अब इसका रिएक्शन और प्रॉपर्टी तुम देखो कि, वही सिफ़र वाली स्याही जो अबके गुलाब जल सी हो हर उस आवृति पर इत्र फुलेल की एक बूँद सी छिड़क गयी जो इर्द गिर्द है तुम्हारे। ज्यामितीय संरचनाओं पर कुछ महीन और कुछ तंग रेखाएं भी किसी compass box की मोहताज नहीं हैं रमे।
अब chemistry बस इतनी सी है,
सब अपना इश्क़ ढूंढें हैं साहिबां
गोया साया भी संदली महकता है
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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।