मन मृग तन कस्तूरी!

गिल्ली-डंडा, पिट्टो, कंचा, और आईस-पाईस संग-संग खेले थे दोनों बचपने में। पर इस आईस-पाईस का ”धप्पा’’ न उसे बड़ा नाग़वार गुजरता, कहती मुझे न पीठ पर पीछे से वार पसंद नहीं,  सब चिल्लाते, ये क्या बात हुई कस्तूरी ! देखो जिस कोने में मैं छुपी थी वहां मैंने अपना संसार बसा लिया था,  और मुझे न ये चोर वोर बनना पसंद नहीं। फिर ठसक ये भी नहीं खेलना मेरे संग तो न खेलो,  मैं चली। जी में तो सबके आता इसकी हेकड़ी निकाल दे पर यार इसकी तरह कोई और है भी तो नहीं। सब फिर एक राग में कहते, अच्छा चल चोर मत बन,  पर खेल और तुझ पर कोई ”धप्पा” भी नहीं बोलेगा।

सयानी हो गयी थी कस्तूरी मन से ही नहीं उम्र से भी पर तासीर वही कि संसार वही बसे एक कोने में, कोई झकझोरे भी नहीं धप्पा कह के। मृगांक उसका मृग जो कोई ढाई साल ही तो बड़ा था। तब के जब सभी कस्तूरी की इस सोच को जो कोने में दुबकने वाली थी, पलायन कहते और मृग इसी सोच का क़ायल हो गया था शायद। कब मिले थे दोनों ठीक-ठीक कुछ याद तो नहीं पर वो मृग की आँखों पर वारी जाती, और कस्तूरी की गंध मृग को बात बेबात आती।

रोज़ की भोर का एक मुट्ठी रंग जाने वो कब से इकठ्ठा कर रहा था उसके लिए, कहता कि जब मिलूंगा तो तुमपर उड़ेल दूंगा, क्योंकि ये रंग मुझे बहुत पसंद है और जबाब में कस्तूरी भी तो महक जाती। कहता अब के बरसात में जो सूरज की जद्दोजहद हो बादलों से बाहर आने की तो तुम उस भोर को अपना रंग दे देना क्योंकि मैं इस रंग को जीता हूँ अंतस तक।

 

गंगा के उस पार जहाँ घाट नहीं है,  दूर तक सफ़ेद चमकीली रेत पर उभरते पैरों के निशान जस के तस थे, और लगता है हवा भी जरा मद्धम ही थी, नहीं तो थोड़ी सी रेत तो सरक के धंसे पैरों के निशान भर ही देती। और गंगा समंदर सी हिलोरें भी नहीं लाती घाट तक।  कस्तूरी और मृग दोनों ही इस बात पर लिपट जाते उनके निशान दूर तक जाने वाले हैं। मिलने की जगह बता रही थी,  प्रीत की नयी परिभाषा लिखी जा रही थी,  नहीं तो डेढ़ सौ रुपये खरच के गंगा इस पार कोई काहे को आये। घर-परिवार,  नाते-रिश्तेदार, दोस्त-मित्र सबको बतियाते बतियाते उनकी उँगलियाँ जरा आपस में लिपटती। डेंगी नाव का खेवैया चुपचाप कोहनी पर ठोढ़ी टिकाये टुकुर टुकुर ताकते-ताकते सो गया।

लिपटी उँगलियों को खोल जरा मृग कस्तूरी के बालों को सुलझाता और कहता ये मास्टरस्ट्रोक्स हैं सखी तुम्हारी लटें बड़ी खूबसूरत। वो अपने मस्तमौला अंदाज़ में कहती,  हाँ हाँ हमको मालूम है की आईपीएल सीज़न चल रहा है। दोनों इस बात पर जोर से हंसते। एक कदम पीछे जा के, जो कि उसके बात करने का स्टाइल था और ये बात उसकी सखियों को पता भी थी,  कहती कस्तूरी सुनो, अब ये बिन धागे,  बिन फेरे की जो प्रीत है, मालूम है हमें थोड़ी अलग रीत है। है तो इसी दुनिया की, पर लोगों को तनिक अतरंगी लगती है, रास नहीं आती। पर दिल पर किसी का कब ज़ोर चला ग़ालिब आई मीन मृग। कस्तूरी का पेटेंट कराया हुआ शब्द ”पागल” मारो गोली दुनिया को पागल है। इस बेबात पर वो जरा जोर से ठहाका लगाते, गंध कौन और देह कौन पता न चला कि रेत बड़ी तेज़ उड़ी थी उनकी इस हंसी से। खेवैया भी जाग गया, अरे तुमलोग चलोगे कि, इस पार ही बस जाओगे। अबके कस्तूरी को ये आवाज ”धप्पा” ही लगी थी, कुछ बोलती इसके पहले ही मृग बोल पड़ा, चलो और सुनो कि तुम हमारी कुंडली में ही रहो। बस मुझे ही बौराने दो तुम मौन रहो, गंध हो महको कि, दूर तक जाओगी।

मृग बस गुनगुनाने लगा था। ……… उसी कस्तूरी का मृगांक। बैठे थे दोनों इस पार आने को डेंगी में,  कुंडली में उस पार की जुगत लिए।

गिटार और स्वर – विनय गुल महबूबानी

फिल्म- दम लगा के हईंसा

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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।