वैशाख की पूरनमासी का चाँद !

रात का छौना, परियों के देश में बैठा, आरे आव पारे आव की धुन पर दूध के कटोरे में झट से उतरकर आया माँ का भूला बिसरा भाई। माँ के आँचल से कई लोरियां सुनकर भी टुकुर टुकुर ताकता चंदा मामा, और बजरिये काले धागे में गूँथ गले में लटका नजरिये का चाँद।

वैशाख की पूनम का चाँद, सुजाता के बुद्ध का चाँद। एक ये चाँद जो अपनी तासीर दिन के उजाले में छोड़ गया। कहते हैं जब बुद्ध अपने निर्वाण प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होने को थे,  तपती गर्मी में कभी वट वृक्ष की छांव तो कभी देववृक्ष पीपल का आसरा। सुजाता एक ग्वालन थी जिसने एक तपस्वी को जीर्ण-शीर्ण अवस्था में देख देववृक्ष ही समझ लिया और पूरनमासी पर बनाई खीर में श्रद्धा और करुणा डाल इस आस में बुद्ध तक आई कि ये तपस्वी फिर से जीवंत हो सके। मान्यता है कि बुद्ध ने भी इस खीर के उनचास निवाले खाये तृप्त हुए और फिर अगले उनचास दिनों तक कुछ न खाया। निरंजना नदी का किनारा, बोधि वृक्ष,  सुजाता की पूर्ण चन्द्रमा की खीर बुद्ध के निर्वाण पथ पर, साथ हो लिए थे। अगले उनचास दिन गर्मी में भी बारिश होती रही ,बुद्ध भींगे और ऐसे भीगे कि ”आपो दीपो भव” की नीरवता तक जा पहुंचे।

एक खूबसूरत संयोग तो ये भी एक पूर्णपुरुष जो जन्मा तो पूर्णिमा, संसार से असार तक होने के दिन पूर्णिमा और अनंत की यात्रा पर भी चला पूनम के चाँद को लिए, सुजाता का बुद्ध!

Getty images

हाँ तो हम थे चाँद पर, जिस पर विज्ञान ने धरे अपने पांव तो हम तलाशने लगे उस पर बस जाने की संभावनाएं भी। जो जमीन पर टिकाए रखे पांव तो चाँद कुछ ऐसे दिखा दरख़्तों से रास का, फाल्गुन में उल्लास का, मस्ज़िद से रमज़ान वाली ईद का और झरोखे से महबूब के दीद का चांद।  चन्द्रमा पर चाबुक चलाता राहु यानि ग्रहण का चाँद और निखर के बाहर आया उग्रह का चाँद। किसी की सीढ़ियों से उतरता इश्क का नमक वाला चाँद तो कहीं दीवारों में बंद मुआ बेवफ़ा चाँद। किसी के बाजूबंद पर चाँद, कभी हंसली तो कभी हैकल बना गले में सजा चाँद। कृष्ण के चन्द्रबाले का चाँद, राधा की मुंदरी में जड़ा चाँद। गीली पलकों से कई बार कितनों ने देखा अपनी चौदहवीं का चाँद, सेज़ पर घूँघट के पट में सिमटा चाँद। चलनी के पार देखो तो करवा चौथ का चाँद, जो खीर बना के शरत की पूनम को इसी चलनी से ढक आँगन में रखो तो अमृत बरसाता चाँद

Photography by Rani Kashyap

देवों के शीश पर भी क्या खूब सजा चाँद। धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकला चाँद। चाँद को सोम भी कहते हैं और सोमवार सप्ताह का ये दिन भी चाँद का प्रतिनिधि माना जाता है। सोमरस का पान किये बैठे मलंग शिव पर बैठा आधा चाँद उन्हें चन्द्रभाल बना गया तो, भाद्रपद की चतुर्थी का चाँद जिसे देख कलंक लगे, लगाये बैठे अपने शीश पर विनायक और बने मंगलमूर्ति, भगवती के माथे शोभित घंटे का अर्ध चंद्र बनाता है उन्हें चंद्रघंटा

कवियों के नुक़्ते में भी खूब लगा चाँद;

कभी रात का राजा और कभी राह में भिखारी बने बैठा चाँद:

वाह रे चाँद एक अकेला बेचारा। कोई कहता है चाँद पर जो दाग है उसमे बूढी नानी बैठी है तो किसी को खरगोश दिखता है। विज्ञान की तस्वीरें उसका नक्शा बयां करती हैं।

“चांद को मैंने भी कुछ यूं गुना….”

बोल इब्ने इंशा के, आवाज़ सौरभ चौहान की

”चन्द्रमा मनसो जायते” का अर्थ है चन्द्रमा मन का करता धरता है ,और जो बारी आई मनःसंवाद की तो कितनी चाँद रातों पर भारी पड़ा कृष्णत्व। एकबारगी मन तो ये भी सोच गया कि चाँद पर जमीं से वो जो काला धब्बा दिखता हैं न, चाँद की माँ ने उसको दुनिया की नज़र से बचाने के लिए लगाया होगा।

हे माधो!

ये चाँद हसीन भी है और ज़हीन भी। जो इसकी धवल चांदनी सागर में जा मिले तो ज्वार भाटा और एक कटोरी खीर में मिले तो असीम शांति।

अरज है! ऐ सोलह कलाओं वाले चाँद, आज हर शाख़ देववृक्ष बने और खीर की तासीर कुछ ऐसी हो कि, हर मन बद्ध से बुद्ध होने की ओर अपने पांव धर सके।

शुभ बुद्ध पूर्णिमा!

आवाज- सौरभ चौहान

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